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मिली साहा

Abstract Inspirational

4.5  

मिली साहा

Abstract Inspirational

सपने भी सच होते हैं

सपने भी सच होते हैं

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सपने देखने का अधिकार सभी को होता है चाहे वो गरीब हो, अमीर हो या किसी भी उम्र का हो। सपने देखने में कोई बंदिश नहीं है। पर हाँ, सपनों को पूरा करने के लिए उन्हें पंख देना, स्वयं पर विश्वास रखना, और पूरी निष्ठा और जुनून से अपना कर्म करना भी ज़रूरी है। हमने कई लोगों को यह कहते भी सुना होगा कि सपनों का हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं होता। किंतु जो ठान देता है वो सपनों को हकीक़त में बदलने का जज़्बा भी रखता है। और ऐसा ही कुछ करती है मेरी इस कहानी की पात्र "गीता"। जिसने खुली आँखों से सपने देखे और उसे पूरा भी किया। तो आइए इस कहानी में मिलते हैं गीता और उसके सपनों से।

छोटे से शहर की तंग गलियों में, एक छोटे से मकान में अपने माता पिता के साथ रहती थी "गीता"। उम्र मात्र बारह वर्ष और आँखों में बड़े-बड़े सपने। दिन- रात, सोते-जागते, खाते-पीते उसका बस एक ही सपना था वो था पढ़ लिख कर एक डॉक्टर बनना। तब शायद "गीता" को डॉक्टर शब्द ठीक प्रकार से लिखना भी नहीं आता था। किंतु वो इतना ज़रूर जानती थी कि इसके लिए उसे बहुत कठिन परिश्रम और पढ़ाई करनी पड़ेगी। 

किंतु आर्थिक स्थिति अच्छी ना होने के कारण "गीता" के माता पिता अपनी बिटिया के सपने को पूरा करने में असमर्थ थे। वो इतने लाचार थे कि चाह कर भी कुछ कर नहीं पाते थे। 

एक रात जब "गीता" सो रही थी। तब गीता के पिता ने उसकी माँ से कहा......

डॉक्टरी की पढ़ाई में तो बहुत अधिक पैसे लगते हैं गीता की माँ...... हम इतने पैसे कहाँ से लाएंगे कैसे अपनी बिटिया का सपना पूरा करेंगे?

कह तो आप ठीक रहे हैं........गीता के बाबा। पर बिटिया का मुख तो ज़रा देखो, अभी भी सपने में खोई है। उसकी आँखों का तो बस एक ही सपना है। कोई न कोई जुगाड़ तो करना ही पड़ेगा। गीता की माँ ने चिंता जताते हुए कहा।

आखिर कौन पिता चाहेगा........कि उसकी बिटिया का सपना टूटे। पर अपनी इस मजबूरी के आगे हमें कुछ सूझ ही नहीं रहा है।.......गीता के पिता ने गीता की माँ से कहा।

फिर गीता के पिता आँखें मूंदकर बड़बड़ाने लगे। हे ! ईश्वर काहे हमारी बिटिया की ऐसी किस्मत बनाई। उसकी आँखों में इतने बड़े-बड़े सपने, हम कहाँ से पूरा करेंगे। अब आप ही कोई रास्ता दिखाओ भगवन।

प्रतिदिन इसी चिंता में गीता के माता-पिता को ठीक से नींद भी नहीं आती थी। वो अपनी जैसी ज़िंदगी अपनी बिटिया को नहीं देना चाहते थे।

किंतु "गीता" के पिता की आमदनी बस इतनी ही थी जिससे किसी प्रकार उनका गुज़ारा चल जाता था। "मिली" पास के ही एक छोटे से स्कूल ( जो पूरी तरह निःशुल्क था ) में पढ़ने जाया करती थी। किंतु वहाँ सुविधाओं के अभाव में ठीक प्रकार से पढ़ाई नहीं हो पाती थी। पहनने को कोई स्कूल ड्रेस नहीं, पैरों में जूते नहीं, कॉपी किताब पेन पेंसिल इन सभी अभावों से "गीता" को प्रतिदिन गुजरना पड़ता था। और पौष्टिक खाना तो दूर किसी किसी दिन तो ठीक से दो वक़्त का भोजन भी नहीं मिल पाता था। 

परन्तु "गीता" को जितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था उतना ही उसके अंदर पढ़ने की लालसा भी तीव्र होती जाती थी। आर्थिक तंगी के कारण उसके पिता किसी अच्छे स्कूल में उसका दाखिला कराने में असमर्थ थे। पढ़ा लिखा ना होने का दर्द उसके पिता बखूबी समझते थे। बेटी की ज़िंदगी भी इस दर्द से ना गुज़रे इसलिए वो दिन-रात जी तोड़ मेहनत करते थे। बेटी के सपने पूरे करने के लिए वो पहले से भी ज़्यादा मेहनत करने लगे। 

"गीता" को अख़बार पढ़ने का भी बहुत शौक था। उसके पिता उसके लिए अखबार खरीद तो नहीं सकते थे किंतु अपनी बिटिया की उत्सुकता देखकर पुराना अखबार कहीं ना कहीं से जुगाड़ कर ही देते थे। जब जी गीता के हाथों में अखबार आता था वो खुशी के मारे चहक जाती थी। मानो एक बहुत बड़ा खज़ाना मिल गया हो। 

परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन से कठिन हो जाए "गीता" कभी हार नहीं मानती थी। उसके पास अगर कॉपी पेंसिल नहीं रहती थी तो वो ज़मीन पर उंगलियों की मदद से ही शब्दों को उकेरना शुरू कर देती थी। और ज़मीन पर ही लिखने का अभ्यास घंटों तक करती रहती थी। उसके पिता किसी प्रकार कहीं से पुरानी किताबों का जुगाड़ करके लाते थे। "गीता" उसमें भी खुश रहती थी उसे नए पुराने से कोई मतलब नहीं उसे तो बस किताबें चाहिए। 

एक दिन इसी प्रकार "गीता" ज़मीन पर लिखने का अभ्यास कर रही थी। कि तभी वहाँ पास ही के एक बड़े स्कूल की अध्यापिका ने उसे इस प्रकार उंगलियों से शब्दों को उकेरते हुए देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। 

उसके इस लगन को देखकर अध्यापिका ने उससे पूछा....

बेटा, तुम ज़मीन पर क्यों लिख रही हो ?

क्या तुम्हारे पास कॉपी, किताब, पेंसिल नहीं है। और बड़े ही सुंदर ढंग से तुमने शब्दों को लिखा है कितनी अच्छी लिखावट है तुम्हारी। कौन से स्कूल में पढ़ती हो।

"गीता" ने लिखते-लिखते ही गर्दन ऊपर करते हुए कहा..... वो पास में जो फ्री का स्कूल है ना, मैडम जी मैं उसी में पढ़ती हूँ। 

मेरे बाबा के पास इतने पैसे नहीं हैं कि मुझे कॉपी किताब कलम लाकर दे। पर ज़मीन पर लिखने में क्या बुराई है। मुझे तो इस पर अभ्यास करने में बहुत मज़ा आता है।

अध्यापिका ने मुस्कुराते हुए कहा..... अरे! नहीं बेटा, इसमें कोई बुराई नहीं है किंतु इससे तुम्हारी कोमल उंगलियाँ खराब हो जाएंगी। और इसमें तो समय भी बहुत बर्बाद होता है।

गीता ने एक लंबी साँस भरते हुए अध्यापिका से कहा.......पर मुझे पढ़ने का बहुत शौक है। और जमीन पर भी तो अभ्यास हो ही जाता है। 

फिर अध्यापिका ने कहा...... अच्छा ठीक है यह तो बताओ तुम बड़ी होकर क्या बनना चाहती हो?

गीता ने अध्यापिका से कहा...... मैडम जी, मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती हूँ। मेरा सपना है ये और मैं इसे ज़रूर पूरा करूँगी। 

अध्यापिका ने गीता के सर पर हाथ रखते हुए कहा..... अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। अगर ऐसे ही मेहनत करती रही तो तुम्हारा यह सपना एक दिन ज़रूर पूरा होगा।

"गीता" की पढ़ाई के प्रति इस जुनून को देखकर उस अध्यापिका ने मन में ठान लिया कि इस बच्ची की मदद तो ज़रूर करनी चाहिए।

फिर अध्यापिका ने "गीता" से कहा...... बेटा तुम यहीं रुकना, कहीं जाना मत मैं अभी थोड़ी देर में आती हूँ।

"गीता" ने हांँ में सर हिलाया और फिर से ज़मीन पर लिखने में मग्न हो गई। 

कुछ देर पश्चात वह अध्यापिका नई किताबें, कॉपी, कलम बस्ता, कपड़े और खाने-पीने का कुछ सामान लेकर उस बच्ची के पास पहुँची। 

गीता को यह सब सामान देते हुए अध्यापिका ने कहा...... यह लो यह सब तुम्हारे लिए है। तुम्हारी इतनी सुंदर लिखावट के लिए तुम्हारा इनाम है यह।

किंतु "गीता" ने मना करते हुए कहा........ नहीं मैडम जी, मैं किसी अनजान से कुछ नहीं ले सकती मांँ ने मना किया है। आप यह सब वापस ले जाओ। 

अध्यापिका के बहुत आग्रह करने पर भी "गीता" ने उन सभी वस्तुओं को हाथ तक नहीं लगाया। 

फिर अध्यापिका ने कहा.... अच्छा अच्छा ठीक है तुम यह सब नहीं ले सकती तो कोई बात नहीं मत लो किंतु मुझे अपनी मांँ से तो मिलवा सकती हो। 

"गीता" ने कुछ सोचते हुए कहा..... ठीक है। आप चलो मेरे साथ मैं आपको अपनी मां के पास लेकर चलती हूँ।

फिर "गीता" ने उस अध्यापिका को अपनी माँ से मिलवाया। 

अध्यापिका ने "मिली" की माँ को नमस्कार करते हुए कहा..... मैं पास के बड़े स्कूल में अध्यापिका हूँ। आपकी बेटी के सिलसिले में आपसे कुछ बातें करना चाहती हूँ इसलिए आपसे मिलने आई हूँ

गीता की माँ ने थोड़ा घबराकर अध्यापिका का अभिवादन करते हुए कहा......... क्या हुआ मैडम जी, बिटिया से कोई गलती हो गई क्या?

अध्यापिका ने मुस्कुराते हुए कहा..... अरे नहीं नहीं कोई गलती नहीं हुई है आपकी बिटिया से। बल्कि गलती तो हमसे हुई इतने दिनों से हमारी नज़र आपकी बिटिया पर पड़ी कैसे नहीं। 

अध्यापिका ने कहा......देखिए आपकी बेटी बहुत होशियार है। मैंने देखा उसके जुनून को। पढ़ाई के प्रति ऐसी लगन बहुत कम बच्चों में देखने को मिलती है। मैं समझती हूँ, शिक्षा सुविधाओं के अभाव में ऐसे बच्चे अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाते आगे नहीं बढ़ पाते। 

मैं एक संस्था चलाती हूँ, जहाँ इसी प्रकार के बच्चों की मदद की जाती है। हमारा अपना स्कूल भी है। और हम उनकी पढ़ाई का पूरा खर्चा उठाते हैं। जब तक कि वो अपने सपनों को पूरा ना कर ले। यह कुछ कॉपी, किताब कपड़े और खाने की वस्तुएंँ है। कृपया आप इसे स्वीकार करें। इसे कोई दान या भीख ना समझे यह आपकी बेटी का अधिकार है। आपकी बेटी की आँखों में जो सपने हैं हमारी तरफ से उन सपनों को उड़ान देने की बस एक छोटी सी पहल है ये। 

उस अध्यापिका की बातें सुनकर "गीता" और उसकी माँ की आँखों में मानो चमक आ गई। उसी समय उसके पिता भी वहाँ आ गए। अध्यापिका की सारी बातें सुनकर उन्होंने उनका और ईश्वर का धन्यवाद किया। 

"गीता" के पिता में अध्यापिका से कहा.... मैडम जी, आप जैसे लोग अगर सभी को मिल जाए तो गरीबों के बच्चों के सपने भी पूरे होंगे। हमारे पास सपने देखने का अधिकार तो है पर उसे पूरा करने की हैसियत नहीं। आप फरिश्ता बनकर आईं, मेरी बेटी के लिए। इन सब के लिए कैसे आपका धन्यवाद करें हमारे पास तो शब्द ही नहीं। 

अध्यापिका ने कहा.....अरे !धन्यवाद की कोई आवश्यकता नहीं। हम तो बस आपकी बेटी को उसका अधिकार दे रहे हैं। उसे पढ़ने का अधिकार है और हम बस रास्ता दे रहे हैं। आज से आप "गीता" की पढ़ाई की चिंता छोड़ दीजिए। उसके सपनों को पूरा करने का जिम्मा अब हमारी संस्था का है।

आप बस कल हमारी संस्था में आकर छोटा सा फ़ार्म भरकर अपनी बेटी का दाखिला हमारे स्कूल में करवा दीजिए। और बाकी सारी चिंता हम पर छोड़ दीजिए। 

बस फिर क्या था "गीता" के सपनों को पंख मिल गया। वो खूब मन लगाकर पढ़ने लगी। दिन, महीने, साल बीतते गए। "गीता" एक के बाद एक सभी परीक्षाएँ अच्छे नंबरों से पास करती गई। दसवीं कक्षा से ही "गीता" मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम NEET की तैयारी भी शुरू कर चुकी थी और फिर वो समय भी आ गया जब उसने मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम दिया। जिसमें अच्छे नंबरों से गीता पास कर गई। 

जिसके तहत एक अच्छे मेडिकल कॉलेज में गीता का दाखिला हुआ। जहाँ लगभग साढ़े चार वर्ष का मेडिकल कोर्स कंप्लीट करने के बाद "गीता" को उसी शहर के एक हॉस्पिटल में इंटर्नशिप मिला। गीता की आँखों का सपना हकीक़त में बदल गया। 

और आज गीता वही के एक बड़े हॉस्पिटल में बतौर डॉक्टर कार्यरत है। इसके अतिरिक्त गीता गरीबों का मुफ्त इलाज़ कर आपकी पूरी मदद भी करती है। गीता नि:शुल्क स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को प्रतिवर्ष पठन सामग्रियाँ भी उपलब्ध कराती है। जिससे उसके जैसे बाकी बच्चों की आंखों के सपने पूरे हों।

गीता की आँखों के सपने को पूरा करने में, उसके माता-पिता, वो अध्यापिका, और वो संस्था जिसने गीता की पढ़ाई में पूर्ण मदद की, और सबसे बड़ी बात उसकी मेहनत, लगन और निष्ठा इन सब का बहुत बड़ा योगदान रहा है। 

दिल में जुनून हो कुछ करने का, और सच्ची श्रद्धा से कर्म करो तो सपने भी पूरे होते हैं। और ये देख कर दिखाया "गीता" ने। 

कठिन रास्तों पर चलने की अगर हम ठान लेते हैं,

तो रास्ते दिखाने वाले भी हमें हज़ार मिल जाते हैं।

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि दिल में अगर सपनों को पूरा करने की निष्ठा हो तो सपने हकीक़त में तबदील ज़रूर होते हैं। "सपने भी सच होते हैं।"



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