Varsha abhishek Jain

Inspirational


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Varsha abhishek Jain

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वक्त सबका आता है

वक्त सबका आता है

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कल्याणी देवी और केशव जी बैंच पर बैठे खुद को एक अपराधी जैसा महसूस कर रहे थे।अतीत में की गई गलतियों का पश्चाताप करने का वक्त आ गया था।


"चाय पियोगे आप दोनों"एक आवाज ने दोनों को झकझोर दिया।आवाज़ जानी पहचानी जो थी।


"सुधा जी आप" कल्याणी देवी ने पूछा।


"हां मैं,मेरे यहां इस वृद्धाश्रम में होने पर आपको अच्मभा तो नहीं होना चाहिए।मुझे आश्चर्य तो इस बात का है कि,आप दोनों यहां कैसे।क्या आपकी बेटी ने आपको भी निकाल दिया,या बेटे ने"। सुधा जी ने भरे गले और थोड़े गुस्से से कल्याणी जी और केशव जी की और देखा।


"कल्याणी देवी और केशव जी दोनों बिना कुछ बोले अपना समान उठाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गए।"


सुधा जी का अतीत आज फिर उनके सामने आ गया था।कल्याणी देवी की बेटी राशि को बड़े धूम धमा से सुधा जी अपने घर की वधू बना कर लाई थी।सुधा जी के एक ही बेटा था शौर्य बेटी की कमी राशि ने पूरी कर दी थी!सुधा जी ने राशि को भरपूर प्यार और सम्मान दिया।पति का साथ तो पहले ही छूट गया था।अब तो उनकी जिंदगी शौर्य और राशि के इर्द गिर्द ही घूमती थी।राशि को कभी किसी चीज की कमी ना होने दी।शादी की पांचवीं सालगिरह पर राशि और शौर्य को सुधा जी ने भेंट स्वरूप अपने घर के कागजात सौंप दिए।सुधा जी का कहना था अब ये ही तो मेरे बच्चे है इन्हीं का है सब कुछ आज दो या फिर कल।इन्हीं को तो देना है।


'मम्मी जी आपका रानी हार मुझे दीजिए ना पहनने के लिए,भाई की शादी है मैं सब से अलग दिखना चाहती हूं।"राशि ने अपनी सास सुधा जी को कहा।


"हां बेटा जरूर ।पहन ले ।लेकिन थोड़ा ध्यान रखना बेटा शादी में बहुत लोग आयेगे जायेगे,इधर उधर मत रख देना।"


"हां मम्मी जी ध्यान रखूंगी"।राशि ने बोल कर रानी हार अपने कब्जे में ले लिया।


जब शादी से लौट कर आई तो दो तीन दिनों तक राशि ने रानी हार के बारे में कुछ नहीं कहा।ना वापिस सुधा जी को दिया।सुधा जी ने भी संकोच में कुछ ना पूछा।


"बेटा राशि वो जो रानी हार है वो वापिस संभाल कर रख देती हूं।तुम दे दो"।सुधा जी ने कहा।


"मम्मी जी मैंने तो उसे पहले ही संभाल कर रख दिया है,मैंने और शौर्य ने बैंक में एक लॉकर लिया है उसमे रख आई।सारे गहने मैंने लॉकर में रख दिए"।राशि ने कहा।


"हां मम्मी राशि ने सोचा इतना मंहगा हार घर में रहे सही नहीं इसलिए हमने वहां रख दिया"। शौर्य ने कहा।


"धीरे धीरे हर चीज पर राशि ने अपना हक जमा लिया।घर के खर्चे से लेकर बैंक के खाते में सब जगह राशि का ही नाम था।घर तो पहले ही सुधा जी ने बेटे के नाम कर दिया था।"


लेकिन होनी को तो कुछ ओर ही मंजूर था,एक सड़क दुर्घटना में बेटे की असामयिक मृत्यु से दुख का पहाड़ टूट पड़ा।अभी तो राशि की शादी को छ वर्ष ही हुए थे।बेटे से बिछोह की पीड़ा और राशि की आगे की जिंदगी को लेकर सुधा जी बहुत परेशान थी। मन ही मन सुधा जी ने ठान लिया था कि वो फिर से राशि की जिंदगी में खुशियां ला कर रहेगी।कल्याणी देवी और केशव जी भी अब सुधा जी के घर ही रहने आ गए।सुधा जी ने सोचा अच्छा है बेटी के पास कुछ दिन रहेंगे तो राशि का भी मन बहल जाएगा।लेकिन अब परिस्थिति बदल रही थी।घर में कल्याणी जी का साम्राज्य स्थापित हो रहा था।घर में क्या आएगा क्या बनेगा सब कल्याणी देवी ही देखती थी।सुधा जी अपने ही घर में मेहमान बन गई थी।


"राशि ,अब तुझे सोचना चाहिए कि आगे क्या करना है।"कल्याणी देवी ने राशि को कहा।


"किस बारे में मां"राशि ने जवाब दिया।


"अरे घर के खर्चे कम करना चाहिए।अब कमाने वाला तो गया ।"केशव जी ने कहा


"भगवान की दया से शौर्य ने सारी व्यवस्था कर दी थी।घर है ही, शौर्य के बीमा के पैसे भी आ गए है।अब सोच रही हूं बिज़नेस मैं संभाल लूं।तो फिर कोई दिक्कत नहीं होगी।" राशि ने कहा।


"हां सही बोल रही है तू,मैंने तो तेरे भाई भाभी को भी यहीं बुला लिया है,अब वहां का व्यापार तो इतना चलता नहीं तो तेरे साथ ही काम कर लेगा तेरा भाई ,तेरी भी मदद हो जाएगी"।कल्याणी देवी ने कहा।


"पर मां भाई भाभी को यहां बुलाने से पहले पूछ तो लेते।यहां उनको घर लेना पड़ेगा कितने खर्चे बढ़ जाएंगे भाई के"।राशि ने कहा।


"अरे वो रह लेगा ना अपने साथ इस घर में।अब हमारा मन तो यही लग गया है,फिर इतना बड़ा घर है तो किराए की घर की क्या जरूरत"।केशव जी ने कहा


"तेरी सास का हाथ बड़ा खुला है राशि,इतने इतने सब्जियां मंगा लेती है।फिर काम वाली को भी एडवांस दे दिया। और उनके दवाई के खर्चे राम राम ।अब ऐसे तो घर नहीं चलता ना तुझे कुछ सख्ती बरतनी होगी राशि।"कल्याणी जी ने अपना जहर राशि के कानों में उधेल दिया।


बाहर खड़ी सुधा जी ने सब सुन लिया।कमरे में आकर क्रोध से अपनी बात रखी"आप मां बाप हो कर अपनी बेटी को क्या शिक्षा दे रहे है।मेरे ही घर में मेरे खर्चे गिन रहे है।"


"मम्मी जी , आप मेरे मां बाबा से ऐसे बात मत कीजिए।ये घर मेरा है ।अब मेरे मां बाबा और भाई भाभी भी यही रहेंगे। आपको रहना है तो रहिए नहीं तो वृद्धाश्रम बहुत है इस शहर में"।राशि ने कहा।


राशि की मुंह से ऐसी बात सुन सुधा जी को बहुत दुख हुआ।


"हां समधन जी मेरी बेटी ऐसे भी बहुत दुखी है,आप के क्या गया है, आपको क्या दुख"।कल्याणी जी ने कहा।


"मेरा क्या गया है,मेरा बेटा गया है।बेटे जाने का दुख क्या पति जाने के दुख से कम है।मैंने तो अपने पति ओर बेटे दोनों को खो दिया।क्या मुझे कोई दुख नहीं सारा दुख आपकी बेटी को है"।सुधा जी का गला भर आया।


"और राशि क्या बेटे की कमाई ,घर ,व्यापर में एक मां का कोई हक नहीं सिर्फ उसकी पत्नी का हक है। मैं मानती हूं तुम दुखी हो मैं कहां जाऊं इस उम्र में।"सुधा जी गिड़गिड़ाई।


"कहीं भी जाइए पर मेरे सामने मत आइए ।"राशि ने अपना फरमान सुना दिया।


एक हफ्ते बाद सुधा जी को वृद्धाश्रम में भेज दिया गया।और आज उसी वृद्धाश्रम में कल्याणी देवी और केशव जी को उनका बेटा छोड़ गया,क्यूंकि अब उनके बेटे बहू उनका बोझ नहीं उठा सकते।राशि के भाई ने राशि के कारोबार पर अपना एकाधिकार कर लिया।भाभी ने भी राशि से सारे रिश्ते खत्म कर दिए।राशि ने भी दूसरी शादी कर ली और विदेश चली गई,मां बाबा को साथ अब वो भी नहीं रखना चाहती थी।

कहते है ना इस जन्म के कर्मों को इसी जन्म में भोगना पड़ता है।वहीं आज कल्याणी जी और केशव जी के साथ हो था था। अगर उन्होंने लालच में ना आकर सही सीख दी होती तो आज वो भी अपने घर में होते और सुधा जी भी।सुधा जी ने तो पहले ही राशि को अपनी बेटी मान लिया था।समय आने पर वो खुद ही राशि की दूसरी शादी करा राशि को विदा कर देती ।



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