Sheela Sharma

Tragedy


4.7  

Sheela Sharma

Tragedy


स्त्री

स्त्री

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रोशन नवजात शिशु को हाथ में लिए स्तब्ध, थरथराते पांव खड़ा होने में असमर्थ हो रहा था ।उसकी सोच की बेड़ियों ने उसे एक पल मे कहां से कहां पहुंचा दिया । हंसते खेलते परिवार को वारिस तो मिला पर अब आगे क्या ?उसकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा । ""संभालो अपने आप को"" दाई ने सहारा दिया ।

लड़के की चाहत में तीन सुंदर, सुशील बेटियों का पिता वह बन चुका था। आज उन्हीं के साथ बरामदे में चिंतित बैठा हुआ था कारण वहीःःःः    

             राधा मां बनने वाली थी। प्रसव वेदना होते ही दाई और दोचार अनुभवी औरतें राधा के पास कमरे में थी। उसकी बढ़ती चीखें , चीखें थीं बार -बार उस असहनीय पीड़ा की, अंतर्मन के घावों की, स्त्री होने के एहसास की, अभिशाप की, छले जाने की ,इन सबसे बेखबर वही चीखें रौशन को सुकून पहुंचा रही थी जल्दी ही लड़के की खबर आ जाएगी फिर तो गांव में गुड़ बाटूंगा, ढोल बजबाऊंगा ।

          राधा का चेहरा उसके आंखों के आगे आ रहा था पहली बेटी के समय मां बनकर वह कितनी खुश थी ।अपनी गोद से नन्ही परी को मुझे देते हुए कहने लगी "" कितनी प्यारी बच्ची है ।देखो ना तुम पर गई है तुम्हारे ही जैसे नाक -नक्श ,मैंने सोच लिया है अब हमें और बच्चे नहीं चाहिए ।बस हमारे लिये यही सब कुछ है""। उसे अपनी प्रसव पीड़ा याद आ गई । 

" यह तुम क्या कह रही हो? लड़का होता तो भी ठीक था मुझे लड़का चाहिए राधा लड़का''  मेरी आवाज कड़वाहट और गुस्से से भर गई थी""राधा ने बेटी को गोद में ले लिया ""मगर यह तो भगवान की इच्छा पर है"' उसने मुझे समझाते हुए कहा ""तो तुम क्या चाहती हो? मैं गांव भर के ताने सुनता रहूं , अपनी मर्दानगी का मजाक बनबाऊ ? तुम तो घर में ही रहती हो ।हर जगह मुंह मुझे दिखाना पड़ता है मुझे लड़का ही चाहिए बस , मुझे और कुछ नहीं सुनना है

राधा ने करवट ले ली थी ।क्लान्त मन में कसक उठी उसके सम्मान , अस्तित्व का कोई वजूद है भी या नहीं ?

शाम को पड़ोस वाले काका रौशन को अपनी रामबाण सलाह दे रहे थे । एक लड़की के बाद लड़का होता ही है ।संयोग नहीं बना तो तीन लड़कियों के बाद तो निश्चित ही लड़का होगा, तुम बिल्कुल चिंता मत करो ।बस शरीर ताकतवर रखना ,आदमी का शरीर हष्ट पुष्ट रहना जरूरी है वरना औलाद कमजोर होगी ।

जीवन के नौ साल राधा के शरीर और उसकी मन:स्थिति की चिंता किए बिना , रौशन ने टोने टोटके ,झाड़-फूंक ,बाबाओं की सेवा मे लगा दिये ।इस बार वह खुश था पूर्णविश्वास के साथ ,लड़का ही होगा ।

        वह ख्यालों में खोया हुआ था कि उसकी छोटी बेटी ने आवाज लगाई "'पापा हमारे यहां छोटा लाला आने वाला है ना """?अपनी बच्ची के इस सवाल पर उसने हंसकर हां में गर्दन हिला दी ।अब तक कमरे से राधा की आवाजें आनी बंद हो चुकी थी, शिशु का जन्म हो गया था।

           शिशु को देखकर दाई के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी।उसने बच्चे को नहला धुला कर राधा के समीप लिटा दिया """"राधा देख आज तेरे रोशन की मनोकामना पूरी हुई है लड़का हुआ है" अपने बच्चे पर हाथ न रखते देख, दाई उसकी बेरुखी पर हंस पड़ी""राधा क्या तू अभी तक मुझसे नाराज है। माना कि दो बार तुम्हारा गर्भपात करना पड़ा ,पर क्या करें हम स्त्री जात जो ठहरे? हमारा दुख दर्द कोई नहीं समझता तुम्हारे पति की इच्छा थी लड़का ही होना चाहिए । मैं तुम्हारे तन मन की कमजोरी को जानती हूँ फिर भी असहाय थी और यदि मैं नहीं करती तो कोई और दाई करती "" । 

          उसे जवाब ना देते देख दाई के हृदय में शंका उठी जैसे ही उसने राधा की तरफ देखा दिल धक से रह गया।राधा लड़के को जन्म देकर इस संसार से विदा ले चुकी थी दुर्भाग्य ?

वेदों की अधिष्ठात्री , शक्ति स्वरूपा तेजस्विनी, सृजनकरिता, अर्धांगिनी क्षमाशील स्त्री, शायद फिर से स्त्री होने के भय ने उसके प्राण ही ले लिये।


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