Sheela Sharma

Inspirational


4.7  

Sheela Sharma

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इतनी सी बात

इतनी सी बात

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सड़क के दोनों तरफ ऊंची ऊंची पहाड़ियां, उलझे सुलझे नाले ,छोटी बड़ी झाड़ियां और उनमें खिले रंग बिरंगे फूल ऐसे लग रहे थे मानो प्रकृति की रानी का घाघरा बेल बूटों से सजा हो ।नालों का उछलता कूदता पानी अपनी मस्ती में था ।उस पानी पर सूर्य की पहली किरण आकर रात्रि के वियोग को बिसार कर प्यार बरसा रही थी   मेरे लिए पहाड़ी क्षेत्र का पहला दृश्य था। यूं तो कहीं ना कहीं छुट्टियों में हम आते-जाते रहते थे, पर इस रास्ते पर पहली बार निकले थे वह भी प्रफुल्ल और बच्चों की जिद्द के खातिर ।पिछले छह महीनों के उतार-चढ़ाव ने मन का चैन छीनकर दर्द भर दिया था । 

इन नजारों ने थोड़ी सी शीतलता देनी शुरू ही की थी कि मां का फोन आ गया "बस अब बहुत हो गया मुनिया अब इन दोनों का कुछ ना कुछ बंदोबस्त मुझे करना होगा ।मेरी साइन लेकर घर का मालिक बनना चाहते हैं । इतनी आसानी से मैं उन्हें यहां का मालिक नहीं बनने दूंगी आखिर हमारे खून पसीने से बना है ये आशियां ". मैंने समझाया.  "इसमें इतना गुस्सा करने की क्या बात है मां ! ऐसा कौन सा घर है जहां छोटे-मोटे लड़ाई झगड़े नहीं होते हों "?

"मैं कुछ नहीं जानती उनको ऐसा सबक सिखाउंगी कि जिंदगी भर पति-पत्नी याद रखेंगे ". बरबस मेरी हंसी निकल पड़ी    

"क्या मां आप भी !वे आपके बेटा बहू हैं।"मेरी बातों को अनसुना कर उन्होंने मुझे मूर्ख नादान की पदवी दे डाली

"तू बिल्कुल अपने पापा पर गई है सरल सीधी पर अब सिधाई का जमाना लद गया"।शायद मां ने सच ही कहा उनकी बातें, नसीहत जैसी लगी ।मां के फोन तक तो ठीक था पर पीछे-पीछे भैया का फोन आ गया।

" मुनिया मां को पता नहीं इस मकान का कितना घमंड आ गया है ।उन्होंने अपनी कमाई का कुछ हिस्सा मकान में लगाया तो इसमें ऐसा क्या अनोखा कर दिया ।अरे !हर माता-पिता का फर्ज है औलाद को पालने का"?मैं समझाते हुए बीच में कह उठी "कोई बात नहीं भैया उनकी बातों को दिल से मत लगाओ आखिर मां है "।"क्या मां ऐसी होती है जब देखो तब गुस्सा कलह ताने सुनाने का जरिया ढूंढती रहती हैं? "

फोन रखते ही बच्चों ने मेरे मन की हलचल को भांप लिया था ।" मम्मी देखो कितने स्वादिष्ट पकौड़े है "।गरमा गरम पकौड़ी उनके नरम हाथों से खाते मुझे बहुत अच्छी लग रहा था पर मन तो कहीं और ही था ।काश मैं भी भैया ,माँ की तरह रूखड़ मुंहफट होती तो मैं इन बातों को मन से लगाए कलपती न घूमती रहती।इन लोगों की चिंता में मैंने अपने परिवार की सुख-शांति छीन ली ।बच्चों के मासूम दिलों में उदासीनता की परत भर दी।    

 सोच गहराने लगी मां और पापा दोनों परिवार को संभाले हुए थे, पर अचानक पापा नहीं रहे। मां ने अपनी पूरी जिंदगी तीनों बच्चों की पढ़ाई लिखाई, शादी और अधूरे मकान के हवाले कर दी थी।अभी कुछ दिन पहले ही वे रिटायर हुई थीं। दीदी अपने परिवार में ब्यस्त , मायके की परिस्थितियों से अंजान,घर की बागडोर संभालने में लगी थीं।भैया भाभी मां के पास इसी घर में रहते हैं। ,जहां मैं पली-बढ़ी   घर का वह खुला आंगन, जिसमें आम, अमरूद, नींबू के पेड़ ,जिन के नीचे छिपते हुए सहेलियों के साथ लुका छुपी खेलती, गुड्डा गुड़ियों की शादी रचाती ,बारात आती छोटे-छोटे बर्तन में झूठ मूठ का खाना बनाती ,डोली उठती ।मुझे रोता देख पापा झट गोदी में उठा लेते ।एक दिन मेरी गुड़िया भी तो ऐसे ही ससुराल जाएगी तब मुझे कौन सँभालेगा ?" मैं शादी ही नहीं करूंगी" और पापा हंसने लगते ।हम बच्चे ऊपर की मंजिल की ओर जाती सीढ़ियों पर सर्दी में मूंगफली गन्ना खाते धूप सेकते। बरामदे की वह जगह जहां चौपड़, लूडो खेलते ।

मीठी यादों में फोन की घंटी ने खलल डाल दी आखिर मां बेटे का झगड़ा दीदी तक भी पहुंच गया था ।उन्होंने भी दोनों को समझाने की कोशिश की। पर तू-तू मैं-मैं के झगड़े ने उस घर में दीवार खड़ी कर ही दी ,जो उस घर में नहीं मेरे दिल पर एक बोझ की तरह धंस गई थी । कमरे मे घुसते ही मेरे उदास चेहरे को देखते ही प्रफुल्ल समझ गए आज फिर फोन आया । उनके प्रश्नात्मक चेहरे को देखकर मुझे हंसी आ गई" बहुत अच्छे कैसे पता चला आपको मैं उदास हूं"?" मेरी पत्नी को मायके के अलावा और गम ही किस बात का है "कहकर उन्होंने बाहें पसार दी मुझे अपने आप में शर्मिंदगी होने लगी। मेरे भी देबर,जेठ ननदें है पर उनके संबंध हमसे मधुर ,अपनत्व से लवालव है। "क्या सोच रही हो "।

"कुछ नहीं "

"क्या मां से बात हुई "

"हाँ उन की सुई तो घर के हिस्से पर आकर अटक गई है। कहती हैं बँटबारे के बाद देखती हूं इन लोगों को क्या मिलेगा" ?अब दीवार बन चुकी है तो भी हिस्से की बात क्यों नहीं बंद होती ---?मां का मन अब वहां नहीं लग रहा है वे अपने हिस्से को बेचकर कहीं निकल जाना चाहती हैं पर इस उम्र में वे कहां जाएंगी ? गुस्से ने उनके दिमाग में धुंध की परत कर दी!

मेरे मन में विचार आया क्यों ना मैं और दीदी अपना अपना हिस्सा मांग ले तो भैया को घर का केवल एक हिस्सा मिलेगा। जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा, शायद उनकी आंखें खुल जाए। उन्हें परिवार और रिश्तो की अहमियत समझ में आ जाए ।क्या वह नहीं जानते ईटगारे का बना घर ,घर नहीं कहलाता जब तक उसमें रहने बाले एक दूसरे के पूरक ना हो ? क्या उनके लिये हमारे रिश्ते हमारी भावनाएं कुछ मायने नहीं रखती पैसा ही सब कुछ हो गया ?वे पहले तो कभी ऐसे ना थे ?

दीदी ने योजना अनुसार उन्हें सबक सिखाने के लिए भैया से कहा से ""इस मकान में हमें भी हिस्सा चाहिए आखिर हमारा भी तो उसमें हक है"।

"क्या !हिस्सा चाहिए तुम्हें ,  क्या कमी है तुम लोगो को दी !आप बाहर विदेश में पैसों में खेल रही हो फिर भी इतना लालच ।मां को समझाना तो दूर खुद का हिस्सा मांग रही हो ? मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरी बहनें ऐसी होंगी ?क्या शादी में दान दहेज की कुछ कमी रह गई थी ? 

आहत होते हुये उन्होंने तुरंत मुझे फोन लगाया ""मुनिया तू बोल तू क्या कहना चाहती है"?

"अब मैं क्या कहूं भइया , यह सब सोचना आप बड़े लोगों का काम है ।मैं इन सब में नहीं पड़ना चाहती ।मुझे मेरे परिवार और आप लोगों के साथ बस शान्ति और सुकून चाहिए "।

"शांति हां वह तो मेरे मरने पर ही मिलेगी "।मेरे आंसू निकल पड़े

 " क्या शांति की इतनी बड़ी कीमत होती है ?"

बस अब तू बता तुझे भी हिस्सा चाहिए" 

"'हां भैया! पैसा किसे खराब लगता है "

" अपने आप को संभालते हुए मैंने मजबूत होते हुए कहा।   

"क्या अपनों की कोई अहमियत नहीं तेरे लिये "?  

"हमें तो है भइया ! पर अब आपको सोचना है"  

"बस !अब मुझे जबाब मिल गया ।पूंछता हूं मां को वे क्या करना चाहेंगी ? तुम लोगों में तो मुझे वहीं समझदार लगतीं हैं""

फोन रख कर मैंने सर पकड़ लिया सामने पतिदेव खड़े थे अपना हिस्सा मांगते हुए शर्म से आंखें नीची हो गई। उन्होंने जैसे ही कंधे पर हाथ रखा, मैं सिसक पड़ी। मेरा खराब मूड, रात में आने वाले फोन ,हम दोनों के बीच अजीब सा सन्नाटा फैलाने लगे थे। पर सिलसिला जारी रहा। दीदी कहती तुझे मेरा साथ देना है अपने दिल को मजबूत कर ।भाई से भूलकर भी मत कहना मुझे कुछ नहीं चाहिए । तुझे नहीं चाहिए तो मुझे दे देना ।देख मुनिया दुनियादारी भी समझ-- भइया कितने चालाक हैं हमें हिस्सा नहीं देना चाहते ।वह मौज करें और हम तुम खाली बोतल की तरह " मैं समझ गई मेरे ही निकाले रास्ते ने दी को भटका दिया है। खैर दी के बारे में आगे सोचेंगे।

अब आलम यह था घर बाजार कहीं पर भी जब -तब घंटी टनटनाती और तब तक हथोड़ा मारती रहती जब तक कि उठा ना लूँ।पापा का बेबस चेहरा बार-बार आंखों के सामने आ जाता। अपने अधूरे बचपन की ना जाने कितनी यादें अब आंसुओं में भीगती रहती ।कई बार रात को उठ उठ कर बैठ जाती। मेरी मनोदशा धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही थी ।दिन रात के फोन आपसी रिश्तों को कलह में बदलने लगे थे ।बच्चे भी डरे डरे सहमे से रहने लगे थे पता नहीं मैं किस बात पर फट पड़ूँ।डॉक्टर के मशविरा पर बदलाव के लिऐ पतिदेव ने इस पहाड़ी इलाके को चुना था।  

छोटा सा टेंट हाउस थोड़ी दूर पर नदी की कल कल मुझे बरबस अपनी तरफ खींचती। पानी से अठखेलियां करते करते अचानक अंजुलि में पापा का चेहरा दिखाई देने लगा ।हरे रंग की चादर के नीचे निढाल निश्चल लेटे पापा की असहाय भीगी आंखें कुछ कहना चाहती थी पर कह नहीं पा रही थी भरा पूरा शरीर मिट्टी के ढेर में बदल रहा था ।अपनी मर्जी से जीने का गुमान करने वाले पापा अब अपनी मर्जी से बोलना तो दूर, खिल खिलाकर हंस तक नहीं पा रहे थे। पापा ने मुझे इशारा से बुलाया मैंने कान उनके मुंह से लगा दिए।  

"मुनिया रो मत ! मैं कहीं नहीं जा रहा ,मैं अपने इसी घर में हीं रहूंगा ।घर के अहाते में मिट्टी के नीचे पड़े हुए बीज के नवांकुर को तुम ध्यान से देखना शायद तुम्हें उनके आसपास मेरा अहसास हो या मेरे पुनर्जन्म का अनुभव हो जाए ।क्या पता मैं हवा में घुल मिल जाऊं। बादलों से गिरने वाली बूंदों में समाकर तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर अपना एहसास करबाऊँ। शायद हमारे घर की चौखट पर बिछी रेत का कण- बन जाऊं जो हर रोज तुम्हें छूकर आशीर्वाद दे। 

बातें थम गई थी मां का फोन था "कल वकील आया था तुम दोनों को आना होगा पेपर पर साइन करने के लिऐ "। मां भैया ने क्या कहा '? "मुनिया अब तो वे दोनों चाहते हैं कि मैं उनके साथ रहूं और तुम दोनों को हिस्सा दे दूं ,और मैं भी ऐसा ही सोच रही हूं घर का क्या ---काम तो बेटा ही आएगा न-– ? आखिर बेटियां तो पराई घर की होती हैं । 

 "मां! यह आपने क्या कह दिया, हम बहनों ने तो यह नाटक आप लोगों के बीच आई दूरियों को मिटाने के लिए किया था, हिस्से के लिए नहीं?  नहीं मां ! मैं नहीं आऊंगी और ना ही मुझे हिस्सा चाहिए ।मेरे हिस्से का सुकून मुझे मिल गया है। हम सभी एक हैं तो पापा मेरे साथ हैं मेरा अधूरा बचपन उनके सान्निध्य में , पूरा होते मुझे देखना है सुकून और शांति से ।यह तो केवल भाई के अंदर रिश्तो की अहमियत समझाने की कोशिश करवाना था ।पता नहीं आप लोगों ने हमारे बारे में क्या सोचा क्या समझा ?

 चलो देर से ही सही पर आप लोग रिश्तो की गरिमा को समझ गये ।इतनी सी बात थी केवल तीन शब्द प्यार दुलार आश्रय यही हमारा हिस्सा था, जो हमें मिल गया।


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