आलौकिक प्रेम

आलौकिक प्रेम

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"तू बार-बार अपना मज़ाक बनाने यहां क्यों आ जाता है पण्डित!" वहिदा हँसते हुये प.कमल पर कटाक्ष करते हुये बोली।

"यह तुम्हारे लिए मज़ाक का विषय हो सकता है वहिदा, मेरे लिए नहीं।" प.कमल अपने कथन का दृढ़ता से समर्थन करते हुये बोले।

पण्डित कमल शहर के रेड लाइट एरिया में नवनिर्मित मंदिर के पुजारी नियुक्त होकर एक वर्ष पूर्व ही यहां आये थे। नगर पालिका निगम ने इस क्षेत्र विशेष में बढ़ते यौन अपराध और वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक बुराई पर धार्मिक आयोजन आदि के माध्यम से नियंत्रण करने के उपाय आरंभ कर दिये थे। क्षेत्र में पूजा-पाठ और दान-धर्म की घटनाएं के विस्तार होने से निश्चित रूप से यहां कार्यरत महिला-पुरुष का हृदय अपराधिक प्रवृत्ति से विमुख हो सकेगा! ऐसे कयास लगाये जा रहे थे।

इस परिवर्तन की संभावना का दायित्व युवा पण्डित कमल पर छोड़ा गया। प.कमल पुरोहित सरल स्वभाव के धनी होकर कुर्ता पायजामा पहनते थे। सिर पर लम्बी चोटी और मस्तक पर चन्दन का तिलक उनको अन्य से पृथक करता था। नगर स्थित मंदिर में पण्डिताई कर रहे प.कमल ने एक दिन अचानक मुख्य कोठे की रौनक वहिदा को विवाह हेतु प्रस्ताव दे दिया। वहिदा यह जानकर पहले तो खूब हँसी। फिर कमल के विवाह प्रस्ताव पर अपनी अस्वीकृति प्रदान कर दी। विमला बाई अपने कोठे की शान वहिदा को किसी मूल्य पर खोना नहीं चाहती थी। वहिदा के सौन्दर्य के पुजारी शहर भर में फैले थे। जो प्रसिद्ध पूंजीपति वर्ग से संबंधित थे। वहिदा के होने से विमला बाई के कोठे मे धन वर्षा होना सामान्य घटना थी।

"देखो पण्डित जी! आप यहां पूजा पाठ हेतु पधारे है। आप स्वयं पुज्यनीय है। ये प्रेम, विवाह आदि आपको शोभा नहीं देता। अच्छा होगा आप वहिदा से दूर ही रहे।" विमला बाई की बातों में धमकी भरे स्वर थे।

"देवी! वहीदा और मैं दोनों युवा अवस्था को प्राप्त है। उचित आयु में विवाह होना हम दोनों के हित में है।" प.कमल की बातों में आत्मविश्वास था।

वहिदा की सहेलियाँ आरंभ में उसे कमल का नाम लेकर चिढ़ाया करती थी। किन्तु वहिदा की कमल के प्रति अरूचि जानकर अदिति और बाकी की सहेलियों ने पण्डित कमल को शिक्षा देने की ठान ली।

"पण्डित जी! आप ईश्वर के उपासक होकर वहिदा से प्रेम करते फिर रहे है। क्या आपका यह आचरण अमर्यादित नहीं है।" वहिदा की सहेली पुनम ने प. कमल से कहा।

"यदि मेरा आचरण अमर्यादित है तब आप लोगों का कृत्य क्या कहा जायेगा? यह सत्य है कि वेश्यावृत्ति आप लोगों को रोज़गार है किन्तु यदि यह उचित होता तो आज इसे सर्वत्र मान्यता नहीं मिल जाती?" प.कमल बोले।

"जहां तक मेरा प्रश्न है, तो मैं वहिदा से प्रेम कर कोई अशोभनीय हरकत नहीं कर रहा हूं। मुझे इस बात पर और भी अधिक गर्व होगा जब वहिदा और मेरा विवाह संपूर्ण समाज के सम्मुख होगा।" प.कमल बोले।

मंदिर में पूजा अर्चना के उपरांत प्रसाद वितरण के माध्यम से कोठे पर आकर प.कमल, वहिदा का दर्शन नियम से किया करते। पण्डित कमल की वहिदा के प्रति बढ़ती प्रित से विमला बाई चिंतित थी।

एक दिन रेड लाइट एरिया में बहुत चहल पहल थी। बहुत से ग्राहक अपनी वासना रूपी तृष्णा को शांत करने नगर में आ रहे थे। नगर की रौनक आज देखते ही बनती थी। वेश्यावृत्ति में लिप्त सभी महिला-पुरुष धन की अधिक आवक से प्रसन्नचित थे।

"पण्डित! आज मैं बहुत प्रसन्न हूं। मैं तुझसे विवाह तो नहीं कर सकती। हां... मगर तेरे साथ सुहागरात अवश्य मना सकती हूं। वो भी बिल्कुल मुफ्त! सिर्फ तेरे लिए। बोल क्या बोलता है?" शराब के नशे में धुत्त वहिदा बोल रही थी।

"तुम्हें प्रसन्न देखकर मैं भी प्रसन्न हूं। किन्तु विवाह पूर्व तुम्हें छूना भी मैं अमर्यादित आचरण समझता हूं।" कमल ने बाहों का सहारा देकर लड़खड़ाती वहिदा को सहारा देकर समझाया।


इतने में पुलिस ने वहां अघोषित छापा मारी कर दी। चारों ओर भगदड़ मच गयी।

महिला-पुरुष जो भी वहां मिले, पुलिस ने सभी को गिरफ्तार कर लिया। कुछ लोग अवसर पाकर फरार हो गये।

"आपको शर्म नहीं आई पण्डित जी! वेश्याओं के कोठे पर जाते हुये? आप समाज की प्रेरणा है यदि आप ही वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहित करेंगे तो सरकार के समाज सुधार के प्रयास तो विफल हो जायेंगे न?" इन्सपेक्टर सलीम खान गुस्से में बोले रहे थे।

पण्डित कमल भी अन्य महिलाओं और पुरूष के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ गये थे।

"क्या आपको शर्म आई श्रीमान! आप भी तो उस कोठे से आ रहे है।" कमल बोले।

आसपास के पुलिस कांस्टेबल हँस पड़े।

"शटअप! मैं वहां रंगरलियां मनाने नहीं गया था। अपना फर्ज़ निभा रहा था।" सलीम खान ने कहा।

"तब आप कैसे कह सकते है कि मैं वहां कोई अनुचित कार्य कर रहा था। मैं भी वहां अपना कर्तव्य निभा रहा था।" कमल बोले।

"रात के दो बजे आप वहां कौन-सा कर्तव्य निभा रहे थे पण्डित जी!" सलीम खान ने व्यंग्य कसा।

"इसमें आपका कोई दोष नहीं है। यह सब प्राकृतिक है। ताड़ी के वृक्ष के नीचे बैठकर अगर गंगा जल भी पिया जाये तब भी उसे देखकर लोग कहेंगे कि ताड़ी पी रहा है।"

(ताड़ी- एक प्रकार की शराब)

इन्सपेक्टर सलीम खान को एक पुलिस कांस्टेबल ने कान में आकर कुछ कहा। वे समझ गये कि स्थानीय शासन ने रेड लाइट एरिया स्थित मंदिर के पुजारी हेतु कमल पण्डित जी का चयन किया है। प.कमल वेश्यावृत्ति रोकने हेतु सशक्त प्रयास कर रहे थे। इन्सपेक्टर सलीम खान ने यह जानकर पण्डित कमल को रिहा कर दिया।

"क्षमा करे पण्डित जी। जाने-अनजाने अगर कुछ अभद्रता हो गई हो तो कृपया मुझे माफ़ करे।" सलीम खान बोले।

"नहीं खान साहब! आपने अपनी ड्यूटी बहुत कुशलता से निभाई। हमें आपकी कर्त्तव्यनिष्ठा पर गर्व है। आप जैसे सक्रिय पुलिस अधिकारीयों के कारण ही वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक बुराई थर-थर कांप रही है।" प.कमल बोले।

समस्त रेड लाइट एरिया में प.कमल की चर्चा थी।  उनकी उपस्थिति से वेश्यावृत्ति व्यवसाय पर संकट उत्पन्न करने लगा था।

"पण्डित जी! आप वहिदा से इतना प्रेम क्यों करते है? आखिर वहिदा में ऐसी कौन-सी बात है जो हम किसी में भी आपको नज़र नहीं आई।" अदिति ने कोठे पर पूजा का प्रसाद वितरण करने आये प.कमल से मसखरी वश पूछ लिया। वहिदा और अन्य महिलाओं को अदिति की शरारत समझ आ गयी। विमला बाई भी इस बात का आनंद लेना चाह रही थी।

"प्रथमतया तो अन्य पुरूषों की भांति वहिदा का सौन्दर्य मुझे प्रिय लगा।" प.कमल बोले।

सभी चौंक गए।

"मैं वहिदा के अन्तर्मन के सौन्दर्य की बात कर रहा हूं। तत्पश्चात उसका मेरे प्रति निश्छल प्रेम देखकर मैं अभिभूत हूं।" प.कमल बोले।

"क्या वहिदा ने आपसे कहा कि वह आपसे प्रेम करती है?" एक अन्य महिला विनिता ने पूछा।

"प्रत्येक बात मुख से कही जाये यह आवश्यक तो नहीं। मुझसे विवाह कर वह मुझे समाज के सम्मुख अपमानित होने नहीं देना चाहती। इसी भय के कारण वहिदा मुझसे विवाह नहीं कर रही है।" बात को घुमाकर प.कमल बोले।

विमला बाई के साथ वहिदा और कोठे की अन्य महिलाओं को इस बात की अधिक चिंता थी कि यदि कुन्दन को प.कमल की वहिदा के प्रति दीवानगी की तनिक भी जानकारी लगी तब प.कमल के प्राणों को संकट उत्पन्न हो जायेगा। कुन्दन शीघ्र ही जेल से छूटने वाला था। असंख्य अपराध उस पर पंजीकृत थे। कुन्दन पर दो मनुष्यों की हत्या के प्रकरण अदालत में लम्बीत थे। उसके विरूद्ध ठोस प्रमाण के अभाव में पुलिस उसे दण्डित नहीं कर पा रही थी। कुन्दन वहिदा पर अत्यधिक मोहित था। वह जब तक जेल से बाहर रहता, वहिदा पर उसका एकाधिकार ही रहता। उसके रहते अन्य ग्राहक वहिदा को छु भी नहीं सकते थे। विमला बाई और शेष सभी वेश्यावृत्ति में लिप्त महिला कुन्दन से डरती थी। मगर एक वहिदा ही थी जो कुन्दन का विरोध खुले मन से कर सकती थी। कुन्दन वहिदा पर धन भी खूब लुटाया करता।

कुन्दन जेल से बाहर आ गया। वह सीधे वहिदा से मिलने उसके कोठे पर गया। कुन्दन के चेले सम्राट ने वहिदा और प.कमल के प्रेम प्रसंग के विषय में उसे बता दिया। विमला बाई भी चाहती थी किसी तरह कमल से वहिदा का पीछा छूट जाये। इसलिए उसने जानबूझकर कुन्दन को नहीं रोका।

"क्यों बे पण्डित! पूजा अर्चना करने वाले पण्डित प्यार-मोहब्बत कब से करने लगे।" कुन्दन मंदिर के पास आते ही दहाड़ा। कुन्दन की ललकार सुनकर कोठों से महिलाएं झाकने लगी। उन्हें विश्वास था कि आज कोई न कोई नया तमाशा अवश्य होगा।

"आपके विषय में बहुत सुना था। आज देख भी लिया।" कमल ने कुन्दन से कहा।

"कुन्दन भैया आपको चेतावनी देने आये है कि आप वहिदा भाभी से दूर रहो।" सम्राट बोला।

"क्यों भाई सम्राट! वहीदा से दूरी हम क्यों बनाये। हमने ऐसा कौन-सा अपराध किया है?" प .कमल ने पूछा।

इससे अधिक उत्तर देना कुन्दन अपनी प्रतिष्ठा के विपरीत समझता था। वह प.कमल को पीटने के लिए आगे बढ़ा। उसने प. कमल को काॅलर से पकड़कर मंदिर से बाहर निकला। एक धक्के की मार से प.कमल मंदिर के बाहर नीचे खुली जगह पर गिर पड़े। क्षेत्र की महिलाएं घरों की बालकनी और छतों से इस मनोरंजन से भरे क्रियाकलाप को देखकर प्रसन्नता व्यक्त कर रही थी। मात्र वहिदा ही एक ऐसी महिला थी जिसे यह दृश्य उचित नहीं लग रहा था। क्योंकि यह लड़ाई वहिदा को प्राप्त करने के अधिकार के लिए लड़ी जा रही थी।

"मित्र कुन्दन! जानता हूं कि तुम्हारे मन में मेरे प्रति बहुत क्रोध है। अगर मुझे मारने-पिटने से तुम्हारे मन को सांत्वना मिलती है तब मैं मार खाने को सहर्ष तैयार हूं।" प.कमल बोले।

"इसे तैयार होना नहीं विवशता कहते है पण्डित!" कुन्दन ने पुनः दोनों हाथों से पृथ्वी पर गिरे प.कमल को उठाते हुये कहा। अगले ही पल कुन्दन के दाहिने हाथ के सशक्त प्रहार से प.कमल दूर जा गिरे।

"कुन्दन! अब भी तुमसे अधिक वीर मैं ही हूं।" प.कमल बोले।

"कैसे?" सम्राट दूर से पास आकर बोला।

आसपास के लोग भी प.कमल पर हँस रहे थे। कुन्दन के हाथों बुरी तरह पीटने के बावजूद वे स्वयं को बहादुर योद्धा बता रहे थे।

"किसी को दण्ड देना बहुत सरल है सम्राट! क्रोध के वशीभूत कुन्दन ने मुझे दण्ड देने में तनिक भी विलंब नहीं किया। इसके विपरीत क्षमा करना सबसे बड़ा साहसिक कार्य माना गया है। किसी को उसके ग़लती या अपराध पर क्षमा करना सबके वश में नहीं होता। कहा भी गया है 'क्षमा वीरस्स भूषणम'। मैंने कुन्दन को क्षमा कर दिया है। इसलिए उसके साहस से बड़ी मेरी वीरता हुई।" प.कमल बोल चूके थे।

कुन्दन, प.कमल को तब तक लात-घुसों से पीटता रहा जब तक वह स्वयं थक कर चूर नहीं हो गया। ऐन वक्त पर पुलिस आ गयी। इन्सपेक्टर सलीम खान ने प.कमल को हाथों का सहारा देकर खड़ा किया।

"आपकी यह हालत किसने की पण्डित जी! मुझे बताईये, उसकी खाल खींचकर भूसा न भर दिया तो मेरा नाम सलीम खान नहीं।" इन्सपेक्टर सलीम खान ने क्रोधित होकर पूछा।


प. कमल कुछ बोल पाते इससे पूर्व ही वे अचेत हो कर पृथ्वी पर गिर पड़े। उन्हें तुरंत नज़दीक के हाॅस्पीटल ले जाया गया। वहिदा कुन्दन पर जमकर बरसी। कुन्दन पर पुनः गिरफ्तारी का खतरा मंडराने लगा था। किन्तु प.कमल ने उसके खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। अपितु तीसरे माले से चक्कर आकर गिर पड़ने का झूठा कथन दर्ज करवाकर प्रकरण बंद करवा दिया।

तीन दिनों के उपचार के दौरान रेड लाइट एरिया की बहुत सी महिलाएं प.कमल से मिलने हाॅस्पीटल गई। मगर वहिदा चाहते हुये भी नहीं गई। मंदिर से लगी पुजारी कुटीया में प.कमल स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे।

"पण्डित जी! क्यों अपने प्राण खतरे में डालते हो, भूल जाइये मुझे। आप युवा है, निष्कलंक है। आपको उत्तम से उत्तम लड़कीयाँ मिल जायेंगी।" मंदिर की कुटिया में प.कमल से मिलने आई वहिदा ने कहा।

"प्रिय वहिदा! मेरे प्राण तो तुम हो। तुमसे दूर होकर तो वैसे भी यह देह मृत समान है।" प.कमल बोले।

"आप समझ क्यों नहीं रहे है? कुन्दन का कोई भरोसा नहीं। वह दोबारा भी आप पर हमला कर सकता है।" वहिदा ने चिंता व्यक्त की।

"यदि हम दोनों एक होकर आने वाली इस चैतावनी का सामना करे तो निश्चित ही जीत हमारी होगी।" प.कमल बोले।

"पण्डित! तू इतनी मार खाकर भी वहिदा को नहीं भुला।" कुन्दन वहां पुनः आ धमका। कुन्दन की उपस्थिति कोठे के आसपास पुनः किसी संकट का संकेत थी। यह जानकर विमला बाई और अन्य महिलाएं कुन्दन को समझाने पण्डित जी की कुटीया में आ पहुंची।

"लगता है तुम्हारी जीवन लीला मेरे हाथों ही समाप्त होना लिखी है पण्डित।" कुन्दन पुनः पण्डित जी को धमका रहा था। मगर इस बार पण्डित कमल की ढाल वहिदा थी जो कुन्दन के सामने खड़ी थी। विमला बाई ने भी वहिदा का साथ दिया। और कुन्दन को वहां से लौट जाने का निर्देश दिया। मगर प.कमल ऐसा नहीं चाहते थे।

"कुन्दन! तुम्हें अपनी शारीरिक शक्ति पर बड़ा अभिमान है न! चलो हम दोनों एक खेल खेलते है, यदि मैं हारा तो यहां से चुपचाप चला जाऊँगा और अगर तुम हारे तो तुम्हें अपने सभी बुरे काम छोड़कर एक अच्छा आदमी बनने के प्रयास करना होगें! बोलो स्वीकार है?" प.कमल बोले।

"मंज़ूर है। मगर खेल क्या है?" कुन्दन बोला।

"तुम्हें मेरे साथ पंजा लड़ाना होगा।" प.कमल के इतना कहते ही कुन्दन ज़ोर से हँस पढ़ा। उसके साथ ही उपस्थित सभी महिलाएं प.कमल के इस प्रस्ताव पर अप्रसन्न थी। कुन्दन बलिष्ठ था। वह सरलता से पंजा लड़ाने के खेल में प.कमल को हरा देगा, जिससे पण्डित जी को हारकर यहां से लौट जाना पड़ेगा। कुन्दन अपनी आस्तिन चढ़ाकर कुर्सी पर बैठ गया। दोनों में पंजा लड़ाने का खेल आरंभ हुआ। कुन्दन की आँखो में सरलतम खेल की पूर्व विजय देखी जा सकती थी। प.कमल अति सामान्य होकर पंजा लड़ा रहे थे। कुन्दन ने हाथ में बल की मात्रा बढ़ा दी ताकी खेल शीघ्र जीतकर वह पण्डित कमल को यहां से विदा करे। पण्डित कमल धैर्यपूर्वक मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। जबकी कुन्दन के माथे पर पसीना छलक आया था। वह अपनी संपूर्ण शक्ति लगा चुका था किन्तु प. कमल का हाथ विपरीत दिशा में लुढ़काने में वह असमर्थ था। उसे आभास हो चुका था कि वह प.कमल को इस खेल में पराजित नहीं कर सकेगा। पण्डित कमल ने कुन्दन की मनःस्थिति भांप ली। अगले ही पल उन्होंने कुन्दन को पंजा लड़ाने के खेल में पराजित कर दिया।

"कुन्दन! शारीरिक बल से अधिक आत्मबल की शक्ति होती है। मांस-मदिरा का सेवन कर शरीर को बाहरी रूप से बलिष्ठ तो बनाया जा सकता है किन्तु इन व्याभिचारों के आचरण से आन्तरिक शक्ति क्षीण हो जाती है।" प. कमल ने कुन्दन को समझाया।

"पृथ्वी पर सर्वाधिक शक्तिशाली प्राणी हाथी है जो शाकाहारी भोजन करता है। अश्व भी शाकाहारी है किन्तु संसार में उसे शक्ती का पर्याय के रूप में मान्यता प्राप्त है।" प.कमल आगे बोले।

कुन्दन का सिर शर्म से पाताल में झुका जा रहा था।

"अपनी शक्ती का प्रदर्शन, निरीह प्राणीओं की सुरक्षा में करना चाहिए। न की अपनी महत्ता सिध्द करने में।" प.कमल की बातों ने उपस्थित सभी का हृदय जीत लिया था।

"कुन्दन! यदि अपनी माता के दूध का सम्मान न बढ़ा सको तो कम से कम उसे लज्जित तो न करो।" प. कमल के इस वाक्य ने कुन्दन का हृदय भेद दिया। वह द्रवित होकर प.कमल के चरणों में गिर गया।

वहिदा के हृदय का द्वार प.कमल के लिए खुल चुका था। उसके स्वास्थ्य की चिंता में वहिदा अपने दैनिक कार्य को कम महत्व देने लगी। कोठे पर आ रहे ग्राहकों के प्रति भी वह कम ही रूचि रखती। विमला बाई को यह उचित नहीं लगा। उसने अदिति को तैयार किया कि वह कामदेव बनकर प. कमल के विश्वामित्र रूपी मन को जीत ले। ताकी इसका परिणाम देखकर वहिदा, जो अब प.कमल के प्रेम में पढ़ चुकी है, पुनः अपनी यथास्थिति पर लौट आये।

वहिदा के नाम से प.कमल को अपने कमरे में बुलाकर अदिति ने अपने यौवन का चमत्कार दिखाना आरंभ किया। अदिति ने स्वयं के बदन से साड़ी छिटक कर दूर फेंक दी। उसका गौर वर्ण देखकर प .कमल की आँखें फटी की फटी रह गयी।

"आईये पण्डित जी! मेरे नज़दीक आईये। अपनी वर्षों की क्षुधा शांत करे। जीवन का आनंद ऊठाईये।" अदिति का निमंत्रण पाकर प. कमल धीरे-धीरे कदमों से उसकी ओर बढ़ रहे थे। यह दृश्य छत के उपर स्थित छिद्र से विमला बाई देख रही थी। यह देखने के लिए उन्होंने वहिदा को भी वहां आमन्त्रित किया। ताकि प. कमल के प्रति उसका मोह भंग हो सके।

प. कमल के दोनों हाथ अदिति के कांधों की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। विमला बाई का मंतव्य पूरा होने जा रहा था। वहिदा भी एकटक यह दृश्य देख रही थी। अदिति जीत के बहुत करीब थी। उसने अपनी आँखें बंद कर ली। प. कमल के हाथ अदिति के दोनों कानों को ढक चुके थे।

"देखना पण्डित अदिति को पहले किस करेगा।" वहिदा की सहेली पुनम ने बड़े विश्वास से कहा।

सभी आश्चर्यचकित होकर पण्डित कमल के क्रियाकलाप की अगली क्रिया देखने को आतुर थे।

प. कमल ने अदिति के मस्तक को चूम लिया।

"प्यारी बहना! अब तू बड़ी हो गयी है। ऐसी तुच्छ हरकते तुझे शोभा नहीं देती। कल को तेरी शादी होगी, तो तेरे ससुराल वाले तो हमें बातें सुनायेगें न! अपना नटखट पना छोड़। और ये कपड़े ठीक से पहन ले। ठीक है।" प. कमल ने अदिति को बहन बनाकर सारा वातावरण ही परिवर्तित कर दिया। यह अदिति की हार नहीं थी बल्कि हर उस नारी की पराजय थी जो प. कमल को एक काम पुरूष समझ रही थी।

विमला देवी ने भी अपने सौन्दर्य का जाल प. कमल पर फेंका। वह अर्ध निर्वस्त्र होकर प.कमल के सम्मुख उपस्थित हुयी। प. कमल चौक पड़े।

"क्या देख रहे हो कमल!" विमला देवी बोली।

रात गहराती जा रही थी।

"मैं जानती हूं की आजकल के युवाओं को आन्टी टाइप औरतें अधिक पसंद होती है। ये नई लड़कीयाँ क्या जाने की आज के युवकों को कैसे प्रसन्न किया जाता है?" विमला बाई आगे बोली।

"जो मेरे पास है वह अदिति के पास नहीं है।" विमला बाई बोली।

अगले ही पल विमला बाई ने कमल को अपनी ओर खींच लिया। उसने कमल का सिर अपने हृदय से सटा लिया। वह प.कमल की प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा में थी।

"मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ माँ । आपकी छाती से लगकर मुझे ऐसा प्रतित हो रहा है जैसे कि मैं पुनः शिशु अवस्था को प्राप्त होकर अपनी मां के स्तनों से लिपटा हूं। मुझे पुत्र समान स्नेह देकर आपने मेरी स्वर्गीय मां की कमी पुरी कर दी। मैं कृतार्थ हुआ।" प. कमल बोले। इस घटना ने विमला बाई का हृदय परिवर्तन कर दिया। प.कमल का मान-सम्मान विमला बाई की नज़रों में और भी बढ़ गया।

प. कमल के इर्द-गिर्द मंदिर प्रांगण में क्षेत्र की महिलाएं डेरा लगाकर बैठी थी।

"पण्डित जी! आपको गुस्सा नहीं आता?" पूनम ने पूछा।

मंदिर के आंगन में प. कमल फुलों को एक लम्बे धागे में पीरो कर माला बना रहे थे।

"क्रोध कभी आता नहीं पूनम! क्रोध हम करते है। वो भी जानबूझकर। मैं अपने मन के अनुसार नहीं चलता अपितु मेरा मन मेरे कहे अनुसार चलता है।" प. कमल बोले।

"इसका अर्थ है कि आपकी इच्छा के विरुद्ध आपसे कोई कार्य नहीं करवाया जा सकता?" विनिता ने पूछा।

"निश्चित ही ऐसा है। यह लो आप में से जो भी मेरी मुट्ठी खोलकर यह फूल निकाल देगा, उसे मेरी ओर से एक पुरस्कार मिलेगा।" प. कमल ने गेन्दे का फूल अपनी हाथों की हथेलियों पर रखकर मुठ्ठी बांध ली।

एक-एक कर सभी महिलाओं ने जोर आजमाना करना आरंभ कर दिया। प. कमल को गुदगुदी छुड़ाने से लेकर उनके हाथों को अपने नुकीले दाँतों से काट कर उनकी मुट्ठी खोलने का प्रयत्न उपस्थित सभी महिलाओं ने बारी-बारी से किया गया किन्तु वे सभी मिलकर भी प. कमल की मुट्ठी खोल नहीं सकी।

वहिदा मंदिर के आंगन तक आ पहुंची।

अब सभी महिलाओं की दृष्टि वहिदा पर टीक गई। अब उसे ही प. कमल की मुट्ठी खोलनी थी।

वहिदा आगे बढ़ी। सभी ने प. कमल तक उसे पहुंचने का रास्ता दिया। वह नीचे बैठ चुकी थी। प. कमल ने अपना हाथ वहिदा की ओर बढ़ा दिया। वहिदा ने प. कमल का हाथ अपने गालों से स्पर्श कर उसे चूम लिया। अगले ही पल प. कमल के हाथों में रखा फूल वहिदा की गोद मे गिर पड़ा। दोनों का अंतःसंबंध देखकर हर कोई अभिभूत था।

प. कमल की ख्याति दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। उसका लिखा साहित्य लोग पढ़ने लगे थे। नगर में बलात यौन अपराध बहुत हद तक अंकुश में आ चुका था। वेश्यावृत्ति स्वैच्छिक थी। जो महिलाएं यह वेश्यावृत्ति छोड़कर अन्य सम्मान जनक कार्य करना चाहती थी, शासन उनके लिए उचित रोज़गार उपलब्ध करवाने के लिए प्रतिबद्ध थी। प.कमल इस हेतु विश्वसनीय माध्यम थे। नगर में अवांछनीय और असावधानी से उत्पन्न संतानों की पढ़ाई की उचित व्यवस्था की प.कमल ने की थी। प.कमल द्वारा व्रत-उपवास, यज्ञ, भजन, पौराणिक कथा इत्यादि की नये सिरे से व्याख्या की गयी। जो मानव मात्र की आन्तरिक शक्ति को प्रबल बनाते हुए उसे मनवांछित फल प्रदान करने की दिशा में सशक्त कदम था।

वहिदा और प. कमल के विवाह की सभी बाधाएं समाप्त हो चुकी थी। प. कमल को शौहर के रूप में स्वीकारने में वहिदा को अब कोई आपत्ति नहीं थी। जिले के कलेक्टर स्वयं इस आलौकिक प्रेम विवाह के साक्षी बने। नगर में दोनों का विवाह सामाजिक सुधार की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। शनै: शनै: कुछ अन्य पुरूष भी वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं को जीवन साथी के रूप में स्वीकार करने आगे आये। रेड लाइट एरिया की दशा और दिशा दोनों परिवर्तित हो रही थी। महिलाएं अपने सम्मानित भविष्य की कल्पना को साकार करने के प्रयास कर रही थी। सुबह नौ बजते ही नगर की बहुत सी महिलाएं हाथों में टिफिन लेकर नगर के पास ही नमकीन फैक्ट्री में काम पर जाने लगी। उनके बच्चें पीठ पर बस्ता लादे स्कूल की ओर जा रहे थे। सरकार ने नगर को साफ-स्वच्छ किया था और प. कमल ने रहवासीयों के मन निश्छल और निर्मल करने में अपनी महती भूमिका निभाई। वहिदा पेट से थी। प. कमल के निर्देश पर सातवें माह का गर्भ होने पर उसने फैक्ट्री जाना छोड़कर घर पर ही विश्राम करने का प्रस्ताव मान लिया। दोपहर में भोजन के उपरांत प .कमल कुछ पलों की नींद ले रहे थे। वहिदा अपने पति के पैर दबाने में परम सुख का अनुभव कर रही थी। नगर और अन्य वे स्थान जहां वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक बुराई का व्यापार, धन के लोभ में तथाकथित कुछ लोग बड़े ही गर्व के साथ संचालित कर रहे थे, प .कमल के पुनर्जागरण अभियान के कारण बहुत सी महिलाओं ने इस अनैतिक कृत्य को करने से साफ इंकार कर दिया था। उन लोगों ने अपने परम्परागत रोज़गार पर उत्पन्न संकट का कारण प. कमल को स्वीकार किया। इसलिए इन लोगों ने प.कमल की हत्या की निविदा एक कुख्यात अपराधी कंय्यूम काणा को सौंप दी। कुन्दन को जेल से छूटते ही पता चला की कंय्यूम काणा ने प. कमल की हत्या करने की सुपारी ली है। वह प.कमल को बचाने के लिए उनके मंदिर की ओर भागा।


वहिदा ने कंय्यूम काणा के पैर पकड़ रखे थे। उसके हाथों में पिस्तौल थी जिसकी नोक प.कमल की कनपटी पर रखी थी। वहिदा अपने पति को जीवित छोड़ देने की कंय्यूम काणा से प्रार्थना कर रही थी। प.कमल सामान्य अवस्था में खड़े होकर निर्भिक थे। उनके अंतिम वचन वे वहिदा से कह रहे थे- "जीवन-मृत्यु निश्चित है। जीवन से अधिक लगाव और मृत्यु से भय उचित नहीं है। मेरी मृत्यु के बाद मुझे पुज्यनीय न समझा जाए अपितु मेरे अनुभवों का लाभ उठाकर निरंतर सत्कर्म किये जाये। मानव को निरीह पशु कोई न समझे बल्कि उसे मानव होने का उचित सम्मान मिलना चाहिए। मेरी मौत के बाद मुझे कहीं भी जला दिया जाये किन्तु यहां नगर में मेरी कोई भी वस्तु सलामत न छोड़ी जाये। मेरी समाधी या अन्य कोई भी क्रियाकलाप जो मेरा महिमा मंडन करते हो, उन सभी भावि क्रियाकलापों का मैं कड़ा विरोध करता हूं। माताओं-बहनों के शील भंग उनकी इच्छा से पूर्व न हो इस हेतु हम सभी मिलकर प्रयत्न करे। मेरे बाद मेरे अधुरे कार्य मेरी धर्मपत्नी वहिदा करेगी। और उसके बाद हम दोनों की संतान। मैं अपने संपर्क में आये सभी मानव जाति का धन्यवाद देता हूं जिन्होंने मुझे अपार स्नेह दिया। मैं वहिदा से क्षमा मांगता हुं जिसका साथ मुझे बीच रास्ते पर ही छोड़ना पड़ रहा है। मेरी मृत्यु के कारण कंय्यूम को मैं क्षमा करता हूं। और आप सभी से निवेदन करता हूं कि उसे जीवित छोड़ देवे। उसके कर्मों का दण्ड उसे पुलिस देगी।" इतना कहकर प. कमल शांत हो गये। उनके प्राण पखेरू उड़ चूके थे। कुछ पलों के सन्नाटे के उपरांत रोने और चिखने की आवाज़े आकाश को गुंजायमान कर रही थी।

प. कमल की शवयात्रा किसी तीर्थ यात्रा के दर्शन से कम नहीं थी। लोगों का हजूम देखते ही बनता था। 'पण्डित जी अमर रहे, पण्डित जी अमर रहे' के नारे हर उस मार्ग में लगाये जा रहे थे जिस-जिस मार्ग से प. कमल की शवयात्रा गुजर रही थी। लोग अपनी-अपनी छतों से, बालकनी से उस महापुरुष के शव पर पुष्पवर्षा कर रहे थे। वहिदा ने अपने पति की चिता को मुखाग्नि दी। वहिदा अपने छोटे से दाम्पत्य जीवन से निराश नहीं थी। उसके भीतर पण्डित जी का दिया हुआ अगाध संबल था जिसकी बदौलत वह प. कमल के अधुरे रहे शेष कार्यों को सम्पन्न करने में जुट गयी। वहिदा के साथ सैकड़ो महिलाएं वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं को मुख्यधारा में जोड़कर उनके पुनर्वास का उत्तरदायित्व बखूबी निभा रही थी। प.कमल की मृत्यु ने वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक बुराई को समाप्त करने की दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। अब पहले से और भी अधिक लोग इस बुराई के प्रति जागरूक होने लगे। वेश्यावृत्ति छोड़ चुकी महिलाओं को शनै: शनै: समाज स्वीकारने लगा। उनके जीवन स्तर में सकारात्मक परिवर्तन देखा गया। वहिदा और उसकी टीम आज भी महिला पुनर्वास का कार्य संपूर्ण उर्जा के साथ कर रही थी। शासन ने वहिदा को प्रदेश आईकाॅन के रूप में महिला सशक्तिकरण का ब्रांड एम्बेसडर नियुक्त किया। पुष्पेन्द्र को माँ वहिदा पर गर्व था। जब वह प.कमल से संबंधित प्रेरक घटनाएँ उनके पुत्र पुष्पेन्द्र को सुनाती तब पुष्पेन्द्र का सिर अपने पिता के सम्मान में आकाश तक उठ जाता। पुष्पेन्द्र के मन में अपने पिता के पदचिन्हों पर चलने वाले विचार धीरे-धीरे आकार लेने लगे थे।



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