Rashmi Nair

Inspirational


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Rashmi Nair

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तालियों की गड़गड़ाहट

तालियों की गड़गड़ाहट

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उत्तर भारतीय रेल बरेली के दफ्तर का ऑडिटोरियम हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत हिंदी दिवस के स्वागत के लिये पुरी तरह सज धजकर तैयार हो चुका था। सारे कर्मचारी भी बहुत खुश और उत्सुक थे। आयोजक सारे हिंदी दिवस के अवसर पर दिवस के प्रथम दिवस के उद्घाटन समारोह को सफल बनाने के लिये कई दिनों से प्रयासरत थे।

आज वो दिन आ गया। साढ़े दस बजे तक सब कर्मचारी अधिकारी तथा एक मैत्रिक स्पर्धा के प्रतिभागी भी अपने-अपने स्थान पर उपस्थित हो गये। अब बड़ी बेसब्री से मुख्य अतिथी तथा निर्णायकगण का इंतजार हो रहा था। कुछ ही देर बाद उन्होने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की और हिंदी दिवस के उदघाटन समारोह की शुरुआत हुई।


 निवेदक महोदय ने सभी उपस्थित मुख्य अतिथि के साथ अधिकारियों ,निर्णायक मंडल, प्रतिभागियों तथा प्रेक्षकों का स्वागत किया तथा संबोधित किया। उसके बाद उनकी सूचना के अनुसार मुख्य अतिथि "श्री गणेश एवं माता सरस्वती " पूजन, माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कार्यक्रम में शामिल होने के लिये लिये सब खड़े हो गये। उसके बाद सब अपनी अपनी जगह पर विराजनमान हो गये।


 निवेदक ने सबका धन्यवाद प्रकट करते हुए मुख्य अतिथि से आजके विशेष दिवस के लिये दो शब्द कहने का अनुरोध किया। वो भी मुस्कुराते हुए उठ गये। मिठे और कम शब्दों में इस दिन की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। समय की महत्ता समझते हुए सभी ने समयसीमा को ध्यान में रखते हुए कम समय में बहुत महत्वपूर्ण बातें बताई और अपना भाषण जल्दी ही समाप्त किया। उनकी इस मित भाषिता से प्रसन्न होकर सबने बहुत जोरों से तालियाँ बजाई।

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 उनके बाद कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी अपने अपने विचार प्रकट किये। उनके विचारों की सराहना हेतू सबने बहुत खुश होकर तालियाँ बजाई। समय की महत्ता समझते हुए सभी ने समय सीमा को ध्यान में रखते हुए कम समय में बहुत महत्वपूर्तण बातें बताई और अपना भाषण जल्दी ही समाप्त किया। उनकी इस मित भाषिता से प्रसन्न होकर सबने बहुत जोरों से तालियाँ बजाई।


 निवेदक महोदय पुनꓽ मंच पर आये। उन सबका धन्यवाद प्रकट करने के बाद हिंदी पखवाड़े में होने वाले कार्यक्रम की सूचना भी दी। सबसे पहले दिन " भाषण प्रतियोगिता "की घोषणा हुई। भाषण प्रतियोगिता में सबसे पहला नाम चंद्रप्रभा मेनन का था। वो दक्षिण भारतीय थी पर हिंदी में बहुत ही रुचि रखने वाली थी। जब उसका नाम घोषित हुआ तो सबको ऐसा लगा कि ये दक्षिण भारतीय हिंदी पर क्या भाषण दे सकेगी ?


  पर चंद्रप्रभा मुस्कराते हुए जब मंच पर आई और उसने माईक पर अपने भाषण की शुरुआत की कुछ ऐसे ꓽ- आदरणीय मंचस्थ मुख्य अतिथी वरिष्ठ अधिकारी, निर्णायक गण तथा सभी सहयोगी गण सादर नमस्ते। इतना सुनते ही पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

 चंद्रप्रभा ने हिंदी की विशेषताओं को क्रम बध्द तरीके से बहुत ही खूबसूरती के साथ उदाहरण देते हुए प्रस्तुत किया। उसकी भाषा उत्तर भारतीय हिंदी से बहुत ही करीब की लग रही थी। हालांकी उसे यहां डिप्युटेशन पर आये अभी कुछ ही महीने हुए थे। एक अहिंदी भाषी से ऐसी उम्मीद न अधिकारियों को थी और न निर्णायकगणों को थी और न ही सहयोगियों को थी। उसका भाषण इतना सुंदर था कि सब उसी में खो गये। भाषण खत्म होने पर मंच से विदा लेकर उतरने लगी तो एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से ऑडिटोरियम गूँज उठा। 


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इसी तरह सबके भाषण हुए। सभी की प्रेरणा और प्रशंसा के लिये जोरदार तालियाँ बजती रही।


इसी तरह से पूरे पंद्रह दिन विविध कार्यक्रम हुए। हिंदी पखवाड़े के समापन की पूर्व संध्या पर एक सबसे मजेदार, जानदार और शानदार प्रतियोगिता हुई। "गायन प्रतियोगिता," जिसमें सब बड़े उत्साह से भाग लेते। यहाँ तक कि अधिकारीगण भी इसमें बड़े शौक से भाग लेते। इसमें सबको अपने-अपने मनपसंद गाने की छूट थी। इसका एक बड़ा उज्जवल पहलू ये था कि सबको म्युजिक बैंड के साथ गाना था। उसके लिये सब प्रतिभागी बहुत मेहनत करते। संगीत के इस कार्यक्रम को कई भावों के रंगों से सराबोर कर देते और रंगारंग कर देते। आखिरी दिन चंद्रप्रभा के साथ सभी प्रतिभागियों को पुरस्कार और प्रमाणपत्रों से सम्मानित किया गया।


 समापन समारोह में अध्यक्ष महोदय ने सबको समझाया कि " हिंदी पखवाड़े का मतलब ये नहीं है कि भाषाओं में भेदभाव या स्पर्धा हो। अंग्रेजी को उच्च और हिंदी को क्लीष्ट और निम्न स्तर की समझा जाये। नहीं ऐसा जो समझते हैं वो बहुत बड़ी भूल कर रहे है। उनको अपने संविधान में बताये हिंदी से संबंधित नियमों का अध्ययन करना चाहिये। समझकर, उनको समझाना चाहिये जो हिंदी के नाम पर न जाने कैसी – कैसी गलतफहमियाँ फैला रहे है। हिंदी भाषा को 14 सितंबर 1949 में भारत की राष्ट भाषा के रुप में घोषित किया गया। यही एक सशक्त माध्यम है जिससे सबको की महत्त्त्से अवगत कर सकते हैँ। भारतीय संविधान के भाग 17 अध्याय की धारा 343 (1) में 14 सितंबर 1953 में इस स्मरणीय दिवस को " हिंदी दिवस "के रुप में पूरे देश भर में त्यौहार की तरह मनाया जायेगा। ऐसा कानून भी पारित किया गया था। 

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यह तो हम सबके लिये बड़ी खुशी की बात है तो स्पर्धा किस बात की है? सारी गलतफहमियों को भूला कर चलो, सब मिल के खुशियाँ मनाये। हिंदी की जड़ों को मजबूत बनाये। इसका खूब प्रचार और प्रसार करके इसे जिंदा रखे। इसे लुप्त होने से बचा कर जन जन की भाषा बनाये रखे। " सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में हिंदी का प्रचार एवं प्रसार करने में जो जुटे हुए है उनका सहयोग करें। अपनी तरफ से हर किसी को पुरी कोशिश करनी चाहिये तथा इस प्रयास में जुटे सभी को सफलता की शुभकामनाएँ देकर उन्होने अपना भाषण समाप्त किया तथा समारोह के समापन की भी घोषणा कर दी और वो मंच से उतर गये। जिस तरह तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई और समाप्ती भी उन्हीं तालियों की गड़गड़ाहट के साथ हुई। सब खुश होकर अपने अपने कक्ष में चले गये।



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