निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

Inspirational


4.7  

निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

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अफसर माँ की बिटिया

अफसर माँ की बिटिया

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गर्व से ऊंचा सिर, आँखों में अश्रु और आह्लादित हृदय, कुछ ऐसी मनोदशा थी श्रेया की आज। आईएएस परीक्षा में देश में तीसरी रैंक आयी थी उसकी, एक तरफ जहाँ स्वयं को गर्वान्वित महसूस कर रही थी, वहीं दूसरी ओर इस संघर्षयात्रा के अतीत के कुछ पन्नों में खो चुकी थी।

तीन बेटियों के बाद पुत्र की बाट जोहते माता-पिता की चौथी संतान थी श्रेया, मानों पुत्री-जन्म लेकर कोई गुनाह कर दिया, हमेशा पिता के स्नेह को तरसती रही। याद है कैसे देवराज चाचा के समक्ष एक दिन पापा झल्ला उठे "चौथी संतान भी बेटी, हे ईश्वर, इससे अच्छा तो बेऔलाद रखता मुझे !"

पिता की उपेक्षा और मां के अल्प-स्नेह के बीच श्रेया बचपन से ही होनहार छात्रा रही, बारहवीं की परीक्षा और फिर छात्रवृति प्रतिभा चयन परीक्षा में प्रदेश में अव्वल आयी थी। प्रदेश के श्रेष्ठ आर्ट्स कॉलेज में दाखिले का अवसर मिला, किंतु पिता की उपेक्षा फिर आड़े आयी, "लड़कियां पढ़-लिख कर करेंगी क्या, जाना तो उन्हें पराये घर ही है ?",ऐसे तानों के मध्य जैसे-तैसे दाखिला ले पायी थी कॉलेज में।

मेधावी श्रेया कॉलेज में भी सदैव अव्वल रही। अंतिम वर्ष की पढ़ाई के साथ ही सिविल सेवा परीक्षा की तैयारियों में जुट गई थी, किन्तु परिवार वालों को मानों बोझ प्रतीत हो रही थी इसलिए आनन-फानन में घरवालों ने लेफ़्टिनेंट पद पर कार्यरत मोहित से उसकी शादी तय कर दी। श्रेया के सपनों की उड़ान को मानो विराम लग गया, शादी टालने की उसकी सारी कोशिशें नाकाम गयीं और दुल्हन बनकर ससुराल आ गयी।

मोहित सहयोगी प्रवृत्ति के थे, अतः श्रेया ने एक दिन मौका देखकर सिविल अधिकारी बनने के सपने के बारे में उन्हें बता दिया| फूली ना समायी थी, जब पति ने उसे पूरे सहयोग का आश्वासन दिया, श्रेया के हौसलों को फिर से पंख लग गए, और वो पूरी तल्लीनता से परीक्षा की तैयारियों में जुट गई।पति सीमा पर तैनाती की वजह से बाहर रहते, किन्तु श्रेया के सपने के प्रति उनका योगदान निःस्वार्थ था।

उस दिन जब श्रेया को ये पता चला कि जल्द ही वह मातृत्व-सुख प्राप्त करने वाली है, आनंद से उसके पैर जमीन पर नहीं थम रहे थे, पति को ख़ुशख़बरी देते वक्त शर्म से लाल हो गयी थी, किंतु दूसरी तरफ इस बात की भी चिंता थी कि अब सिविल सेवा परीक्षा का क्या ?

श्रेया की आंखों की पुतली बनकर नन्हीं जाह्नवी उसकी जिंदगी में आई, ममता का आंगन किलकारियों से गूंज उठा। मोहित भी आये थे पुत्री के जन्म पर,तब श्रेया ने मोहित से अपने अंदर दबी सिविल सेवा परीक्षा में भाग लेने की इच्छा पुनः जाहिर की, छः महीने रह गए थे परीक्षा को किन्तु उसे स्वयं पर पूर्ण विश्वास था,और मोहित को उसकी काबिलियत पर। श्रेया पति के सहयोग से पुनः परीक्षा की तैयारियों में जुट गई|

समस्या थी नन्ही जाह्नवी, मोहित के बाहर होने की वजह से जाह्नवी श्रेया की जिम्मेदारी थी, ऐसे में परीक्षा में सम्मिलित हो पाना कहाँ संभव था? एक मास का समय शेष था, तो क्या मां के कर्तव्यों से बंधी श्रेया परीक्षा से वंचित रह जायेगी?

आखिरकार सरकार द्वारा मातृत्व कल्याण की दिशा में उठाए कुछ कदमों और मोहित के अथक प्रयासों के बाद परीक्षार्थी श्रेया को नवजाता जान्हवी को साथ लेकर परीक्षा दे सकने की अनुमति मिल गयी। मोहित का ये कर्ज़ श्रेया शायद ज़िन्दगी भर ना चुका सके। अंततः एक ऐतिहासिक पल का साक्षी बना देश, जब श्रेया ने देश की ऐसी प्रथम महिला प्रतिभागी के तौर पर सिविल सेवा परीक्षा दी जिसे अपनी नवजता पुत्री के साथ परीक्षा देने की अनुमति मिली।

और आज सुखद परिणाम देख भाव विभोर थी श्रेया। पिता जी का भी कॉल आया था,क्षमा मांगते हुए पापा अपनी अफसर बिटिया के लिए सिर्फ इतना बोल सके थे -"ईश्वर ,अगले जन्म क्या, हर एक जन्म मुझे तुझ जैसी ही बिटिया दे !" 

आज आशीर्वाद में उठ गए थे वो हाथ, जिन्हें था कभी उसकी पैदाइश पर ऐतराज !

नन्ही जाह्नवी अपने अफसर माँ की गोद में अपने सुनहरे भविष्य की कल्पना कर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।


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