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Dippriya Mishra

Tragedy


4.4  

Dippriya Mishra

Tragedy


सुहागन एक रात की

सुहागन एक रात की

10 mins 428 10 mins 428

एर्णाकुलम जंक्शन रेलवे स्टेशन पर काफी भीड़ भाड़ थी। डॉ हर्ष तेज तेज कदमों से चलते हुए वातानुकूलित बी-वन थ्री टीयर लोअर बर्थ नंबर- वन ढूंढा और अपना ब्रीफकेस रखा। जूते खोलें , टाई का नॉट लूज किया और आराम से बैठ गए। लंबा कद,गेहुआ रंग, नीली आँखें, क्लीन सेव के बाद गालों पर दाढ़ी का हरापन, करीने कटे बाल, रॉयल ब्लू सूट ,उससे मैच करती कीमती टाई ,बांयी कलाई में स्लेटी रंग की कलाई घड़ी.....दाहिनी कलाई पर लाल मौली के रक्षासूत्र,सादगी पसंद हर्ष आकर्षक व्यक्तित्व मालिक थे|

3 दिन के सेमिनार में शिरकत करते और लास्ट अप्रैल की गर्मी ने उन्हें थका दिया था। 'एर्णाकुलम हटिया 'एक्सप्रेस अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी, बोगी के ज्यादातर सीट खाली थे। रात के 11:30 बजे थे।  हर्ष ने नाइट सूट पहन लिया। घर पर कॉल किया और सो गये|

6 घंटे का सफर कर ट्रेन कोयंबटूर स्टेशन पर रूकी। सुबह के 5:00 बज रहे थे पर उजाला हो गया था। बोगी में कुछ लोग सवार हुए। एक लड़की, डॉ हर्ष के सामने वाले बर्थ पर अपना पर्स रखी। बड़े से ट्रॉलीबैग को सीट के नीचे सरका दी और 1 एयर बैग को सीट के ऊपर रखी और बैठकर पानी का बोतल मुँह से लगा ली। चेहरा पसीना पसीना हो रहा था। कद 5 फीट 8 इंच से कम ना होगी काफी लंबी ,छरहरी गोरा रंग ,3 स्टेप में कटे बाल, हल्का आसमानी डिजाइनर कुर्ती पर जरदोजी का वर्क ,सिंपल सफेद पटियाला ,सफेद दुपट्टे पर सुनहरे जरदोजी वर्क, बांयी कलाई पर सुनहरे चैन की खूबसूरत कलाई घड़ी ,अनामिका उंगली में गोमेद के नग वाली अंगूठी, दाहिने हाथ में कड़ा, तर्जनी उंगली में सोने में जड़ा पुखराज ,मध्यमा उंगली में सोने की डिजाइनर अंगूठी थी।

हर्ष आदतन किसी लड़की को गौर से नहीं देखते पर इस लड़की से उनकी नजर हट नहीं रही थी। अचानक दोनों की नजरें मिली अभिवादन में हर्ष मुस्कुराए और लड़की भी। हर्ष ने पूछा- 'कहां जाना है'?

 'जी ,रायगड़ा, उड़ीसा|'

 और आप ?

'जी मैं झारखंड !'

काफी लंबा सफर है ...

जी ,गाड़ी राइट टाइम रही तो 36 घंटे वर्ना 40 घंटे भी लग सकते हैं।

लड़की शायद बात करने के मूड में नहीं थी ,वह इंग्लिश अखबार की पन्ने पलटने लगी....|

मध्यान भोजन रेलवे कर्मचारी देकर चला गया। लड़की थाली का रैपर खोली ,पालथी लगाकर खिड़की की तरफ मुंह करके बैठ गई ,दोनों हाथ जोड़ी अन्न देवता को निष्ठा पूर्वक प्रणाम की, कोई मंत्र बुदबुदाई ...खाना चम्मच से उठायी और माथे से लगाया ...जैसे ईश्वर का प्रसाद हो। डॉ हर्ष लड़की के हर कार्य पर मुग्ध हुए जा रहे थे।

अपर और मिडिल सीट के दोनों सज्जन लड़की की सीट पर बैठे थे। कभी मौसम के बहाने ,कभी ट्रेन में मिलने वाले खाने की क्वालिटी के बहाने ,लड़की से बात करने की चेष्टा कर रहे थे। वह बड़ी शालीनता से एक, दो प्रश्नों के उत्तर दे, अखबार के पेज को ऐसे पकड़ कर पढ़ने लगती थी कि उसे किसी का चेहरा दिखाई ना देे ।

दिन में कई बार का उसका मोबाइल बजा... रिंगटोन.. श्री कृष्ण ,जय कृष्ण ,हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवाय। अभी फिर रिंग हो रहा था, लड़की ने कॉल रिसीव किया, "हेलो !चरण वंदन गुरु मां !....."

........

"4:00 बजे ट्रेन पहुंचेगी ,चिंता क्यों करती हो माँ ?ऑटो ले लूंगी। बात करते-करते किसी बात पर हंँस दी ",...लगा कई झरने तरंगित हो गए। .......

ठीक है आप तो मानोगी नहीं.... नरोत्तम भाई को भेज देना। ....

"हां सब ठीक है|"

रात 11:00 बजे तक पर डायरी लिखती रही ,चेहरे पर सुख-दुख के कई भाव आ जा रहे थे ,लिखने के बाद कोई पत्रिका देर तक पढ़ती रही। डायरी को नीचे ट्रॉली बैग पर रख दिया। अलार्म लगाई और चेहरा दुपट्टे से ढ़क लिया। हर्ष गहरी नींद में सो गए थे। नींद खुली तो गाड़ी रायगड़ा स्टेशन पर खड़ी थी। लड़की हड़बड़ा कर सैंडल पहन रही थी। अपने सामान समेट रही थी। हर्ष उठ कर बैठ गए कुछ मदद करूँ?सामान उतारने में जरा सहयोग कर दें। हर्ष एयर बैग थाम लिए और लड़की ट्राली बैग लेकर आगे बढ़ी। डॉ हर्ष प्लेटफार्म पर उसका सामान रख दिए|

पूछा-"आगे कैसे जाएंगी ?"

" भाई आ गए होंगे।"

चाय... चाय करता तभी चाय वाला करीब आ गया। हर्ष दो चाय के पैसे दिए, एक लड़की की और बढ़ाएं...

" नहीं ! मैं नहीं पियूंगी। "

"पी लीजिए ताजगी आ जाएगी। "

वो मुस्कुरा दी ।  इतने लंबे सफर में भी आपका नाम नहीं जान पाया|

"मेरा नाम फूलों है। "

"फूलों ?"

"हां !"

"बहुत प्यारा नाम है ,बिल्कुल आप के स्वरूप से मिलता।"

लड़की के चेहरे पर उदासी भरी मुस्कान तैर गई। ट्रेन खुलने वाली थी ,हर्ष ट्रेन की ओर बढ़ने लगे। उसने अभिवादन में हाथ जोड़ दिया ,बहुत शुक्रिया! हैप्पी जर्नी !

थैंक्यू कहते डॉक्टर हर्ष गेट पर आकर खड़े हो गए ,उसने बांया हाथ लहरा दिया ....बाय। हर्षपुनः सोने की कोशिश करने लगे। तभी उनकी नजर सामने के सीट के नीचे लड़की की डायरी पर पड़ी....

लड़की की डायरी...? वो हड़बड़ा कर उठे जल्दी से डायरी को उठा लिया चारों ओर देखकर तसल्ली की किसी ने देखा तो नहीं लोग अभी सो रहे थे|

डायरी को मैरून वॉलवेट पेपर से कवर किया गया था । उस पोस्ता के दानों को चिपका कर खूबसूरत सी आकृति बनाई गई थी। नीचे फूल बनाकर उसके बगल में लिखा था ओ, फूलो लिखने का खूबसूरत तरीका । ट्रांसपेरेंट पतले प्लास्टिक से उससे कवर कर दिया गया था। सचमुच बहुत कलात्मक और खूबसूरत थी वो डायरी। हर्ष डायरी की छुअन में उस लड़की की उंगलियों का छुअन महसूस कर रहे थे। डायरी को अपने बगल में रखा सोने की कोशिश करने लगे पर नींद बहुत दूर जा चुकी थी। उन्होंने डायरी का पहला पेज पलटा....लिखा था -फूलों ठाकुर ..  ठाकुर को काटकर उसके नीचे लिखा था फूलों देवी।

हर्ष के दिमाग में आया यानी वो ब्याहता थी?दिमाग ने तर्क दिया.. .. ना मांग में सिंदूर, ना हाथों में चूड़ी, ना गले में मंगलसूत्र तो ब्याहता कैसे हुई ? हर्ष पन्नें पलटने लगे ...

4 अप्रैल 

आज दिनभर खरीदारी में व्यस्त रही। अपने विवाह के लिए सुर्ख लाल बनारसी खरीदा है,विवाह के लिए स्टोन वर्क वाला लाल दुपट्टा जिसके किनारे पर मल्टी कलर के घुंघरू लगे हुए हैं। मुझे एक ही नजर में पसंद आ गया था। आर्टिफिशियल जेवर मांग टीका,नथ ,कंगन ,झुमका, झूमर और गले के दो हार ,लाख की नग जड़ी लाल चूड़ियां ,जड़ाऊ लाल जूतियां, मन करता है सब पहन कर एक बार आईने में देख लूं खुद को पर गुरु मां कहती है विवाह के पहले पहनने से यह सब जूठा हो जाएगा। कल ब्लाउज सिलने को दे दूँगी।


5 अप्रैल 

विवाह कितना प्यारा बंधन है, मन हर्षित हो रहा है।


6 अप्रैल 

आज B.com के अंतिम पेपर का एग्जाम था ,आज मन निश्चिंत हुआ। 90% तो आ ही जाएगा|


7अप्रैल

आज एक सफेद सिल्क साड़ी खरीदी हूँ। उस पर सफेद सीप का वर्क हैं। विधवाओं को सफेद वस्त्र ही क्यों पहनना पड़ता है सोच कर मन में टीस उठती है

। हर्ष और परेशान हुए...सफेद वस्त्र?किसके लिए....


8 अप्रैल 

मेरे बालों में तेल लगाते हुए गुरू माँ ,आज फिर ,वही कहानी सुना रही थी - द्रौपदी से, विवाह पर किए गए किसी शर्त का उल्लंघन हो जाने के कारण अर्जुन को 1 वर्ष तक इंद्रप्रस्थ से दूर , तीर्थ यात्रा पर जाना पड़ा था। घुमते-घुमते वो दक्षिण भारत पहुंचे ,वहां उनकी मुलाकात एक विधवा नागकन्या उदूपि से हुई। दोनों ने विवाह कर लिया। जिससे 1 पुत्र उत्पन्न हुआ अरावन । पत्नी और पुत्र को नागलोक में ही छोड़ कर अर्जुन आगे की यात्रा पर बढ़ गये। 25 वर्ष तक अरावन अपनी माता के पास ही रहा ,कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय वह अपने पिता अर्जुन और पांडवों की सहायता करने के लिए युद्ध भूमि में आया। युद्ध में विजयी होने के लिए पांडवों ने शक्ति स्वरूपा मां काली की पूजा की। उन्हें प्रसन्न करने के लिए नरबलि देना था ,वह भी जो स्वेच्छा से अपनी बलि देना चाहता हो। इस बली के लिए उन्हें कोई नर नहीं मिला। यह देखकर अरावन अपनी बली के लिए तैयार हो गया मगर एक इच्छा जाहिर की ,कि वह कुंवारा नहीं मरेगा। 1 दिन सुहागन होकर ताउम्र विधवा होने के लिए कोई राजकुमारी तैयार नहीं हुई तब भगवान श्री कृष्ण मोहिनी रूप धारण कर अरावन से विवाह किए। विवाह के दूसरे दिन अरावन ने अपनी बलि दे दी। पति की मृत्यु से मोहिनी को बहुत दुख हुआ, वह बहुत विलाप की।


हर्ष के लिए यह कहानी बिल्कुल नई थी बड़ी ही इंटेस्टिंग|उन्होने अगला पन्ना पलटा.....

आज बहुत सारे वस्त्र खरीदी हूँ। सूट ,लहंगा, कुर्ती ,साड़ियां....आदि ... आखिर 17 दिन का उत्सव है। कल तमिलनाडु जा रही हूं विवाह के लिए 14अप्रैल से तमिल महिना चिरताई से तमिल नववर्ष आरंभ होगा|इसी शुभ मुहुर्त से शुरू होगा विवाहोत्सव|

हर्ष फिर सोचने लगे वो नवब्याहता थी?फिर अकेले सफर कर रही थी?शायद पति को छुट्टी ना मिली हो....|

29 अप्रैल 

आज 16 दिन से लगातार गीत गान ,उत्सव मनाते हो गए। महसूस होता है ....जिंदगी इसी को कहते हैं। कल हजारों नारियल चढ़ेंगे अरावन देव के मंदिर में ,एक नारियल मैं भी चढ़ाऊंगी और फिर अनुष्ठान में शामिल होऊंगी|


30अप्रैल


आज देश के कोने-कोने से आए हजारों लोग सामुहिक विवाह में शामिल हुए। हजारों दुल्हनों ने एक ही पुरूष को अपना पति माना|दुल्हनों के बीच मैं आकर्षण का केंद्र थी, नंदिनी, नलिनी , इरावती ..सब यही कह रही थी। आज मैंने तीसरी बार अपने स्वामी ,अपने आराध्य से विवाह किया। (थाडी)मंगलसूत्र पहनाने से पहले पुजारी बता रहे थे ..तुम्हारी उत्पत्ति ब्रह्मा की छाया से हुई है। इसलिए तुम बादल के समान कोमल हो और बादल की तरह हृदय में कठोर बिजली भी है। तुम में अपार सहनशक्ति है|तुम्हें रचकर ब्रह्मा बहुत खुश हुए थे। ब्रह्मा के श्री चरणों में बैठे ऋषि कश्यप और मां अरिष्ठा व्याकुल हो गई थी। जब ब्रह्मा ने कहा था यह मेरी अनुपम कृति है। जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों के सामान्य गुण है। मां अरिष्ठा बोली लेकिन इनका वंश कैसे चलेगा|जब दोनो गुण इन्हीं में हो प्रभु! भगवान ने कहा- ये अपने आप में ही परिपूर्ण है इनका  वंश नहीं ,घराना चलेगा। यह धरती पर मंगल कार्यों में उत्सव मनाएंगे लेकिन इनके घर में कोई उत्साह नहीं होगा। पुजारी ने कहा- तुम सब मंगला मुखी हो हमेशा सबके मंगल की ही कामना करना। इस विवाह के पश्चात तुम्हारा एक नाम होगा अरावनी|


1 मई 

आज हमारे स्वामी अरावन देव मंदिर से बाहर आए। रथारूढ़ हुए और नगर भ्रमण करते रहे ,हम सब हजारों सुहागिने ,उनकी पत्नियां रथ के इर्द-गिर्द घूमती, नाचती रही। नगर भ्रमण के पश्चात रथ मंदिर तक लाया गया और.....

मूर्ति तोड़ दी गई ......कितना भयानक है यह दृश्य ! चारों तरफ विधवाओं की टूटती चूड़ियां, टूट के बिखरे मंगलसूत्र , माथे की मिटी बिंदियाँ, और धुलता मांग का सिंदूर। चारों ओर ह्रदय विदारक विलाप और रुदन । यही जीवन है हम किन्नरों का, आज अपनी किस्मत पर बहुत रोना आया ,सारा श्रृंगार उतार दिया मैंने ,अपने द्वारा खरीदी गई सीपों के वर्क वाली सफेद साड़ी धारण कर ली मैंने। आंखें रो रो कर सूज गई है ,सिर भारी हो रहा है। उप्फ! कोई मंगल कार्य नहीं मेरे भाग्य में?       

सभी किन्नर 3 दिन और यहां रुकेंगी लेकिन मेरा रिजर्वेशन कल का है। मैं सुबह ट्रेन पकड़ लूंगी|किन्नर होने में मेरा क्या दोष? लोग कैसी अजीब निगाह से देखते हैं किन्नरों को ,हमारा पेशा बना दिया घर -घर घूम कर नाचना, लेकिन मैं इस पेशे में नहीं जाऊंगी। मैंने गुरु मां को पहले ही कह दिया था। कितनी मुश्किल से पढ़ाई की है। सिर्फ नाम लिखवाने और परीक्षा देने तक की छूट कॉलेज वालों ने दी थी ,कहा था- रोज क्लास करने से वहां का महौल बिगड़ जाएगा। मैं कोई नौकरी करूंगी ,किन्नर समाज को जागृत करने का कार्य करूँगी|

किसी ने सच ही कहा है....."जिस का जितना है दामन यहां उसको सौगात उतनी मिलेगी।"

 हर्ष पूरी डायरी पढ़ गए, मन संवेदनाओं से भर गया। आंखें छलक आईं, सोचा ..... ब्रह्मा की अनुपम कृति का इस धरती पर ऐसा अपमान ?

शरीर की किसी कमी वालों को दिव्यांग कह सरकार कितना कुछ करती है उनके लिए...... इन्हें ओछा क्यो समझतें है? हर्ष ने सोचा .... फूलो और फूलों जैसी लोगो को ,समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कुछ करना होगा।      

सुबह के 8:00 बज गए थे मोबाइल पर हर्ष की पत्नी दिव्या का कॉल आया था देर तक बातें होती रहीं अपने 6 महीने के बेटे मोहित से बातें करते हर्ष के चेहरे पर भोलपना आ गया था ,हर्ष ने कहा -बस कुछ घंटों में पहुंच जाऊंगा। आ कर ढे़र सारी बातें करते हैं। हर्ष फिर डायरी के पलटने लगें....डायरी के पीछे एक मोबाइल नंबर लिखा था। डॉक्टर हर्ष ...डायल कर दिए.... आवाज आई

"हेलो !कौन?"

"नमस्कार!मैं डॉक्टर हर्ष...क्या फूलों से बात हो सकती है?"

किसी महिला की आवाज आई... "करवाती हूं ..."

फिर फूलों की आवाज आई .....

"हैलो ......"

"मैं डॉक्टर हर्ष..".

"ट्रेन वाले?"

"जी"

"आपको गुरु मां का नंबर कैसे मिला ?"

"जी ,आप की डायरी से ..."

"मेरी डायरी?"

"जी, आपके जाने के बाद देखा....ये आपकी अमानत है .... आप पता दें ....मैं भेज दूंगा|"

 फूलो पता बता दी ,आगे पूछी- "आपने पढ़ ली है डायरी ?"

 "झूठ नहीं बोलूंगा .... पढ़ लिया है|"

" तो मुझसे नफरत नहीं हुई ?"

"नहीं ,तुम्हारा सम्मान बढ़ गया मेरी नजरों में ,ईश्वर तुम्हें अच्छी नौकरी दे ! तुम खूब आगे बढ़ो! एक बात कहूं फूलो.....

"कहिए...."

"मेरी बहन बनोगी?" कुछ देर के मौन के बाद रूंधे गले की आवाज आई ...."हां भैया|"

 झारखंड पहुंचने के दूसरे दिन हर्ष ने फूलों की डायरी पार्सल कर दी|



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