Akanksha Srivastava

Inspirational


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Akanksha Srivastava

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तर्पण

तर्पण

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पिता जी मैंने आपको कभी श्राद्ध करते नहीं देखा। साल में बस पंद्रह दिन ही तो होते हैं। पितृ पक्ष वर्ष में एक बार आता है। ये पन्द्रह दिन हमें अपने पितरों की याद दिलाते हैं। इसे तर्पण पक्ष कहते हैं। आपको भी बाबाजी का श्राद्ध श्रद्धा से करना चाहिए।

मैं सोचने लगा कि तर्पण का अर्थ ये नहीं है कि हम कर्म कांड करे और कठिन समय व्यतीत करने के लिए बाध्य हैं।

तर्पण मन से भी होता है। हम अपने प्रिय पूज्य जनों को उनकी तिथियों में याद करें। उनके विषय में अपने बच्चों को बताएं। उनकी जीवन शैली उनकी उपलब्धियां हमें अपनी अगली पीढ़ी को अवश्य हस्तांतरित करनी हैं। तभी तो वे जानेंगे कि उनके दादिहाल एवम् ननिहाल में कौन कौन लोग थे और वे क्या क्या करते थे। यही हमारी असली धरोहर है जो कि हम अपनी अगली पीढ़ी को देकर जाएंगे। जिससे वे अपने श्रद्धेय जनों को भुला ना पाए।

यही हमारा असली तर्पण होगा।

दोनों हाथों में भर कर यादों के श्रद्धा सुमन अर्पित कर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

सोचते सोचते न जाने कितनी पुरानी यादों में खो गया।

डॉक्टर ने आज कहा है कि पिता जी की सेवा कर लीजिए बस जब तक चल रहे हैं तभी तक।

मन भारी हो रहा है मां के जाने के बाद पिता जी ने कभी मां की कमी महसूस ही नहीं होने दी। एक पल में ही मां बन गए हम बच्चों के ।

पर आज ऐसा सुन के लग रहा है कि सब छूट रहा है भारी मन से पिता जी के लिए

मूंग की कचौड़ी बनाने को कहा है। पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी। वह भी अपने काम में लग गई। कुछ ही देर में रसोई से खुशबू आने लगी कचौड़ियों की। खीर भी बन गयी। हम सब पिता के पास बैठ गये। उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें निहारते हुए मैं बोला -

"बाबा ! आज आपकी पसंद की चीज बनी है। थोड़ी खीर खायेंगे।"

पिता ने आँखें झपकाईं और हल्का सा मुस्कुरा दिए। वह अस्फुट आवाज में बोले-

"कचौड़िया बन रहीं हैं क्या ?"

"हाँ, बाबा ! आपकी पसंद की हर चीज अब मेरी भी पसंद है। अरे! महिमा जरा कचौड़िया और खीर तो लाओ।" मैंने आवाज लगाईं ।

"लीजिये बाबू जी एक और " उसने कचौड़ी हाथ में देते हुए कहा।

"बस ....अब पूरा हो गया। पेट भर गया। जरा सी खीर दे।" पिता बोले।

 मैंने खीर का चम्मच हाथ में लेकर मुँह में डाल दिया। पिता जी हम सब को प्यार से देखते रहे।


" सदा खुश रहो बेटा। मेरा दाना पानी अब पूरा हुआ। " पिता बोले।

"बाबा ! आपको तो धर्मेंद्र की खूब फिल्में देखनी है। आप मेरे हीरो हो।" आँखों में आंसू बहने लगे थे।

वह मुस्कुराए और बोले - "तेरी माँ मेरा इंतज़ार कर रही है। अगली पिक्चर तेरा पोता बनकर आऊंगा, तब देखूंगा तेरी गोदी में बैठ के बेटा।"


पिता हमें देखते रहे। मैंने प्लेट उठाकर एक तरफ रख दी, मगर पिता मुझे लगातार देखे जा रहे थे। आँख भी नहीं झपक रही थी। मैं समझ गया कि यात्रा पूर्ण हुई .

तभी मुझे ख्याल आया, पिता कहा करते थे –


"श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर, जो खिलाना है अभी खिला दे।"

 उनके जाने का दुःख तो जरूर है पर आत्मिक संतोष भी था जीते जी मैंने पूरी कोशिश की माँ बाप का सम्मान करूं और उन्हें जीते जी खुश रख सकूँ। मैं अपने रीति रिवाज से कभी विमुख नहीं होऊंगा। लेकिन तर्पण सिर्फ मन से करूँगा।

सोचते सोचते अचानक मेरा तीन वर्षीय पोता मेरी गोदी में आ बैठा और तोतली आवाज में मुझसे बोला।

दादू! खीर और कचौड़ी खानी है।

मेरी आँखों से आंसू निकल आये। मैंने अभी अभी बाबा को महसूस किया। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बस इतना कहा हाँ ! जरूर!



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