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AMAN SINHA

Romance

4  

AMAN SINHA

Romance

सुखे पलाश

सुखे पलाश

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घर की सफाई करना भी एक थकाने वाला मसला है। हर रोज़ ही करने की सोचता हूँ मगर फिर खुद ही जाने भी देता हूँ। पिछले तीन हफ्तों से यह मसला मेरे ज़हन में लगातार द्स्तक देता रहा है और मेरे आलसी स्वभाव से आज़ीज आकर बैरंग ही लौटता भी रहा है। मगर आज मेरे अंदर के सफाई पसंद इंसान ने मुझे दुत्कारा और मैंने अपने मन को बांध कर सफाई में जुट जाने की ठान ली थी। आज तो मैंने उस मसले को अपने दरवाजे पर दस्तक ही देने नही दिया। बल्कि उसके आने के पहले खुद ही द्वार पर उसके स्वागत के लिये नैन पसारे खडा हो गया था। हालांकि मेरे इस हरक़त से मेरा मन मुझसे काफी चीढ गया था मगर आज तो मुझे मेरे मन की एक भी ना सुननी थी फिर चाहे कुछ भी हो जाये आज तो मैं अपने ताजमहल का हर एक कोना ताजे आबो हवा से भरकर ही रहूंगा। आज मुझे अन्धेरे और धूल में डूबे घर के हर एक कोने को चमकाना ही है।


यही सोच लिए आज मैं जल्दी जागा था। ठण्डे बासी पानी से अपने चेहरे को ज़रा से ताज़गी बख्शी और फिर एक लम्बी सी नगडाई को यह ज़िम्मेदारी सौंपी कि वो मेरे तन के थकावट को थोदे समय के लिये किसी और थैले में डालकर इस चार दीवारी से बाहर कहीं छोद आये। रसोई मे गया तो देखा कि तीन दिन के बासी बर्तन जस के तस पडे हुए थे। पिछली बार मैं कौन से रोज़ इन बर्तनों पर एहसान किया था यह याद भी कर पाना मेरे लिये मुश्किल का काम था। अब भला इतनी ज़हमत भी कोई क्युं ही करे। बोझ तो मैं वसी भी कभी नही पालता, तो बस एक सरसरी नज़र दौडाई और ढूंढने की कोशिश की कि ऐस कौन सा बर्तन बचा हुआ है जिसमे मेरे सुबह की थकान को मिटाने के लिये चाय बनाई जा सकती है। तभी मेरी नज़र किसी कोने पर पडी बेचारी कडाही पर पडी। बेचारी ना जाने कब से खुद को मुझसे छुपाने की जद्दोज़हद मे लगे हुई थी। मानो कह रही हो "मुझे तो बख्श दे भाई, मैं चाय के लिये नही बनी हूँ। मैं तो तुझे गरमागरम रोटियाँ और चट्खारे लगाने वाली स्वाअदिष्ट सब्ज़ियाँ बनाकर देती हूँ"। 


मैं मगर कहाँ उसकी फरियाद सुनने वाला था। जैसे-जैसे मैं उसकी तरफ बढने लगा वो मेरे कमिने पन को देखकर और भी ज्यादा गिडगिडाने लगी। मगर खुद को मुझसे छुपा पाने मे वो बिल्कुल असमर्थ थी। बडी बेरहमी से मैंने उसके बिरादरी में उसकी मिट्टी पलीद कर दी। वो सिसकती रही मगर मैं उसे गैस पर बैठाने के लिये चुल्ही की तरफ बढ गया। मगर यह क्या? गैस तो जल ही नहीं रही, हाँ याद आया कि तीन दिन पहले ही तो गैस खतम हो गया था। कभी की यहाँ तो कभी नुक्कड की टपरी से मेरा काम कल रहा था। मेरे हाथों मे झुलती कडाही मानो मेरी तरफ बडे व्यंग भरे नज़र से देखती हुई कह रही हो, बडा चला था मुझमे चाय बनाने। जो चुल्हा ही नही जलेगा तो चाय कहाँ से बनेगी। मैंए जैसे उसकी यह व्यंग भरी हँसी सुन ली थी। रुकने वाला तो मैं भी नहीं था। मैंने कडाही को बडे प्यार से देखते हुए कहा -" यह मत सोचना कि तु बच जायेगी। पहली तु सिर्फ गर्म होती मगर अब मैं तुझपर कालिख भी लगाउंगा। मेरे इस हँसी को जैसे उसने समझ लिया था। मगर बेचारी निर्जीव वस्तु कर भी क्या सकती थी। चाय तो मुझे पिनी ही थी तो मैंने सोचा कि क्युं ना घर में पडे पुराने अख़बारों और डायरियों को जलाकर ही चाय बना ली जाये। इस तरह से चाय तो बन ही जायेगी मगर उसके साथ-साथ घर का कुछ कचरा भी साफ हो जायेगा। 


चाहे कुछ भी करना पडी मगर चाय तो मुझे आज घर मे ही पीनी है और भी कढाही मे बनाकर। बेचारी कढाही अपनी किस्मत पर रोती रह गयी मगर मैंए उसकी एक ना सुनी। मैं बडी तल्लिनता से घर मे पडे पुराने अखबारों को समेटकर चुल्हे के पास ले पहूँचा। उसमे कुछ पुरानी पत्रिकाए और दो एक डायरियाँ भी थी। ऐसी डायरियाँ जिन्हे मैंने कई सालों से छुआ तक नही था। एक एक करके मैं उन अखबारों, पत्रिकाओं और डायरियों के पन्ने जलाता गया और कडाही की तली को गर्म करने की कोशिश करता रहा। मगर जैसे उसने भी ठान लिया था कि आज तो वो गर्म होगी ही नही। इतनी आसानी से वो भी हार नहीं मानने वाली थी। ना मैं कम था और ना हीं वो, दोनों अपनी ज़िद पर अडे हुए थे। मैंने तो सोच ही लिया था कि भले घर की सफाई का काम आज भी टल जाये मगर मैं बिना चाय पिये तो कुछ भी करने वाला नहीं। और शायद मेरी इसी बात से कडाही भी सहम गयी थी क्युंकि अगर ऐसा होता तो उसी भी अपने बदन पर कालिख लपेटे हुए कितने दिनों तक पडे रहना पडता मालूम नही। इसी डर से उसने उबाल मारना शुरु कर दिया। मैंए झट से चाय की पत्ति उसमे डाली, तीन चम्मच चिनि मिलाई और उसके पुरी तरह से उबलने की राह देखने लगा। 


मगर यह क्या? चुल्हे में आंच की कमी होने लगी थी। चाय उफान मारना तो दूर उल्टे ठंडी पडने लगी थी। मैं आनन-फानन में इधर उदह्र देखने लगा और सबसे पहली जो चीज़ मेरे हाथ में आयी उसिसे पन्ने फाडार उस बुझती हुई आग मे डालने लगा। बिना पढे की उसमे क्या लिखा है मैं उसे आग के सुपुर्द करता जा रहा था। इस समय मेरी नज़र बस चाय पर ही टिकि हुई थी। लगभग तीन मिनट के अंदर ही डायरी के सभी पन्ने जल कर राख हो गये थे मगर चाय अभी भी उबली नहीं थी। अब मेरे पास दुसरा कुछ भी बचा नेही था जिसे जलाकर मैं अपनी चाय को उबाल पाता। मगर फिर एक दम से चाय की खुश्बू ने मुझे नाक के नथुनों तक आयी तो मुझे लगा कि अब इसे पिया जा सकता है। मगर समस्या यह थी कि इसे छाना किससे जाये? चाय की छकनी तो जाने कहाँ किसी गर्त मे पडे-पडे मेरे द्वारा खिजे जाने की राह देख रही होगी। इससे पहले की चाय ठंडी हो जाति और उसका मज़ा और मेरा मूड बिगद जाता मैंने बिना देर किये अलमारी से अपना एक नया रूमाल निकाला और झट से उससे चाय छान कर कांच के ग्लास में उडेल लिया। चाय थोडी ठंडी तो हुई थी मगर अभी तक उसका ज़ायका नही गया था। 


पहली चुस्की लेते हुए ही मेरी नज़र उस एकलौती डायरी पर पडी जो मेरी नज़र से बच गयी थी और जलने से भी। मैंए उसके करीब गया और उसके पन्ने पलटने लगा। वहाँ मुझे एक सुखा हुआ दबा हुआ अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश करता हुआ एक पलाश का फूल मिला। जो कि पन्नो से फिसलते हुए मेरी चाय की ग्लास को छूता हुआ ज़मीन पर जा गिरा। मेर चाय हाथों से होटों क्जे बीच जाती हुई रास्ते में कही रुक गयी। जाने कब वो प्याली वापस ज़मीन पर जा पडी मुझे पता ही नहीं चला। उस सुखे पलाश के फूल को देखकर एक ही बार में ना जाने कितनी पुरानी यादें एकदम से ज़हम ने ताज़ा हो गयी। कुछ लम्हे जो उस फूल के साथ जुडी हुई थी कुछ ऐसी याद जो उस फूल के यहाँ होने की वजह थी। मैंए बडी सावधानी से उसे पने दोनों उंगलियों के सहारे से उठाया और उसे आगे पिछे देखने लगा। मैं कुछ ढूंढ रहा था मगर जैसे उसका कोई निशान ही नहीं बचा था। शायद एक एक पंखुडी कहीं खो गयी थी जिसपर मेरे पहले प्रेमिका के होटों की लाली के निशान बने हुए थे। बस यही तो एक निशानी बची थी उसकी मेरे पास। उसके जाने के बाद फिर किसी और के लिये मन के ये द्वार खुले ही नहीं। यह हमारे एक मात्र मुलाक़ात की आखिरी निशानी थी। 


मुझे याद है जब प्रेम में डूबे हम दोनों पहली बार एक दुसरे के लबों को छुने की कोशिश कर रहे थे तभी संयोग से यह फूल हम दोनों के अधरों बीच आकर जम गया था। इसपर उसके होट के लाली के चाप पड गये थे। हम दोनों हीं हँसने लगे थे। मैंने बडे प्यार से उस फूल को उठाकर अपनी डायरी में रख लिया था। तभी से वो यहाँ पडी हुई थी। लेकिन इसके बाद हमें फिर कभी भी एक दुसरे को चुमने का मौका ही नहीं मिला। चुमना तो बडी दूर की बात है वो तो फिर कभी मुझे मिली ही नहीं। जैसे गायब ही हो गयी। और उसी दिन से गायब हो गयी मेरी नींद, मेरा चैन, मेरी लगन, मेरे मेहनत, मेरा प्यार। मगर आज इस सुखे पलाश को इस चाय की प्याली मे मिलाकर मैं खत्म कर दूंगा। और शायद इसी तरह से मैं उन यादों को भी मिटा पाऊँ और पा सकूँ अपना वही पूरा जीवन जिसमे प्रेम था, उल्लास था, खुशी थी, और अच्छा जीवन जीने की चाह। 


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