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madhu modi

Inspirational

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madhu modi

Inspirational

नया सवेरा

नया सवेरा

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दिव्या अभी-अभी कॉलेज से घर आई तो देखती है कि मां रोज की तरह किचन में व्यस्त है। भाभी अपने कमरे में फोन पर किसी से बातें कर रही थी। मां ने आवाज दी चल दिव्या खाना खा ले बेटा पता नहीं कॉलेज में कुछ खाया भी या नहीं लेकिन मां बेचारी को क्या पता कि दिव्या कॉलेज में कितना मजे करती थी। रोज कभी डोसा कभी समोसा तो कभी सैंडविच यही सब तो खाती थी वहां पर ज्यादातर समय कैंटीन में ही व्यतीत करती थी। 


यह नहीं की पढ़ाई में पीछे थी पढ़ाई में भी बहुत अच्छी थी अपना पीरियड कभी मिस नहीं करती थी लेकिन खाली टाइम ज्यादातर कैंटीन में ही बीतता था। सभी सहेलियों का अच्छा खासा ग्रुप था। खूब गप्पे लड़ाती थी हंसी मजाक करती थी ढेर सारी बातें सभी बहुत प्यार से खुश रहती थी।


घर में तो दिव्या का मन ही नहीं लगता था। क्योंकि घर में भाभी से ज्यादा मन नहीं मिलता था और मां आपने कामों में बिजी रहती थी। भैया और पिता जी दोनों दुकान पर रहते थे रात को ही घर आते थे । एक फिक्स रूटीन था। घर में ज्यादा किसी से अपने मन की बात नहीं कर पाती थी। क्योंकि कोई था ही नहीं है ऐसा। मां पिताजी से भाई से बहुत प्रेम था बहुत लगाव था लेकिन खुल के बात नहीं कर पाती थी। 


भाभी तो सारा दिन उसके लिए रिश्ते की तलाश में रहती थी। क्योंकि पिताजी को भी उसकी शादी की बहुत जल्दी थी वह जल्द से उसकी शादी करके भार मुक्त होना चाहते थे। दिव्या के लिए एक रिश्ता आया था । भाभी की रिश्तेदारी में से ही था। पिताजी ने पूरी तसल्ली कर ली थी। उन्हें लड़का पसंद था। अब लड़के वालों ने दिव्या को पसंद करना था। लेकिन दिव्या अभी शादी नहीं करना चाहती थी। वह अभी आगे पढ़ना चाहती थी। अपना कैरियर बनाना चाहती थी।                   ‌‌     

 आज दिव्या कॉलेज से घर आई तो उसे पता चला की उसे लड़के वाले देखने आ रहे हैं। देखा की सभी तैयारियों में लगे हुए हैं। मां किचन में थी। भाभी ड्राइंग रूम सजा रही थी। भैया बाजार से सामान लाने की लिस्ट बना रहे थे। जाते जाते मुझे कह गए कि अच्छे से तैयार हो जाना। दिव्या को तो समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। कैसे सबको समझाया जाए कि अभी पढ़ना चाहती है। उसने सोचा चलो देखती हूं लड़के वाले को खुद ही मना कर दूंगी लड़के को उल्टी सीधी बातें बता दूंगी वह अपने आप ही मना कर जाएगा। बात खत्म हो जाएगी। और वह रिश्ते से भी बच जाएगी।


खैर शाम को लड़के वाले समय से आ गए। लड़के के माता पिता जी और भाई भाभी थे। कुल 5 लोग। दिव्या बड़े आराम से उनके सामने बैठ गई। क्योंकि वह कोई शो पीस नहीं बनना चाहती थी। वह तो बिल्कुल नॉर्मल होने की कोशिश कर रही थी। लड़के की मां ने बातचीत शुरू की। दिव्या बड़े आराम से जवाब दे रही थी। उनको चाय पानी पिला रही थी। तब सब ने सोचा कि चलो लड़का लड़की को अकेले मिल लेने दे ताकि दोनों एक दूसरे को पसंद कर ले। सभी बाहर चले गए। 


अब कमरे में सिर्फ दिव्या और वह लड़का ही रह गए। लड़के ने दिव्या का नाम पूछा तो दिव्या ने भी उसका नाम पूछ लिया दीपक नाम था उसका। इससे पहले की दिव्या कुछ बोलती दीपक अपने आप ही कहने लगा वह शादी नहीं करना चाहता। लेकिन घरवालों के आगे वह कुछ बोल नहीं सकता। वह किसी और को पसंद करता है और अभी वह पढ़ाई कर रही है। वह शादी करेगा तो उसी से लेकिन समय आने पर। तो दिव्या ने कहा तो फिर आप यहां क्या करने आए हैं? दीपक ने कहा कि तुम ही इंकार कर दो। दिव्या ने कहा मैं कैसे इंकार कर द्ं। मेरे मां बापू जी क्या सोचेंगे मुझ पर से उनका विश्वास उठ जाएगा। वैसे शादी तो मैं भी नहीं करना चाहती लेकिन अपने मां पिताजी का दिल नहीं दुखाना चाहती। अब तो हम दोनों को मिलजुल कर ही रास्ता निकालना पड़ेगा। 


अभी वह बातें कर ही रहे थे कि भैया आ गए और पूछने लगे कि तुम दोनों की बातें हो गई तो दिव्या तो कुछ ना बोली पर दीपक कहने लगा जी हां हो चुकी। दोनों तरफ के लोग अंदर आ गए और मां और भाभी और भैया दिव्या को दूसरे कमरे में ले गए और पूछने लगे क्या सब ठीक है। दिव्या बेचारी क्या कहती। कहने लगी जैसे आपकी इच्छा। उसे लगा दीपक खुद ही मना कर देगा। वह खामखा मना करें। अपने आप ही सब ठीक हो जाए गा। 


लेकिन यह क्या उधर से तो आवाज आई कि हमें लड़की पसंद है हमारे दीपक को भी लड़की पसंद है यह रिश्ता पक्का हुआ। दोनों एक दूसरे को बधाइयां देने लग पड़े। दिव्या और दीपक दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। दिव्या ने सोचा कितना कमजोर इंसान है जो अपने मां-बाप को भी अपनी पसंद नहीं बता सकता इससे क्या शादी करूंगी। चलो अच्छा है खुद ही कोई ना कोई रास्ता निकल आएगा।


इधर उनके मां-बाप शगुन की डेट फिक्स कर रहे थे। पिताजी ने उनको कहा पंडित से पूछ कर हम कोई अच्छा सा मुहूर्त निकलवा लेंगे तो शगुन की डेट फिक्स कर लेंगे वह लोग खा पी कर चले गए। 


मां पिताजी भैया भाभी सभी बहुत खुश थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था मैं खुश क्यों नहीं। उन्होंने सोचा शायद घर से दूर जाने से इसका मन उदास है। उस रात दिव्या को नींद नहीं आई। सारी रात दिव्या सोचती रही कैसे इस रिश्ते से छुटकारा पाया जाए कि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। खैर उसने ऊपर वाले के सहारे सब छोड़ दिया।       


       सुबह कॉलेज गई तो किसी को कुछ बताया नहीं क्योंकि वह जानती थी अगर किसी को कुछ बता दिया तो सभी मजाक ही करेंगे और वह तो रिश्ता रखने में इंटरेस्टेड ही नहीं थी। आज पूजा का बर्थडे था तो वह पार्टी दे रही थी। कॉलेज के पास ही एक कैफे था वहीं पर सबने जाने का प्लान बनाया।


कॉलेज खत्म करने के बाद सब लड़कियां कैफे पहुंच गई। अभी सभी ऑर्डर ही दे रही थी तो दिव्या ने देखा एक कोने में दीपक किसी और लड़की के साथ बैठा कॉफी पी रहा है। थोड़ी देर के लिए तो उसके पसीने ही छूट गए फिर धीरे-धीरे उसने अपने आप पर काबू पाया और उसकी तरफ पीठ कर कर बैठ गई। 


सब ने कहा दिव्या तुम इतनी अन मनी क्यों बैठी हो क्या हुआ तबीयत तो ठीक है ना दिव्या बोले नहीं नहीं सब कुछ ठीक है बस ऐसे ही। पर ध्यान तो उसका सारा दीपक पर था और उसके साथ जो लड़की बैठी थी उस पर था। अरे इस लड़की को तो वह जानती थी यह तो उसके कॉलेज की ही स्टूडेंट है और उससे जूनियर है। अच्छा तो यह है दिव्या ने सोचा खैर थोड़ी देर बाद दीपक और वह लड़की चले गए।


दिव्या अब थोड़ा नॉर्मल हुई। उसने अपनी सहेलियों से कहा कि अभी अभी जो लड़की लड़का गए हैं यह लड़की तो अपने कॉलेज की ही है। तो पूजा ने कहा हां मैं इसे जानती हूं। यह मेरी कजन की फ्रेंड है। अब दिव्या के दिमाग में आईडिया आ गया। जब सब चले गए तो उसने पूजा को कहा मुझे उस लड़की से मिलवा दो। पूजा ने कहा तुम्हें उस लड़की से क्या काम है? दिव्या ने कहा ऐसे ही कुछ काम है बाद में बताऊंगी काम हो जाने के बाद मुझे उससे अकेले में मिलना है। पूजा ने कहा ठीक है कोई बात नहीं कल मैं उससे तुम्हारी मुलाकात करवा दूंगी।


दिव्या तो खुशी-खुशी अब घर पहुंची तो देखा सब खूब तैयारियों में लगे हैं चारों तरफ से बधाइयां आ रही है। शॉपिंग की लिस्ट बन रही थी। मां पूछ रही थी आज चलो और शगुन के लिए कोई ड्रेस पसंद कर लो तो दिव्या ने बहाना बना दिया नहीं मैं आज बहुत सर दर्द कर रहा है आज नहीं। कल चलेंगे। मैंने कहा ठीक है कोई बात नहीं आज आराम कर लो कल थक गई होगी ना। दिव्या की तो जैसे तैसे रात कटी।


सुबह कॉलेज गई तो पूजा को ढूंढ रही थी। पूजा से पूछने लगी तुमने उससे बात की तो पूजा कहने लगी अभी तो पहुंचे हैं वह अपना पीरियड अटेंड कर रही है फ्री होती है तो बात करती हूं क्या बात है तुम इतने उत्सुक क्यों हो दिव्या ने कहा ऐसे ही जरा जल्दी कोशिश कर दो ना पूजा ने कहा ठीक है। यह कहकर वह अपना पीरियड अटेंड करने के लिए चले गए।


दोपहर में पूजा ने कहा जाओ वह कैंटीन में है उससे मिल लो। दिव्या उसके पास गई। वह बड़ी हैरानी से दिव्या को देख रही थी। उसने पूछा आप कौन हैं और मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं। दिव्या ने कहा कल तुम जिसके साथ कैफे मेथी वह कौन था? 2 मिनट के लिए वह वह लड़की उसे देखती रही और पूछने लगी तुम मुझसे यह सवाल क्यों कर रही हो। कोई भी हो तुम्हें उससे क्या तो दिव्या ने बताया यह वही लड़का है जो कल मुझे देखने आया था और शादी के लिए हां करके गया है। वह लड़की बोली अच्छा तो वह तुम हो मुझे दीपक ने बताया था लेकिन आज ही मेरे मां बाबूजी दीपक के घर जा रहे हैं मेरा रिश्ता लेकर और सारा सच बताएंगे कल ही दीपक ने मुझसे सारी बात कर ली थी। दिव्या बोली सच क्या तुम सच कह रही हो। हां वह लड़की बोली यही सच्चाई है मुझे दुख है कि वह तुमसे शादी नहीं करेगा। दिव्या बोली मुझे और क्या चाहिए यही तो मैं चाहती थी। दिव्या भगवान का शुक्र अदा करते हुए चली गई आज वह बहुत खुश थी तो चलो अपने आप ही सब ठीक हो गया ।

                       

   दिव्या को उस लड़के से मिले आज 7 दिन हो गए थे लेकिन लड़के वालों की तरफ से कोई फोन नहीं आया था। इधर घर में शगुन की तैयारियां चल रही थी भैया ने सब बुकिंग्स करवा ली थी। मां भाभी तो शॉपिंग में बिजी थी। दिव्या तो पढ़ाई का बहाना करके नहीं जाती थी। अब उसे बड़ी चिंता हो रही थी। अब उसने सोचा लगता है लड़की से दोबारा मिलना पड़ेगा। 


अगले दिन कॉलेज गई तो उसने पूजा से कहा मुझे तुम्हारी कजिन की फ्रेंड से दुबारा मिलना है पूजा ने कहा क्या बात है तुमने मुझे पहले भी कुछ नहीं बताया आखिर क्या चक्कर है। पूजा उसकी फास्ट फ्रेंड थी तो उसने सोचा कि चलो इसको अब सब कुछ बताना ही पड़ेगा। दिव्या ने उसको सारा वृतांत बताया।


पूजा ने बताया की पांच 6 दिन से वह लड़की नहीं आ रही। दिव्या ने कहा मुझे उसके घर जाना पड़ेगा । पूजा ने कहा देखो वहां जाना बहुत मुश्किल है क्योंकि बहुत अच्छा इलाका नहीं है जहां वो रहती है लेकिन फिर भी हम चलते हैं। कॉलेज से बंक मारकर दोनों ऑटो में बैठ कर उसके घर की तरफ चल पड़े। एक बड़े से बाजार से निकल आगे जाकर छोटी छोटी गलियों में उसका घर था। बाहर से देखने से घर किसी पुराने जमाने का लगता था।


दरवाजा खटखटाया तो उस लड़की ने ही दरवाजा खोला। लड़की इन दोनों को देखकर हैरान रह गई। खैर उसने दोनों को अंदर आने के लिए कहा और उनके लिए पानी लेने चली गई। दिव्या ने देखा घर की हालत काफी खराब थी। दीवारों के प्लास्टर उखड़े पड़े थे। कमरे में बहुत ही साधारण सा फर्नीचर था जो कि उनके गरीबी की गवाही दे रहा था। कुल मिलाकर घर की जर्जर हालत सबकुछ बयान कर रही थी। 


दिव्या ने पूछा क्या तुमने दीपक के घर अपने मां बाप को नहीं भेजा । मेरी बात सुनकर वह रोने लग पड़ी।  वह बहुत उदास होकर बोली भेजा था लेकिन उन्होंने मना कर दिया। केवल मना ही नहीं कर दिया बल्कि मेरे मां-बाप को बेइज्जत कर कर घर से निकाल दिया।


दिव्या ने पूछा क्या दीपक कुछ नहीं बोला। लड़की ने कहा दीपक ने भी अपने घर वालों का साथ दिया क्योंकि उसे लगा कि अब उसे अमीर खानदान का रिश्ता मिल रहा है तो मुझ जैसे गरीब से क्या मिलेगा।उसने और उसके घरवालों ने रिश्ते से साफ इनकार कर दिया। दीपक का यह रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा था यह देख कर तो मुझे होश ही नहीं रहा क्या दीपक इतना गिर सकता है। अच्छा हुआ जो वहमेरा जीवन साथी नहीं बना। ऐसे जीवनसाथी से तो ना ही होना बेहतर है।


वह बोली मेरे पिताजी बैंक में एक साधारण से क्लर्क है और मां किसी सरकारी स्कूल में टीचर है। मेरे माता पिता जी मुझे बहुत मुश्किल से पढ़ा रहे हैं। बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चलता है। पर वह चाहते हैं कि मैं पढ़ लिखकर कुछ बन जाऊं। मैंने ही जिद की थी शादी के लिए लेकिन वह दहेज नहीं दे सकते। वैसे भी अब दीपक जैसे लड़के के लिए मेरे मन में कोई प्यार नहीं।


दिव्या भारी मन से वहां से चली गई। वह भी किसी कीमत पर ऐसे कायर और लालची इंसान से शादी नहीं करना चाहती थी। दिव्या सोच रही थी कि अब तो मां पिताजी को सब कुछ साफ-साफ बताना पड़ेगा। दीपक और उसके घर वालों का असली चेहरा दिखाना पड़ेगा। नहीं तो बहुत देर हो जाएगी। वह ऐसे लालची लोगों के घर हरगिज़ नहीं जाएगी। 


उसनेडरते डरते मां पिताजी को सारी बात बताई और उनसे माफी भी मांग ली कहा कि पिताजी मैं अभी शादी नहीं करना चाहती अभी पढ़ना चाहती हूं कैरियर बनाना चाहती हूं उड़ना चाहती हूं जीवन को समझना चाहती हूं। मैं आजकल के जमाने की लड़की हूं। पढ़ लिख कर आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं। अगर आप मेरा साथ दें और मुझ पर विश्वास करें तो यह सब हो सकता है ऐसा कहकर वह सुबक सुबक कर रोते हुए पिताजी के गले लग गई पिताजी ने उसके सर पर हाथ फेरा और कहा अब जो भी होगा तुम्हारी इच्छा से ही होगा तुम खूब पढ़ो लिखो और अपने पैरों पर खड़े होकर दिखाओ हम सभी तुम्हारे साथ हैं दिव्या बहुत खुश हुई। 


अब उसके मन से सारा भार उतर गया था वह सोच रही थी उसने जीवन में अपने मां पिताजी के साथ दिल की बात ना करके बहुत बड़ी गलती की आज उसे महसूस हुआ कि मां बाप सिर्फ बच्चों की खुशी ही चाहते हैं। अंधेरा छठ चुका था और एक नया सवेरा उसका इंतजार कर रहा था।


कॉलेज का प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। दिव्या ने आज कॉलेज में टॉप किया था। यह सब उसकी मेहनत की नतीजा था। मां बाप के समर्थन और आशीर्वाद से उसने पढ़ाई में कड़ी मेहनत की और आज इस मुकाम पर पहुंच गई। 


2 दिन बाद सभी सहेलियों ने डलहौजी जाने का प्रोग्राम बनाया। सभी पढ़ाई कर कर के थक जो गई थी। मां पिताजी ने खुशी खुशी उसे जाने की अनुमति दी थी। कल सभी लड़कियां डलहौजी के लिए रवाना हो गई। एक छोटी सी डीलक्स बस में सभी लड़कियां खूब इंजॉय कर रही थी। सभी गीत गाती हुई गेम्स खेलते हुए जा रही थी। 


दिव्या को तो शुरु से ही पहाड़ बहुत पसंद थे। पहाड़ों के घुमावदार मोड़ और पर्वतों की हरियाली और दूर से नजर आ रही बर्फ की चादर मानो आसमान से मिलती हुई प्रतीत होती थी। दिव्या सारे रास्ते इन्हीं नजरों में खोई रही। लड़कियों ने अपने लिए कॉटेज बुक करवाया हुआ था। शाम को सभी माल रोड पर घूमने के लिए निकली। हल्की हल्की बारिश शुरू हो गई थी । सभी खाना खाने के लिए एक रेस्टोरेंट में चली गई । बहुत ही अच्छा मौसम था। 


अगले दिन दिव्या सुबह अकेले ही घूमने चली गई। कॉटेज के साथ ही एक बड़ा अच्छा गार्डन था। वहां एक बेंच पर बैठ गई। वह अपने ही ख्यालों में खोई हुई थी। तभी उसके पास एक बॉल आकर गिरा। साथ ही दो छोटे-छोटे प्यारे प्यारे बच्चे दौड़ते हुए आ गए। आंटी आंटी हमारी बाल दे दीजिए। तभी उनके पीछे पीछे अधेड़ उम्र की महिला दौड़ती हुई आई। प्यार से बच्चों को बोलने लगी अरे बच्चों इन्हें क्यों तंग कर रहे हो? दिव्या ने कहा नहीं आंटी ऐसी कोई बात नहीं इन्होंने तो मुझे कुछ भी नहीं कहा। प्रभा जी बोली अरे बेटा तुम इनको नहीं जानती बड़े शरारती बच्चे हैं सारा दिन शरारत करते रहते हैं। दिव्या बच्चों से बोली अच्छा तो तुम लोग आंटी को बहुत तंग करते हो क्या? बच्चे बोले नहीं दादी मां तो ऐसे ही कह रही है हम तो उनकी हर बात मानते हैं। दिव्या बोली चलो मैं तुम लोगों को आइसक्रीम खिलाती हूं। 


प्रभा जी ने कहा वह तो इसके पापा इसके लिए ला रहे हैं। तभी दिव्या ने देखा एक सुंदर सा नौजवान यही कोई ३१_३२ बरस का दो सॉफ्टी लेकर आ रहा था। बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व था। बच्चे दौड़ते हुए उसे पापा पापा कहते हो गए लिपट गए। उसने उनको गोद में उठा लिया और आइसक्रीम खिलाने लगा। वह अपने बच्चों से लाड प्यार करने में व्यस्त था। 2 मिनट के लिए तो दिव्या उसे देखती ही रह गई। प्रभा जी ने बताया यह मेरा बेटा समीर है। दिव्या ने शर्माते हुए उसे अभिवादन किया। लेकिन समीर तो अपने बच्चों से ही बातें कर रहा था। दिव्या की चेहरे की लाली प्रभा जी से से छिपी नहीं। दिव्या भी उनको देखकर कुछ अचकचा गई और अपने आप पर नियंत्रण कर लिया। लेकिन दिव्या सोच रही थी की इन बच्चों की मां किधर है। 


तभी पीछे से पूजा ने आवाज दी थी कि चलो दिव्या ब्रेकफास्ट लग गया है। आओ नाश्ता कर लेते हैं। यह सुनते ही दिव्या ने प्रभा जी से विदा ली और एक नजर बच्चों पर डाली जो कि अपने पिता के साथ मस्त थे। 


दिन गुजरता गया पता नहीं क्यों दिव्या का मन बार-बार उधर ही जा रहा था। एक अजीब सी इच्छा हो रही थी उन सब के बारे में जानने के लिए।


अगले दिन सभी ने खजियार जाने का प्रोग्राम बनाया। बड़े ही प्यारी और खूबसूरत जगह थी। काफी लोग आए हुए थे। इत्तेफाक से वह फैमिली भी जिसे वह ढूंढ रही थी उधर ही आए हुए थे। आए तो दिव्या ने सोचा कैसे भी करके वो उनके बारे में पूरा पता करेगी।


अचानक वहां पर किसी औरत को मिर्गी का दौरा पड़ गया। वह लोग वहां पर डॉक्टर के लिए चिल्लाने लगे तभी समीर भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ गया और औरत को देखने लगा उसके हाथ पाव मलनेलगा। थोड़ी ही देर में औरतको होश आ गया तो उसने उससे पानी पिलाया और उसके घर वालों को कुछ जरूरी निर्देश देने लगा। उसके घर वालों ने उसका धन्यवाद किया समीर ने कहा मैं डॉक्टर हूं यह मेरा फर्ज था धन्यवाद की कोई बात नहीं। 


अब दिव्या को पता लगा समीर तो डॉक्टर है। बच्चों की नजर दिव्या पर पड़ी तो दीदी दीदी चिल्लाने लगे दिव्या बहुत खुश हुई। बच्चे उसे वैसे ही बड़े प्यारे लगते थे। प्रभा जी उसके पास आ गई। कहने लगी लगता है एक ही मुलाकात में बच्चे तुमसे हील मिल गए हैं। दिव्या से रहा न गया उसने पूछ लिया इनकी मम्मीकिधर है? प्रभा जी ने भराई आवाज में उत्तर दिया 2 साल पहले एक एक्सीडेंट में उनका देहांत हो गया। सुनकर दिव्या को बहुत धक्का लगा। प्रभा जी बोली यह बच्चे हर किसी में प्यार ही तलाशते हैं। समीर की जिंदगी तो अंजलि के साथ ही खत्म हो गई थी। आज सिर्फ इन बच्चों के कारण ही जिंदा है। उसने तो अपने आप को मरीजों में ही बिजी कर लिया है। बड़ी मुश्किल से 2 दिन निकाल कर हम सबको यहां लेकर आया है। दिव्या को तो अब उन बच्चों पर और भी तरस आ रहा था। 


समीर ने प्रभा को आवाज दी चलो मां बच्चों को कुछ खिला देते हैं। प्रभा जी ने कहा चलो दिव्या तुम भी हमारे साथ ही चलो ना इकट्ठे है कुछ खाते हैं साथ में बच्चों का भी मन लग जाएगा। समीर हैरान होकर अपनी मां की तरफ देख रहा था दिव्या भी कुछ झिझक रही थी। लेकिन बच्चे अपने दीदी को साथ ही लेकर जाने को माने। खाने की टेबल पर प्रभा जी दिव्या के बारे में पूछने लगी तो दिव्या ने अपने बारे में सब बताया। समीर भी बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था। पता नहीं क्यों दिव्या समीर की तरफ आकर्षित हो गई थी। उसे अपने जीवन साथी के रूप में देखने लगी थी उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है। जबकि समीर की तरफ से कोई भी रिस्पांस नहीं था। लेकिन प्रभा जी से यह सब कुछ छिपा नहीं था। उन्हें दिव्या बहुत ही प्यारी लगी थी। वह तो चाहती ही थी कि कोई लड़की समीर के जीवन में आ जाए। 


दिव्या में उन्हें वह सब कुछ दिखाई दे रहा था जो उनके परिवार के लिए समीर के लिए और बच्चों के लिए आवश्यक था। प्रभा जी बहुत ही अनुभवी महिला थी। चाहे उन्हें उम्र का अंतर दिखाई दे रहा था लेकिन दिव्या की सादगी और संस्कार उन्हें प्रभावित कर रहे थे। किसी भी कीमत में वह दिव्या को अपने घर की बहु बनाना चाहती थी। लेकिन इसके लिए अभी समीर को तैयार करना था क्योंकि अंजलि के जाने के बाद उसने अपने दिल के दरवाजे बंद कर दिए थे। दिव्या से भी तो पूछना था आखिर उसे भी तो दो बच्चों की मां बनना मंजूर था? लेकिन ना जाने क्यों प्रभा जी के मन में एक आस जग गई थी। उन्होंने बातों ही बातों में दिव्या से उसका फोन नंबर ले लिया और अपना दे दिया। और कहा जब भी तुम्हारे शहर आना होगा तो तुमसे मिलने जरूर आऊंगी। दिव्या की आंखें भी बहुत कुछ कह रही थी । तभी दिव्या की सहेलियों ने उसे आवाज दी और कहा कि हम सब वापस जा रहे हैं। दिव्या ने जाने से पहले प्रभा जी को नमस्ते की और बच्चों को प्यार किया और चली गई। 


अगले दिन सुबह वापसी थी। रात भर दिव्या उन्हीं के बारे में सोचती रही। घर आकर भी दिव्या के दिलो-दिमाग में से समीर निकल नहीं रहा था। क्या उसके माता पिता समीर सेउसकीशादी करने के लिए मान जाएंगे? क्या दिव्या को दो बच्चों की मां बनना स्वीकार होगा?


फोन की आवाज सुनकर दिव्या हड़बड़ा कर उठ गई। उधर से आवाज आई हेलो दिव्या मैं प्रभा बोल रही हूं। दिव्या बोली कैसे हैं आंटी आप। प्रभा जी बोली एकदम ठीक। बच्चे तुम्हें बहुत याद करते हैं। दिव्या बोली आंटी मैं भी उन्हें बहुत याद करती हूं। प्रभाजी बोली कल समीर दिल्ली आ रहा है। कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस है। मैं तो नहीं आ सकूंगी। लेकिन समीर तुमसे जरूर मिलने आएगा। दिव्या ने कहा आंटी आप भी आ जाओ और बच्चे भी जरूर लेकर आइए। मैं आपसे मिलना चाहती हूं। प्रभा जी ने कहा क्या करूं बच्चों के स्कूल है उनकी छुट्टी नहीं करवा सकते। इसलिए सिर्फ समीर ही आएगा। मैंने उसको बोल दिया है वहतुमसे जरूर मिलने आएगा। दिव्या को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। समीर से वह क्या बातें करेगी। वह तो उसकी तरफ देखता तक नहीं। लेकिन आंटी से यह सब ना कह सकी।


इधर प्रभा जी ने अपने बेटे समीर से सारी बात कर ली थी। पहले तो समीर तैयार ही नहीं हुआ क्योंकि उसने दिव्या को उस नजर से नहीं देखा था। वैसे भी उसके दिलो-दिमाग पर अंजलि का ही कब्जा था। लेकिन प्रभा जी ने जब उसे बच्चों का वास्ता दिया और बताया कि दिव्या एक संस्कारी लड़की है और बच्चों से बहुत हिल मिल गई है। वह समीर से भी प्रभावित है

बड़ी मुश्किल से उन्हें इस लड़की में एक आस दिखाई दी है। बच्चों को शायद इस लड़की में अपनी मां मिल जाए। समीर को समझ नहीं आ रहा था कि अपनी मां को कैसे समझाएं बच्चों को तो मां मिल जाएगी पर उस के लिए अंजलि को भूलाना बहुत मुश्किल था। ऐसे में वह दिव्या के साथ अन्याय नहीं करना चाहता था। लेकिन प्रभा जी की ज़िद के आगे उसे हार माननी ही पड़ी। समीर ने कहा वह अपनी तरफ से दिव्या को मिलेगा अगर उसे ठीक लगा तो ही शादी के लिए हां करेगा। प्रभा जी मान गई।


अगले दिन समीर दिल्ली पहुंच गया। सारा दिन कॉन्फ्रेंस में ही निकल गया। शाम को उसने दिव्या को फोन किया। उसने दिव्या को कहा मां तुम्हें बहुत याद करती है बच्चे भी तुम्हें बहुत याद करते हैं। क्या हम मिल सकते हैं? दिव्या ने कहा हां हां क्यों नहीं। तो ठीक है आज रात का खाना तुम मेरे साथ खाओ समीर ने कहा। दिव्या ने कहा ठीक है कहां पर पहुंचना है? समीर ने उसे अपने होटल का एड्रेस दे दिया ठीक 8:00 बजे दिव्या उसके होटल पहुंच गई।


दिव्या नीले रंग की जींस और सफेद रंग की टॉप में बहुत ही सुंदर लग रही थी। एक मॉडर्न लड़की लेकिन सादगी से भरपूर। समीर ने तो आज ही उसे ध्यान से देखा। समीर तो वैसे ही बहुत हैंडसम था। समीर उसका इंतजार कर रहा था। दोनों एक कॉर्नर वाली टेबल पर बैठ गए। दिव्या को अब कुछ घबराहट सी होने लग पड़ी थी। लेकिन वह भी समीर को परखना चाहती थी। नए जमाने की लड़की थी। ऐसे ही एक तरफा प्यार में समीर के गले नहीं पढ़ना चाहती थी।


दिव्या कनखियों से समीर को देख रही थी। थोड़ा घबरा भी रही थी। जबकि समीर एकदम नॉर्मल था। समीर ने खाना ऑर्डर दे दिया। पूछने लगा क्या करती हो दिव्याआजकल। दिव्या ने बताया इंजीनियरिंग किया है बीटेक में आगे क्या करना चाहती हो।


दिव्या ने कहा मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। किसी अच्छे कॉलेज में अगर एडमिशन हो जाए तो एमबीए करूंगी। फिर उसके आगे देखूंगी। मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं। जीवन में कुछ करना चाहती हूं।


समीर ने कहा फिर तो मेरी मां को जो तुम में कुछ नजर आया वह तो उनकी आंखों का ही भ्रम है। मैं तुमसे कुछ भी छुपाना नहीं चाहता। मेरी मां चाहती है कि मैं तुमसे शादी कर लूं।


समीर यह सब कुछ इतने स्वाभाविक तरीके से कह रहा था कि दिव्या एकदम हैरान हो गई और समीर का मुंह देखने लगी। समीर को भी लगा कि यह बात उसने कुछ जल्दबाजी में ही कह दी।


अगले ही पल दिव्या को लगा जैसे सब कुछ घूम रहा है। वह तो जैसे गिरते-गिरते बची। बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप को संभाला। लेकिन उसके चेहरे के भाव समीर से छिपे नहीं थे।


समीर उसकी आंखों में देखता हुआ बोला क्या हुआ? दिव्या ने कहा वह 2 दिन से कुछ बुखार सा था इसलिए शायद कमजोरी के कारण चक्कर आ गया हो।


वेटर सूप ले आया था। दिव्या की चुप्पी समीर को अखर रही थी। लेकिन तभी दिव्या संयत होकर बोली शायद आंटी कुछ गलत समझ बैठे। मैंने तो ऐसा कुछ भी नहीं सोचा था। मुझे तो बच्चों वैसे ही बहुत अच्छे लगते हैं। आंटी जी मुझे बहुत अच्छे स्वभाव के लगे लेकिन ऐसा कोई मतलब नहीं था। मेरे मन में आपके लिए कुछ भी नहीं है।


समीर को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। वह बहुत खुश था। दोनों इधर उधर की बातें करने लगे। दिव्या के दिलों दिमाग में तो तूफान चल रहा था लेकिन किसी तरह उसने अपने आप को शांत रखा हुआ था। खाना खत्म हुआ और दोनों ने एक दूसरे से विदा ली।


घर आकर दिव्या ने अपने आप को कमरे में बंद कर लिया और रोने लग पड़ी। आंसुओं के सैलाब में जैसे उसका सारा दुख बह गया। अब उसे समझ आया कि भगवान ने कैसे उसे इस क्षणिक आकर्षण से बचा लिया। वह तो पढ़ लिखकर कुछ बनना चाहती थी लेकिन वह तो कुछ और ही सोच बैठी।


उसने लाख-लाख ईश्वर का धन्यवाद किया और कपड़े बदलने चली गई कमरे में हल्के से संगीत ने उसका सारा गम खत्म कर दिया था अब इंतजार थी उसे अच्छे से कॉलेज से कॉल का क्योंकि अभी जिंदगी में उसने बहुत कुछ करना था।


कई बार भावनाओं मेंआकर हम जिंदगी के ऐसे फैसले ले लेते हैं जो कि आगे चलकर हमारी तरक्की को रोकते हैं। आज दिव्या उन सब बातों से बच गई थी और एक नया सवेरा उसका इंतजार कर रहा था।


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