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Sheela Sharma

Inspirational


4  

Sheela Sharma

Inspirational


दृष्टि

दृष्टि

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सेठ दीनदयाल उव्दिग्न से कमरे में चहलकदमी कर रहे थे ।वह जितना उफन रहे थे, उनकी पत्नी कामिनी उतनी ही शांत थी ।जो बात उन्हें परेशान कर रही थी वह थी उनकी इज्जत, लोग क्या कहेंगे? आखिर मैं घर का मुखिया हूँ मुझसे भी तो नैना बेटी को पूछना चाहिए था । पर नहीं दोनों मां बेटी ने खिचड़ी पका ली, आखिर इतनी गलत सोच इन दोनों में कैसे आई""? 

नौकरी के दौरान पेइंग गेस्ट रहकर नैना नौकरी तो कर रही थी ,पर उसकी मन:स्थिति अशांत थी। कारण था जीवन के तकरीबन वे सभी परिचित रंग , जिनमें अधिकतम रंग उदासी लिए रंगहीन थे। बचपन से ही घर के माहौल को देखते हुए उसका स्वप्न था खूबसूरत रंगों मे सरोवर हो स्वप्नलोक की रानी बन रहना ।कुछ सोच कर उसने एक ठोस कदम उठा ही लिया जबकि उसका अपना घर भी संपन्न था।,साथ ही शादी भी एक संपन्न घराने में होने जा रही थी फिर भी उसने एक फ्लैट अपने नाम से खरीद लिया। आज उन्हीं रंगों में उसे भीगना अच्छा लग रहा था जिन्होंने कभी उसके जीवन को रंगीन बना रखा था ।मानो मन का संताप मिट कर रंगों में घुल गया हो

"ऐसा क्यों किया नैना ने ""?दीनदयाल जी आग बबूला हो उठे ।नाज नखरो से पाली बेटी की आज विदा की घड़ी आ चुकी थी ,तभी उन्हें इस फ्लैट का पता चला । पत्नी कामिनी को अपना वह सब बीता वक्त याद आ रहा था ।जब वह इसी दौर से गुजर रही थी ।मां उसके कपड़े अटैची में भरते हुए बड़े प्यार से समझा रही थी "कामिनी तुम मुझे दिन-रात देखती हो ना परिवार में ,हम पन्द्रह लोग सभी एक दूसरे के सुख दुख के साथी हैं ।किसी में भी संस्कारों की कोई कमी नहीं है ।तुम भी अपनी ससुराल का हिस्सा बनने जा रही हो वहां के संस्कार , रीत रिवाज, खानपान सभी में तारतम्य तुम्ही को स्थापित करना होगा? कामिनी अपनी मां को केवल हां कह पाई" और उनके गले लग कर फूट फूट कर रोई ।वो अंतिम दिन था ।

विचारों का तांता टूट गया  दीनदयाल जी बेटी को ढूंढते हुए आए । उनकी तेज आवाज ने कामिनी के शरीर में कंपन भर दी पैर थरथराने लगे "नैना बोलो तुमने ऐसा क्यों किया मेरी इज्जत दांव पर लगा दी ।ससुराल भी तुम्हारा समृद्ध है और जमाई का भी अपना फ्लैट है फिर तुम्हें अपना फ्लैट लेने की क्या जरूरत थी । तुम समाज के सामने ,मेरे समधी के सामने मुझे गिराना चाहतीं हो। क्या यही परवरिश तुम्हारी मां ने की है क्या इसमें वह भी शामिल है"?

"नहीं बाबा !जब देखो तब माँ को जलील करते हुए शायद आपको अपना बड़प्पन लगता होगा ।आप ही तो सभी के सामने धमकी देते थे घर छोड़कर चली जाओ।माँ कहां जाती उनका तो अपना कुछ था ही नहीं ?ना मायका न ससुराल !अकेली लाचार गलत न होते हुए भी अपमान सहन करते ,तिल तिल घुटते हुये मैं उन्हें देखा करती थी । बाबा !आप दोनों तो समकक्ष हैं फिर आप में और उनमें इतनी असमानता क्यों ?जबकि वह तो गृह लक्ष्मी भी कहलाती हैं? पर अब नहीं --अब मैं सबल हूं ।"

दीनदयाल जी की आंखों से अंगारे बरसने लगे ।पर कामिनी के चेहरे पर मुस्कान थी। तभी नैना मां के गले आकर लग गई।कामिनी उसे रुंध गले से इतना ही कह पाई "तुम मेरा अंश हो उसे जिंदा ही रखना।"वह समझाते हुए कहने लगी '"हम प्रतिदिन जीवन मे अनेक रंगों से परिचित होते हैं और उन रंगों को पाने के लिए जीवन से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार होते हुये भी परिस्थितियों के सामने झुकना पड़ता है तो क्यों न हम आशा और उम्मीद का हाथ थाम कर इस अकल्पनीय, चलाएमान ,अंतहीन और अविश्रामशील जीवन की कठिनाइयों को पार करें और अपने लक्ष्य तक ही पहुंचकर अंतिम सांस लें । देखो ---आज सब कुछ कितना रंगीन खूबसूरत महसूस हो रहा है ।परम आनंद की अनुभूति "।


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