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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Abstract


4.6  

मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Abstract


उम्मीद की डोर (कहानी)

उम्मीद की डोर (कहानी)

5 mins 342 5 mins 342

उम्मीद की डोर 

(कहानी)

डॉक्टर विवेक गुप्ता की ज़िन्दगी वैसे तो पूरी मशीन की तरह बन गई थी। एक कम्पलीट प्रोग्राम्ड लाइफ। उनका एक पूरा सिस्टम था। या यूँ कहें कि उनके साथ जुड़ा था एक पूरा काफिला। जिसमें डॉक्टरों की टीम, पर्सनल सेक्रेटरीज, ओपीडी का स्टाफ, जो मरीज देखने में उनकी मदद करता था। 

ऐसे तो उनका एक-एक मिनिट बहुत कीमती था। लेकिन इन सबके बावजूद अपनी दिनचर्या में व्यक्तिगत शौक भी कभी नज़रंदाज़ नहीं करते थे। उनका मानना था कि "मैं पहले इंसान हूँ, फिर एक डॉक्टर।" 

यही वजह थी कि स्पोर्ट के अलावा लाइट म्यूजिक भी उनका पसंदीदा शौक था। जगजीत के गज़लें तो जैसे दीवानगी की हद तक पसंद थीं। लेकिन आज अंदर से बहुत परेशान थे। ये गज़लें भी उनका दिल बहलाने में असमर्थ थीं। एक अजीब ही अंतर्द्वन्द था। जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। एक ऐसी जंग जिसे वह हार चुके थे। शायद आज उन्होंने दिमाग़ की अनसुनी कर, दिल की बात मान ली थी। तभी तो दिमाग़ उन्हें बार-बार पश्चाताप करने पर मजबूर कर रहा था। कभी-कभी ये दिल और दिमाग़ की जंग भी न, चैन नहीं लेने देती। दरअसल जब एक अच्छे इंसान का दिल, दिमाग़ के ऊपर हावी हो जाता है तो सारे समझदारी भरे तर्क बेमानी हो जाते हैं। 

यही कारण था कि नींद उनसे कोसों दूर जा चुकी थी। सोचा, शायद... समीर की पत्नी को फ़ोन करके उसकी तबियत पूछने पर कुछ राहत महसूस हो।

-"भाभी जी, नमस्कार। कुशल मंगल तो है न? कैसे हैं, अब समीर जी?" एक ही सांस में सारे सवाल पूछ लिए। लेकिन जवाब की जगह खामोशी ने व्याकुलता और बढ़ा दी।

फिर झल्लाहट में कहा-

-"आप बोलती कुछ क्यों नहीं? क्या हुआ, उनको?"

-"भाई साहब ...! समीर ... हमें अकेला छोड़कर चले गए"- उन्होंने बड़ी मुश्किल से कहा। हम आपको बताने ही वाले थे।

-"अरे ... ये क्या बोल रहीं हैं, आप? ऐसा कैसे हो सकता है? अभी शाम ही को तो मैं आपके घर आया था।"

-"बस, भाई साहब। उसके आधा घंटे बाद ..."उनकी तबियत बिगड़ने लगी। उनके शब्द अटक-अटक कर निकल रहे थे।

-"तो फिर, मुझे क्यों नहीं बुलाया?" डॉक्टर की आवाज़ में सख्ती के साथ पछतावा भी था।

- मैं आपको बुलाने को कहती रही, लेकिन उन्होंने मना कर दिया बोले,- "अब डॉ की ज़रूरत नहीं है, मुझे जाना ही होगा।"

बस, इतना सुनना था कि डॉ विवेक अपनीं जगह स्तब्ध से खड़े रह गए। उनके कानों ने वह सुन लिया था जिसका उनको अंदेशा तो था। लेकिन फिर भी झुठलाना चाहते थे। कभी-कभी सब कुछ जानते-समझते भी दिल यकीन करने को तैयार नहीं होता।

तभी एक परिदृश्य आँखों के सामने से ओझल होता नजर आने लगा।

टेनिस कोर्ट में रोज़ ही तो मिलते थे, समीर। शहर के एक कामयाब बिसनेस मैन। लेकिन ज़िन्दगी की आपा-धापी ने इतनी इजाज़त ही नहीं दी कि वे एक दूसरे को अच्छे से जान पाते। बस टेनिस की बाल थी जो एक रिश्ता जोड़े थी। 

टेनिस कोर्ट के टाइम कीपर ने भी तो कमबख्त, कभी निर्धारित समय से अधिक खेलने का मौका नहीं दिया था। जैसे ही समय समाप्त होता, उसकी सीटी बज जाती। जब बाल से नज़र हटती तो इस कोर्ट पर खेलने के लिए दूसरे पार्टनर का जोड़ा तैयार नज़र आता। और दोनों ड्रेस चेंज कर एक हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बिदा होते और अपने-अपने गंतव्य की ओर चले जाते ।

फिर अचानक एक दिन समीर, उनके केबिन में थे।

"डॉ गुप्ता, मुझे ब्रेन ट्यूमर है। तुम्हारे पास रेफर हो कर आया हूँ। क्या मैं ठीक हो जाऊँगा?" बेबाकी से सवाल किया।

"क्यों नहीं, समीर। बेशक, आजकल मेडिकल साइंस बहुत एडवांस हो चुकी है।" डॉक्टर ने भी एक दोस्ताना जवाब दिया।

जल्द ही समीर का सफलता पूर्वक आपरेशन भी हो गया । 

कुछ दिन बाद फिर वही समस्या हुई। इस बार आपरेशन क्रिटिकल था। लेकिन किसी तरह हो गया।

समीर के पास सवाल एक ही था।

-"डॉ, क्या मैं ठीक हो जाऊँगा?"

और डॉ विवेक के पास भी एक ही जोशीला जवाब।

- "हाँ, समीर, क्यों नहीं?"

धीरे-धीरे, रोग अन्दर ही अन्दर विस्तार ले रहा था।

रेडियो और कीमोथेरेपी की ज़रूरत थी। समीर बार-बार वही सवाल करते और डॉ विवेक के पास भी उम्मीद भरा वही जवाब होता। यही जवाब समीर के अन्दर ऊर्जा के संचार के लिए काफी था। जो ज़िन्दगी को जीने का हौसला देता था। एक उम्मीद की डोर थी।

अब डॉ विवेक और समीर का रिश्ता जज़्बात से जुड़ चुका था। डॉ विवेक को जब कभी समय मिलता, समीर के घर चले जाते। समीर की हालत गिरती जा रही थी। समीर का सवाल विश्वास की हदों को पार कर रहा था। तो डॉ के जवाब में जोश और होश का मिला-जुला असर आ चुका था। कई बार उसने सोचा, समीर को सच-सच बता दे। लेकिन हिम्मत नहीं हुई। 

दिल-दिमाग़ की इसी जंग में आज दिल की जीत हुई थी। आज फिर समीर का वही सवाल था। लेकिन लहजे में सख्ती थी ।

-"विवेक, तुम सच-सच क्यों नहीं बता देते ?"

- देखो समीर, तुम बहुत समझदार हो और बहादुर भी। लेकिन तुम तो जानते हो। नियती के आगे किसी का जोर नहीं चलता। हमारे बस में तो बस, एक कोशिश ही है।

समीर उसका मतलब समझ चुका था। एक उम्मीद की डोर थी जो अब टूट चुकी थी। ऊर्जा स्रोत का भंडार खत्म हो चुका था। जो उसे जीने की हिम्मत देता था। जिसने इस भयावह बीमारी से आज तक लड़ने का हौसला दिया था, आज टूट चुका था। मर्ज़ अब अपनी आखरी स्टेज पर था।

तभी तो समीर को आज, अब डॉ की ज़रूरत नहीं थी। डॉक्टर के दिल के फैसले ने उसकी झूठी ही सही, एक उम्मीद डोर को तोड़ दिया था।


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