Sheela Sharma

Inspirational


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Sheela Sharma

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दृष्टिकोण

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टूंडला का रहने वाला रहीम अपनी पहचान के लिए हर महीने सरकारी दफ्तरों की दहलीज नापता था। शायद कोई दस्तावेज आया हो और वह यह पता कर सकें आखिर उसकी पहचान क्या है? दूधपीती उम्र में ही जब बच्चे पालने में रंग बिरंगे खिलौने को समझने की कोशिश में होते हैं, तब वह मेनहोल के किनारे पड़ा आकाश के तारे गिन रहा था।


लोग कहते हैं उस समय भी वह लेटा हुआ मंद मंद मुस्कुरा रहा था। मोहल्ले के एक मुस्लिम परिवार ने उसे वहां से उठाया और नई पहचान दी। युवा होने की कगार पर आते आते कायमगंज से स्टेशन तक उसका रिक्शा हवा से बातें करता था। अब्बा ने उसकी परवरिश ही ऐसी की थी कि चौदह वर्ष की उम्र से ही उसने रिक्शा चलाना शुरू कर दिया था वह भी अपने बीमार अब्बा का हाथ बँटाना चाहता था।


अपने ग्राहकों से बहुत बातें करना, विशेष रूप से उनके रीति रिवाजों को जानने की कोशिश करना, उसे अच्छा लगता। एक दिन स्टेशन पर लगे गीता प्रेस के काउंटर से उसे गीता मिली हिंदू धर्म के बारे में जानने को उत्सुक वह ग्रन्थ ले आया। गीता पढ़ते-पढ़ते उसे अलमारी में रखी कुरान याद आ गई। उसने श्लोक और आएतों को मिलाकर देखा तो ऐसा लगा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसी तरह बाइबल और गुरु ग्रंथ साहिब भी पढी़ तो भी कुछ विशेष फर्क नजर नहीं आया, सिवाय उस में दर्ज नामों को छोड़कर। इस प्रकार उसने माना सारे धर्म एक ही हैं। अंततः एक ही बात करते हैं।


वह नहीं जानता था कि वह कौन है हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई। उसने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च जैसे हर धर्म स्थल पर जाना शुरू कर दिया कभी मौलवी के पास बैठता तो कभी पादरी के पास। हर जगह उसे एक ही बात सीखने को मिलती कि ईश्वर की सत्ता सत्य है बाकी सब झूठ। उसे लगने लगा यह धर्म, ऊंच-नीच सब शायद इंसानों के अपने फायदे के लिए बनाए गये नियम हैं।


इसी बीच एक रात उसे सड़क के किनारे बेहोश अवस्था में एक लड़की मिली। उसकी हालत देखकर और उसकी दास्तान सुनकर उसे समझ में आया कि इन्सान की रचाई, बसाई इस दुनिया में न्याय कहीं नहीं है, किसी के साथ भी नहीं। न्यायालय से न्याय तो मर चुका है तभी तो जिस्मों को जानवर नोच नोंच कर खा रहे हैं।


शक्ति स्वरूपा, देवों में अग्रणी दिव्यरूपा, नेह की आंच लिए सृजनकर्ता साहित्य के पन्नों में कहीं खो गई है। कानून की जांच तब तक जारी रहती है, जब तक बेबस, लाचार, शोषित ऊपर से बदनाम जिंदगी, अपनी अंतिम सांसे ले लेती है और देश के कर्णधार अपनी अपनी फसल पकाने के चक्कर में कीमत दे देते हैं। उस औरत के, जिस्म की, सम्मान की उसके जीवन की।


ऐसे भ्रष्टाचारी फरेबी समाज में उसकी अपनी पहचान की जरूरत ही क्या है? पहचान तो अपने कर्मों से है, हमें अपने आप से करनी है। ईश्वर की बनाई हुई दुनिया को नकार कर इन्सान ने जब से मनमानी कर अपनी दुनिया बसाई, वो बद से बदतर होती जा रही है तो वह क्या करेगा अपनी पहचान बना कर इस स्वार्थी मतलब परस्त दुनिया में।


उसे तो बस एक अच्छा इन्सान बनना है और इन्सानियत सीखनी है। और इसी का पाठ लोगों को पढ़ाना है। इस ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में उसके लिए कोई धर्म बाधक नही है। इस सत्य को जानने के बाद उसने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने बंद कर दिए।


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