निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

Drama


5.0  

निशान्त "स्नेहाकांक्षी"

Drama


अभ्यास की महत्ता

अभ्यास की महत्ता

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राजीव के लिए आज बहुत ही महत्वपूर्ण दिन था, पिछले एक साल से जिस 'सिविल सेवा परीक्षा' की तैयारियों में उसने दिन रात एक कर दिया था, आज उन तैयारियों के इम्तिहान का वक़्त आ गया था।

एक-एक विषय के एक-एक अध्याय को पूरी लगन व मेहनत के साथ कंठस्थ किया था उसने।

मुख्य विषय के तौर पर उसने पसंदीदा गणित विषय का चयन किया था। गणित में एम. एस.सी गोल्डमेडलिस्ट रहा था राजीव। अतः गणित के प्रमेयों /सिद्दन्तों से खेला करता था। " फोरीएर सीरीज " से लेकर "द्विघाती समीकरण (quadratic equation)" तक के सवालों के जवाब मानो उसकी जुबान पर हों। गणित विधा में मानों पारंगतता हासिल हो उसे !

गणित में अत्यंत होनहार होने की वजह से पिछले कुछ महीनों में अतिआत्मविश्वास से लबरेज हो गया था राजीव, शायद इसी वजह से प्रतिदिन सवालों और प्रमेयों पर अभ्यास, जो की उसकी दैनिक दिनचर्या में शामिल हुआ करते थे, अब उसे हल्के हाथों लेने लगा था राजीव। शायद इस अतिआत्मविश्वास से कि कोई भी सवाल कितना भी कठिन क्यों न हो, वो उसे चुटकियों में हल कर सकता है।

पिछले कुछ महीनों में सतत अभ्यास से दूर ही रहा था राजीव, बाकी समय उसने अन्य विषयों जैसे कि वैकल्पिक विषय "पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन" आदि में लगाया था ताकि बाकी के विषयों में भी अच्छे अंक प्राप्त कर सके।

परीक्षा हाल में जब प्रश्नपत्र राजीव के सामने आया, गणित के प्रश्नों को देख मुस्कुरा उठा, ये तो वही प्रश्न और प्रमेय थे जिसमे उसने कुछ महीने पूर्व ही महारत हासिल कर ली थी, जोश से भरकर तुरंत उन प्रश्नों को हाल करने में जुट गया राजीव, किन्तु ये क्या जब उन प्रमेयों को सिद्ध करने बैठा तो एक एक कर "स्टेप्स" भूल रहा था राजीव। जिन फोरियर सीरीज के सवालों को वो पलक झपकते हल कर लेता था, आज प्रश्नों का समुचित उत्तर दे पाने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा था। 

वजह शायद उसका गणित विषय को लेकर अतिआत्मविश्वास था जिसकी वजह से उसने लगातार अभ्यास छोड़ दिया था और आज जब परीक्षा में वही प्रश्न आये तो उन्हें हल करने में असमर्थ था राजीव।

केवल कंठस्थ कर लेने से गणित के प्रश्न हल नहीं होते, अपितु उसके लिए निरंतर अभ्यास व स्व- संतुलन की आवश्यकता होती है। अतिउत्साह और जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास घातक साबित हो सकते हैं। 

अपने निरंतर स्वाध्याय दिनचर्या और सतत अभ्यास की आदत छोड़ कर राजीव ने " आ बैल मुझे मार" उक्ति चरितार्थ कर दी थी, परिणामतः आज महत्वपूर्ण परीक्षा में उसका अतिआत्मविश्वास ही उसे ले डूबा ! 

धैर्य और सतत अभ्यास ही सफलता की कुंजी होती है। 'आत्मविश्वास' को 'अतिआत्मविश्वास' न बनने दें अन्यथा आप स्वयं ही बैल को निमंत्रण दे रहे हैं कि "आ बैल, मुझे मार ! "


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