Rashmi Nair

Tragedy


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Rashmi Nair

Tragedy


अर्थहीन जिंदगी

अर्थहीन जिंदगी

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सुभद्रा चेची के पैर घर में टिकते ही नहीं थे। दिनभर यहाँ-वहाँ सारे गाँवमें घुमा करती थी। उसे सीर्फ बहानेकी जरुरत थी। जैसेही कोई बहाना मिला ये चल पडी। कभी-कभी बहाने बिनाही चली जाती। जबतक उसका दिल नहीं भरता पुरे " अलुवा " गाँवमें चक्कर लगाती। ऐसा नहीं था कि उसे घरमें कोई तकलीफ थी या खाने-पीने नहीं मिलता। फिरभी भटकने चली जाती। बाहरके लोग उसकी हरकतोंको देखकर उसपर हंसते और उसका मजाक उडाते पर उसे किसीकी कोई परवाह नहीं थी। वो बिंदास थी। उसका छोटा भाई उमेश "अलुवा गाँव "के पुलिस स्टेशनमें हवालदार था। इसलिए गाँवमें उसे छेडनेकी किसीकी हिम्मत नहीं होती। वैसे गाँवमें आवारा छोरोंकी कमी न थी। घरमें वसुधा, उमेशकी बीवी थी, जो उसका पूरा ध्यान रखती थी। वसुधाके लाख समझानेपर भी उसपर कोई असर न पडा। कही गई बात न सुनती न समझती वह बार-बार वही करती जिसके लिए उसे रोका जाता था। घरके काममें भी उसे कुछ खास दिलचस्पी न थी। जबरजस्ती कुछ काम उसके सामने काम रखा न जाए तब तक वह नहीं करती। छोटे-छोटे काम जैसे सब्जी काटना, आटा गुंनना, चावल बीनना, पर वोभी उससे ठीक से न हो पाते, बीचमें ही छोड कर भाग जाती। वह अपने मनसे कभी कुछ न करती। जबरजस्ती उससे काम करवाना पडता। उसे बाहर जानेसे रोकने के लिए कंपाउंड का दरवाजा बाहरसे बंद करना पडता।

सुभद्राचेचीकी हरकतें कुछ अजीब सी थी। वो अक्सर अकेले ही जोर-जोर से अर्थहीन बातें बडबडाती थी। कभी-कभी बिना बातके रोने लग जाती। पूछनेपर हंसने लगती। उसे डांटकर या डरा-धमकाकर चुप कराना पडता। उसकी तीन बहने और तीन भाई थे पर सब मानसिक तौर पर अच्छे थे। पर न जाने कैसे ये बेचारी ही क्युँ मानसिक रुप से अस्वस्थ थी ?

शाररिक तौर पर वह प्रौढ हो चुकी थी पर मानसिक तौर पर न वह बच्ची थी और न प्रौढ। उमेशने भी अपने माता-पिताके बाद उसका इलाज करवाया पर डॉक्टर्सने भी जवाब दे दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता। उमेशको इसी बात का बहुत दुख था पर वो कुछ नहीं कर पा रहा था। सुभद्राचेची का भविष्य क्या होगा ? यही बात उसे खाये जा रही थी कि वह एक सामान्य जीवन नहीं जी पायेगी। 

बचपनमें उसके माता-पिताने बिना लडकेवालोको बताए उसकी शादी कर दी और उनको लगा कि उन्होने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली, पर जब लडकेवालों को पता चला वे दुसरेही दिन सुबह खूब लड–झगडकर उसे मायकेमें छोड गए। अब तो माता-पिता भी न रहे। सभी बहनोंकी शादियाँ हो गई। सब भाई किस न किसी कारणसे दूर हो गए। उनमेंसे ऐसा कोई न था जो उसकी देखभाल करे। । उमेशके साथ उसकी जिम्मेदारी बांटना कोई नहीं चाहता। वो उमेशही था जो सोच रहा था कि जैसेभी हो वो मेरी दीदी है। मुझे अपना फर्ज निभाना है और वो निभा रहा था। हां उसकी तकदीर अच्छी थी कि उसे वसुधा जैसी सुशील और समझदार बीवी मिली। वरना सुभद्राचेचीके साथ रहना और उसे संभालना किसी टेढी खीरसे कम न था। मगर वो भी अपने पतिका साथ दे रही थी।

वसुधाको सुभद्राचेचीकी जिंदगीपर तरस आ रहा था तो कभी-कभी उसकी करनी पर गुस्साभी आता,पर सुभद्रापर किसीबातका कोई असर ही न था। माना कि वो अंजानेमें ही कुछ ऐसी हरकतें कर जाती जो उसे आम लोगोंसे दूर ले जाती। उसे इस बात का पता ही न था वह क्या कर रही है और क्युँ कर रही है ?

उसकी अपनी अलग ही एक दुनियाँ थी जिसमें वो जी रही थी पर वो जीना भी कोई जीना था ? वसुधा, उसकी दुर्दशा देख कर भगवानसे प्रार्थना करती कि ऐसी जिंदगी किसीको न मिले।  

वो सोचती,वो जिंदगी ही क्या जो समझ और एहसाससे कोसों दूर है। चोट और दर्दका ही एहसास शरीर मात्रको होता बाकी सब शुन्यके बराबर था। वो न किसीके सुख-दुखको समझ सकती न किसीकी भावनाओंको समझ सकती थी। न मान-अपमान जानती न किसी अनुभूतिका उसे एहसास ही था। संसारका हर प्राणी,सुबह से शामतक मेहनत करके कमाता और गुजारा करता। रातको चैन की नींद सोता। सुबह फिर वही दिनचर्या। न किसी को खुद बोझ समझने देता न किसी पर बोझ बनकर रहता। ये आम इंसानकी कहानी। पर बेचारी सुभद्राका क्या ? उसे खुदकी भी जानकारी नहीं। न खुदकी पहचान। वो सीर्फ शाररिक रुपसे मात्र विकसित और जीवित थी। रोज शीशेमें खुदको देखकर हंसती थी। पर अपना रख-रखाव ठीक रखना, सजना-सवँरना,कपडे–गहने आदिसे कोसों दूर थी। उसे कपडोंकाभी होश न रहता। हमेशा बिखरे बाल लेकर घुमती रहती। वसुधा हर सुबह उसके लिए समय निकाल कर अपने सामने बिठाकर उसकी चोटी बना देती और जबरजस्ती नहाने भेज देती। इसके पहले साफ-सुतरे कपडे गुसलखानेमें खुँटीपर टांग देती ताकि उसे कोई परेशानी न हो। वोभी ढंग से पहन न पाती। हर रोज उसे साडी पहनाकर ढंगसे पीन अप कर देना पडता था। पर कुछ देरबाद वापस वैसेही हो जाती। वसुधा बार-बार वही सब न कर पाती। इसके अलावा घरमें और भी काम होते।  

सुबहसे राततक एक के बाद एक काम चलता ही रहता था। इतना सब करते–करते वसुधा थक जाती थी। पर वो अपने पति की तरह सोचती अगर वो दोनों उसका ध्यान नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा ?

 एक दिन सुबह वसुधा रोजकी तरह उसे जगाने उसके कमरे में गई। देखा तो सुभद्रा अपने कमरे में नहीं थी। वसुधा उसे आवाजे दिए जा रही थी "सुभद्राचेची सुभद्राचेची " पर कोई जवाब नहीं मिला। वसुधा घबराकर अपने कमरेमें आकर उसने उमेशको जगाया और कहा " सुभद्राचेची अपने कमरेमें नहीं है।"

 सुनकर उमेश आँखे मलता हुआ, उठकर बोला " होगी यहीं कहीं घरमें,इतनी सुबह-सुबह जायेगी कहां ? ठीक से देखो " उसके कहनेपर उमेशकी तसल्लीके लिए वसुधाने दूबारा पूरे घरमें एकबार और चक्कर लगाया, सब जगह देख लिया, कीचन,हॉल,उसका कमरा यहां तक कि गुसलखाना तो क्या पाखनाभी नहीं छोडा। आंगनमें भी दूसरी बार आई पर सुभद्रा कहीं नजर नहीं आई। अबकी बार उसकी नजर आंगनके दरवाजेपर गई जो खुला था। इससे उसने अंदाजा लगाया कि वो बाहर निकल गई। उसने जाकर उमेशको बताया। सुनकर उमेशके होश उड गए। उसने तुरंत अपने पडौसियोंसे जान-पहचानवालों से पूछताछ की पर कहीं से उसके होनेकी कोई खबर न मिली। पूरा दिन उसकी खोजबीन और इंतजारमें बीत गया पर उसका कोई पता न चला। आखिरमें हारकर चौबीस घंटेके बाद सुभद्राके लापता होने की वजह उमेशको एफआयआर लिखवाना पडा। उसे पुरी उमीद थी कि उसका विभाग उसकी दीदीको ढुंढनेमें पूरी सहायता करेगा। सारे सार्वजिनक जगह जैसे रेल्वे स्टेशन,बस स्टाप, अस्पताल, पुलिस स्टेशनको सुचना भेज दी गई। उसकी फोटो भी भेजी गई। पुलिसको कहीं न कहीं से खबर मिलनेकी उमीद थी। सब इंतजार में थे।

तीसरे दिन कुछ औरतें सुबह-सुबह पानी भरने नदीके किनारे गई। वहाँ किनारे पर एक लाश पडी नजर आई। देखकर सब घबराके अपने घर लौट गई। खबर मिलते ही गाँव के सारे लोग अलुवा नदीके किनारे इकठ्ठा हो गए। उनमेंसे किसीने पुलिसको खबर दी। पुलिसने छानबीनके बाद लाश अपने कब्जेमें लिया और पोस्टमार्टम के लिए गाँवके सरकारी अस्पतालमें भेज दिया। उमेशको भी खबर भेज दी गई और उसे गाँवके सरकारी अस्पतालमें पहुंचने कहा गया। जैसे ही उसे पता चला उमेश और वसुधा दोनों अस्पताल पहुँचे। तब तक पोस्टमार्टम हो चुका था तथा उसे मृत घोषित कर दिया गया था।  

लाश मुर्दाघरमें पहुँच चुकी थी। जब वो दोनों मुर्दाघरमें पहुँचे,लाशपरसे चादर हटानेके बाद उन दोनोंने सुभद्राचेचीको पहचान लिया और दोनों दहाडें मारकर रोने लगे। सबने उनको बहुत समझाया। उनके पीछे पडोसी और कुछ रिश्तेदार आनेके बाद लाश उनको सौंप दी गई।

 लाश घरपर लाई गई। उसके सारे भाई-बहन अबतक आ चुके थे। सब शोकसागरमें डूबे थे। कोई दहाडें मार कर रोकर दुख प्रकट कर रहा था तो कोई चुपचाप रोकर, तो कोई खामोश रहकर। उसके अंतिम संस्कारकी तैयारियाँ हो रही थी। सुभद्राकी डोली वापस आई पर अर्थी पर वो सुहागन की तरह विदा हो रही थी और शामके ढलते-ढलते एक अर्थहीन जिंदगीकी सार्थक अंतिम विदाई हो गई।


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