Rashmi Nair

Children


3  

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अच्छे भैया

अच्छे भैया

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रक्षा बंधन का दिन था। उत्तम के बंगले के सामने वाले बंगले में मासूम छोटी गोलमटोल श्रेयसी रहती थी। उसकी उससे हल्की फुल्की जान पहचान थी। कभी-कभी दोनों में हाय-बाय होती रहती। उसे हमेशा आंगन में अकेले ही खेलते देखा। उसके घर में माता-पिता के अलावा एक बूढ़ी दादी थी। जब कि उत्तम के घर में भी उसके माता-पिता और एक बड़ी बहन भी थी जिससे वो बहुत प्यार करता था। पर उसकी शादी हो चुकी थी और वो ससुराल से आज आनेवाली थी। उस दिन सुबह जब उत्तम बाहर राखी का तोहफ़ा लेने निकला तो श्रेयसी को किसी का इंतजार करते पाया। वो जरा जल्दी में था इसलिये चला गया। वो अपनी बहन के लिए तोहफ़ा लेकर वापस दो घंटे के बाद लौटा तब भी उसने उसे आंगन में ही खड़े पाया। वो सोच रहा था कि उससे पूछे पर इससे पहले कि वो कुछ पूछ पाता उसे अपनी माँ का फोन आया। उसने मोबाईल जेब से निकालकर बात करते-करते घर के अंदर चला गया। 

कुछ देर बाद उसकी दीदी आई। उसने उसे राखी बांधी मिठाई खिलाई। दोपहर के खाने के बाद वो वापस ससुराल जाने निकली तो वो उसे बस स्टैंड तक छोड़ने बाहर आया। तब उसकी नजर श्रेयसी पर पड़ी। वो अब भी किसी का इंतजार करते हुए पायी गई। खैर तब तो उसने उसे कुछ नहीं कहा। पर जब लौट आया तो उसने श्रेयसी से पूछा – "तुम सुबह से किसका इंतजार कर रही हो ?" वो रुआंसी हो गई और कहने लगी "भैया का " उत्तम ने पूछा – "कहां है ?" कहने लगी "पता नहीं" उसका जवाब सुन कर हैरान हो गया। उसने पूछा -"तुम्हारी मम्मी कहां है? वो मामा के घर गई है।" "और पापा कहां?" वो बोली "बुआ के घर "सुनकर उसे बड़ा अजीब लगा ।

                                                   (2)

अकेली बच्ची को घर में छोड़ कर कैसे उसके माँ-बाप कैसे जा सकते है ? उसने फिर पूछा -"तुम अकेली हो घर में ? उसने कहा -"नहीं मेरी दादी है, बहुत कमजोर है। चल फिर नहीं सकती " सुनकर वह और भी हैरान हो गया। उसने सोचा अब बच्चीसे बात करने में कोई मतलब नहीं। उसने पूछा -" मुझे अपनी दादी से मिलाओगी " श्रेयसी ने कहा-" हां " और वो दादी के कमरे में ले गयी।

 यहाँ उसकी दादी बिस्तर पर थी। उसने मेरा हाथ थाम कर जोर से चिल्लाते हुए कहा "दादी, दादी देखो भैया आये हैं।" सुनकर दादी भी चौक गई। दादी ने पूछा -"तुम कौन हो ? बेटा तुम्हें मैं आज ही देख रही हूँ। " उत्तम ने सोचा, कि अपना परिचय दे और उसने अपना परिचय दिया। तब दादी ने कहा- "देख न बेटा, ये बच्ची सुबह से भूखी-प्यासी अपने भैया का इंतजार कर रही है। इसे बहुत समझाया पर मान नहीं रही है। जो नहीं है उसका इंतजार कर रही है "

 दादी से सुनकर उसे बहुत बुरा लगा कि श्रेयसी बेचारी सुबह से भूखी प्यासी है। उत्तम ने श्रेयसी से कहा "तुम पहले खाना खा लो तो मैं तुमको भैया से मिलाता हूँ " सुनकर वो खुशी से उछल पड़ी। वो मान गई और हाथ पकड़ कर कीचन में ले गई। "

उत्तम ने देखा गैस के स्टोव पर खाना था उसने सब गरम किया। दादी और श्रेयसी के लिए प्लेट में निकालकर दोनों दादी के कमरे में आये। उसने दोनो को खाना खिलाया। खाना होने पर श्रेयसी ने कहा "अब जल्दी से मिलाओ, मुझे राखी बांधनी है। कह कर अपनी फ्रॉक की जेब में हाथ डालकर उसने एक सुंदर सी राखी निकाली देखो तो कब से लेकर खड़ी थी भैया नहीं आया। बुला दो न उसे।" उसकी मासूम बातें सुनकर उत्तम का मन पसीज गया।" उसने कहा "तो ठीक है तुम कुछ देर के लिए अपनी आँखें बंद कर लो।" उत्तम की बात उसने झट से मान ली और आँखें भी बंद कर ली।" उत्तम ने उसे गोदी में उठाकर शीशे के सामने खड़ा हो और कहा " अब तुम जिसकी गोदी मे होगी वो तुम्हारा भाई होगा।" "तो में आँखें खोलूँ ?" उत्तम के कहते ही उसने आँखें खोली। उसने चौंक कर पूछा "तुम हमारे भाई हो ?" उसने कहा "हां तुम मेरी गोदी में हो तो भाई ही हुआ न गुड्डी, अपने लिये उससे गुड्डी सुनकर उसे अच्छा लगा। वो खुश हो गई और उसने पूछा "तो में तुम्हें राखी बांध सकती हूँ ?" उत्तम ने कहा "हां हां, क्यूँ नहीं ? " कहकर उसने झट से अपना हाथ आगे बढ़ाया। श्रेयसी ने उसकी कलाई पर अपनी राखी बांधी। उत्तम ने कहा "अब तोहफ़ा भी तो देना है।" उत्तम ने दादी से कहा "दादी मैं आते समय कुछ नहीं लाया। मैं अभी घर से उसके लिए तोहफ़ा लाता हूँ।" वापस लौटते समय अपनी माँ के साथ आया तो दादी उसे देखकर खुशी से फूली नहीं समाई। श्रेयसी भैया से तोहफ़ा पाकर खुशी से कुदने लगी और मेरे अच्छे भैया कहकर लिपट गई।



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