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Saroj Verma

Abstract


4.5  

Saroj Verma

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विवाह--एक खतरनाक ब्यथा(१)

विवाह--एक खतरनाक ब्यथा(१)

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"का हुआ बड़की जीजी"? इतनी हैरान-परेशान काहे दिख रही हो.." हीरामनी ने अपनी बड़ी ननद से पूछा..!!

"परेशान ना हों तो क्या करें, तुमही बताओ छोटी भौजी,शोभित हल्दी लगवाने के लिए बइठा है और हमारी ननद रानी का कुछु अता-पता नहीं है,ना जाने कब आएगी,ऊपर से ठंड का मौसम है,कब हल्दी लगेगी,कब उबटन, होगा,कब तेल चढ़ेगा,हम तो परेशान हो गए हैं,कसम से___ब्याह ना हुआ,जी का जंजाल हो गया है,काम करते करते दम निकला जा रहा है और ऊपर से ये प्राणखाऊं रिश्तेदार". ... सावित्री परेशान होकर बोली।।

"ज्यादा लोड ना लो बड़ी जीजी ,ब्याहे मा इ सब तो होवत रहत हैं"__हीरामनी बोली।।

इतने में बाहर ऑटो के रूकने की आवाज सुनाई दी..बाहर से कलावती अपने भाई को आवाज देती हुई अंदर घुसी,ओ..राघव !!राघव__

 राघव आवाज सुनकर बाहर आए और पूछा.. हां जीजी..!! का बात है,काहे आवाज दे रही थीं..!!

"कुछु नहीं.. ऑटो वाले को चार सौ रुपए दे दो और राघव जो कि दूल्हे का पिता है उसने ऑटो वाले को जल्दी से चार सौ रूपए दिए और जल्दी से कलावती के हाथ से उसका समान लेते हुए पूछा,जीजी .. जीजा जी नहीं आए और दोनों भांजे भी साथ नहीं है, बिल्कुल अच्छी बात नहीं है, ऐसे नहीं चलेगा।।"

तभी कलावती बोल पड़ी,काहे तुम रिजर्वेशन करवाए थे का सबका और फिर हमार दोनों बिटवा तो बहुअन के वश में है,हम तो कुछु कह नहीं सकते और जीजा से तुम कुछु कहें नहीं,कार्ड भेजने से थोड़े ही कुछु होता है, रिजर्वेशन ही करवा देते हैं।।

राघव बोला, "ठीक है हम माफी मांग लेते हैं जीजा जी से, अभी आज तो मण्डप हैं बरात तो परसों है,कल मायना है और तिलक भी कल ही हैं और कल तिलक चढ़ने के समय तक तो आ ही जाएंगे और राघव अपने जीजा जी से फोन पर बात करने लगे।।"

और उधर सावित्री ने कलावती के पैर छुए और कहने लगी, चलिए जीजी !ठंड है पहले बन्ने को हल्दी तेल चढ़ाकर,उबटन कर दीजिए।।

"अरे, सावित्री भाभी तुम भी गज़ब करती हो, मेहमान ने अभी अभी घर में प्रवेश किया है, चाय-पानी कुछ भी नहीं और घर में घुसते ही काम बता दो",कलावती तुनकते हुए बोली।।

"नहीं,जीजी !! हमारा वो मतलब नहीं था,बस हम तो बोले थे कि सब काम जल्दी से निपट जाता, कोई बात नहीं हम आपके लिए अभी चाय नाश्ता लाए देते हैं,आप खा लीजिए फिर कुछ करिएगा", इतना कहकर सावित्री, नाश्ता लेने चली गई।।

सावित्री जैसे ही कलावती के लिए नाश्ता लेकर आई उधर से शुभांगी सड़ा सा मुंह बनाए हुए चली आ रही थी, शुभांगी को ऐसे देखकर सावित्री का दिल पसीज गया, आखिर क्या हुआ हमारी बिटिया को ऐसे उदास कैसे दिख रही है, सावित्री ने मन में सोचा, और पूछ ही बैठी शुभांगी से, आखिर मां का हृदय है, बच्चों का कष्ट कैसे देख सकती है।।

"अरे,ओ बिटिया रानी का हुआ,अइसे मुंह लटकाए काहे,घूम रही हो,का बात है", सावित्री ने शुभांगी से पूछा।।

"कुछ नहीं मम्मी,बस ऐसे ही", शुभांगी बोली।।

"नहीं, बिटिया बताओ, हमें नहीं बताओगी,हम मां है तुम्हारी", सावित्री ने एक बार फिर पूछा।।

शुभांगी यहीं चाह रही थी, मां पूछे और वो फटाफट और पैसे मांग ले मां से__वो क्या है ना,वो तुम्हारे कुंवर जी कह रहे थे कि,हम सबसे बड़े दमाद है घर के और तुम्हारे घरवालों ने सिर्फ पन्द्रह हज़ार के कोट पैंट में टरका दिया,एक सोने की अंगूठी ही दिलवा देते।।

अब सावित्री उलझन में फंस गई और मन में सोचने लगी,कैसा दामाद है,जब देखो तब लेने की ही सोचता रहता है,खैर तब भी सावित्री ने हिम्मत करके कहा__

"बिटिया तुम उदास ना हो,चलो हमारे साथ अभी तुमको बीस हजार दे देते हैं और बाजार जाकर एक अच्छी सी अंगूठी खरीद लाओ दमाद जी के लिए।"

इतना सुनकर, शुभांगी उछल पड़ी,"सच!! मम्मी ,तुम कितनी अच्छी हो "और पैसे लेने सावित्री के पीछे पीछे चल पड़ी।।

इसी तरह के रिश्तेदारों के बीच सावित्री और राघव का दिन बीत गया,रात को मंडप की पंगत हुई, सबने स्वादिष्ट गरमागरम भोजन का आनंद उठाया,खाने में चने की दाल, कढ़ी,कद्दू की सब्जी, सलाद, चावल , पूड़ी खाने वालों के लिए पूडियां थी और रोटी खाने वालों के लिए रोटियां थीं, गरमागरम रसगुल्ले भी थे मीठे में।।

लेकिन कुछ लोगों खासकर भगवान दास मामा जी ने खाने के बाद कहा,आज का खाना थोड़ा फीका हो गया,जब तक एक दो पैग ना हो,तो साला खाना अंदर जाता ही नही,आज तो ठीक है लेकिन कल ये कसर ना रह जाए।।राघव और सावित्री एक दूसरे का मुंह देखकर रह गए।।खैर सब सोने की तैयारी में लग गए__

दूसरे दिन सुबह जो भगदड़ मची थी घर में,वो देखने लायक थी क्योंकि आज मायने के साथ साथ तिलक भी था,सब अपने बनाव-श्रृगांर के समान जुटाने में लगे थे, सबसे ज्यादा उत्साह तो नवयुवक हो रहे, लड़कों को था,सब अपनी अपनी जोड़ियां ढूंढने के चक्कर में थे,कौन सा परफ्यूम,कौन से कपड़े,कौन से जूते,बस हैंडसम दिखने में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।।

इसी तरह की आपाधापी में सारा दिन ब्यतीत हो गया, अचानक फिर कलावती बुआ बिफर पड़ी, सावित्री तो जैसे अंदर तक हिल गई कि अब ऐन टाइम पे का बिगड़ गया जीजी का।।घबराई सी जा पहुंची,का हुआ जीजी,कछु परेशानी है, हमें बताओ,ताकि हम कुछ कर पाएं, सावित्री ने कलावती से पूछा।।

अब तुम का हमारी समस्या क्या समझोगी, समझना होता तो हमारे लिए पहले से नई साड़ी ना खरीद के रखती,अब हम का पहने, कोई भी ढंग की साड़ी नहीं है हमारे पास,कलावती शिकायत करते हुए बोली।।

"अच्छा तो ये बात, कोई बात नहीं जीजी, आप हमारी बनारसी साड़ी ले लो,जो हमने आज पहनने के लिए खरीदी,अब तो खुश!! रूकिए हम लाकर देते हैं,"अब कलावती के मनहूस थोबड़े पर गजब की मुस्कान आ चुकी थी।

अब सब तैयार हो चुके थे लेकिन सावित्री की बड़ी भाभी मतलब भगवान दास मामा की दुल्हिन,अभी तक तैयार होकर बाहर ना आई थी, सावित्री ने सबसे पूछा भी कि बड़ी भाभी कहां है तो पता चला वो अभी तक कमरे से बाहर ही नहीं निकलीं।

सावित्री भीतर गई, देखा तो बड़की भाभी तैयार तो हो गई थीं लेकिन मायूस सी लग रही थीं__

सावित्री ने पास जाकर पूछा,का हुआ बड़की भौजी ? ऐसे उदास काहे बैठी हो...

लेकिन पानकुंवर भाभी टस से मस ना हुई,ना ही कछु बोली।

सावित्री ने एक बार फिर पूछा,तब जाके थोड़े थोड़े बोल पानकुंवर भौजी के मुंह से फूट पड़े____

अब का बताएं,बिट्टी,हमाय कौन से बड़े बड़े सोने के सीतारामी हार धरे है,जो पहिर के बाहर निकल आते,हमाई किस्मत तुम्हारे जैसी कहां है,बिट्टी!! ऐसा थोड़े ही कि तुम अपनी इज्जत बचाएं खीतिर अपन हार उतार के हमरे गले मा डाल दहिओ,पानकुंवर भौजी ने इस तरह अपनी रामकहानी कह सुनाई।।

अब सावित्री भला क्या करती, अपने गले का हार उतारकर बड़की भौजाई को पहना दिया,बड़की भौजाई फटाफट सज धज एक बड़ी सी कुटिल मुस्कान के साथ बाहर आ गई ‌।।

बाहर सब तैयारियां हो चुकी थी,एक तरफ खाना पीना चल रहा था,बफर सिस्टम था सब अपने अपने पसंद के खाने का आनंद उठा रहे थे,अलग अलग कोनो में नई फसलो के झुंड लगे थे,नई फसल मतलब युवा होते बच्चे, लड़कियों वाला ग्रुप लड़कों को निहारते हुए कहता....देख ..देख कितना हैंडसम है,देख ..देख कितना स्मार्ट हैं,देख उस कोट वाले को देख,बार बार मेरी ओर देख रहा है, हां..यार.. लगता है लट्टू है तुझ पर।।

और लड़कों वाला ग्रुप देख यार..वो पीली वाली कितनी हॉट है और वो गुलाबी वाली हाय..उसकी अदाएं तो देख...

और हमने भी देखा है कि आजकल की लड़कियां जब खाना लेने जाती है तो लड़कों को देखकर और इतराने लगती है, बनने लगती है, अच्छा भइया,ये ज्यादा तो मीठा नहीं है,ये ज्यादा तीखा तो नहीं है, मुझे इससे प्रॉब्लम है, मुझे उससे प्रॉब्लम है।और लड़के उन लड़कियों का इतराना देखकर मजे लेते रहते हैं, फिर महिलाएं की टोलियां भी तब तक आ गई,एक से एक बढ़कर बैकलेस ब्लाउजेज, सुंदर सुंदर साड़ियों से सजी हुई महिलाएं, लेकिन भगवान कसम जहां पुरुष कोट और पैंट में होता है और वही पर उन्हीं महिलाओं को ना तो शॉल की जरूरत पड़ती है और ना स्वेटर की, चाहें कांपती रहें, चाहें दांत किटकिटाती रहें और तो और ऊपर से आइसक्रीम भी खाती है,

"जय हो मदर इण्डिया!!चरण स्पर्श करने का मन करता है ऐसी महिलाओं के..चलिए अब आगे चलते,अभी खत्म नहीं हुआ,ये हमारी कहानी है इतनी जल्दी खत्म कैसे हो सकती है.."

हां,तो कुछ बुजुर्ग भी सर्किल में खड़े रहते हैं, आते जाते लड़के -लडकियो को निहारते रहते हैं,ग़लत मत समझि एबस वो तो जोड़ियां बनाने में लगे रहते हैं,ये लड़की फलाने के लड़के के लिए ठीक रहेगी और वो लड़का ढिंमकाने के लडकी के लिए सही रहेगा...।।अब तिलक चढ़ने वाला था और हमारे बुंदेलखंड में तिलक और शादी में जब तक कोई किच किच ना हो तो विवाह समारोह सम्पन्न ही नहीं माना जाता,ये शगुन होता है।।थोड़ी बहुत चिक चिक के बाद ये भी जैसे तैसे निपट ही गया लेकिन बड़े मामा ने दारू पीकर जो हंगामा बरपाया ना कि गुलाम अली की ग़ज़ल भी फेल हो गई,हंगामा है क्यो बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है हमारा कायदा नहीं करवाया, कैसे रिश्ते दार है,इनके घर की लड़की हमारे घर आकर, कैसे इज्जत करेंगी,जब घरवालें ऐसे हैं।।

जैसे तैसे मामा जी को अकेले में ले जाकर समझाया गया तब उनकी मोटी अकल में थोड़ी बुद्धि आई।।जैसे तैसे सब मामला निपट गया, कार्यक्रम का भी समापन हो गया।। सब सो गए__

बाकी़ अगले भाग में_____

   

       

  



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