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मिली साहा

Inspirational

4.8  

मिली साहा

Inspirational

द्रौपदी मुर्मू

द्रौपदी मुर्मू

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भारत में आदिवासियों को जनजातीय लोगों के नाम से जाना जाता है। यहाँ के प्रमुख आदिवासी समुदाय में भील, मुंडा, संथाल, मीणा, खड़िया, भूमिज, लोहरा, असुर, गोंड, पारदी, कोली आदि हैं। जो मुख्यत अल्पसंख्यक रूप से बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ में हैं और बहुसंख्यक रूप में भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों जैसे मिजोरम में हैं।

हमारा देश भारत समृद्ध विकासशील देश की श्रेणी में शामिल है किंतु आज भी यहाँ आदिवासी समुदाय (अनुसूचित जनजाति) समाज की मुख्यधारा से कटे हुए नज़र आते हैं।

अनुसूचित जनजातियों में कई जटिल समस्याएँ हैं जो इनके अस्तित्व ही नहीं बल्कि पहचान के लिए भी खतरनाक साबित होती हैं। जैसे बेरोजगारी, कुपोषण, अशिक्षा, अपर्याप्त बैंकिंग सुविधाएं, अल्प रोजगार, शोषण, गरीबी और बंधन आदि। जिनके कारण आदिवासी समुदाय को काफी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। वर्षों से शोषित रहे इस समाज के लिए परिस्थितियाँ आज भी कष्टप्रद हैं। किंतु आदिवासी समुदायों में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने इन चुनौतियों को स्वीकार कर उनका सामना कर अपने हिम्मत और हौसले से अपने समुदाय और देश का नाम ऊंँचा किया है और कर भी रहे हैं।

ऐसी ही एक महान शख्सियत हैं "द्रौपदी मुर्मू"। जिन्होंने आज ये साबित कर दिखाया है कि समस्याएंँ कितनी कितनी भी जटिल से जटिल हों, मुश्किलें कितनी भी आ जाएं राहों में, गर खुद पर विश्वास है तो मंजिल तक पहुंँचने के रास्ते हमारी हिम्मत, कर्म पर निष्ठा और हौसले से खुद ब खुद बन जाते हैं।

"द्रौपदी मुर्मू" आदिवासी समुदाय की एक पढ़ी-लिखी महिला हैं। समाज और अपने समुदाय के प्रति अपनी जिम्मेदारियों में "द्रौपदी मुर्मू" सदैव ही आगे रहती हैं। उन्होंने अपना जीवन समाज सेवा, गरीबों और दलितों को सशक्त बनाने के लिए समर्पित किया है।

22 जुलाई 2022 ..... आदिवासी समुदाय और हम सब भारतवासियों के लिए ऐतिहासिक दिन रहा। क्योंकि इस दिन अनुसूचित जनजाति से जुड़ी देश की पहली आदिवासी महिला "द्रोपदी मुर्मू" भारत की 15वीं राष्ट्रपति बनीं।

"द्रौपदी मुर्मू" देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति हैं। इससे पहले 2015 से 2021 तक वों झारखंड की पहली राज्यपाल रहीं। "द्रौपदी मुर्मू" ने अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद भी बहुत सारी उपलब्धियाँ हासिल की हैं। परिस्थितियों ने उन्हें कितनी बार गिराने की कोशिश की पर उन्होंने खुद को पूरी हिम्मत और हौसले से संभाला ही नहीं बल्कि राजनीतिक क्षेत्र में एक महिला के रूप में इन्होंने काफी उम्दा और सराहनीय कार्य किए हैं। "द्रौपदी मुर्मू" आदिवासी समुदाय के लिए गर्व की बात है।

"द्रौपदी मुर्मू" का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले में बैदिपोसी नाम के छोटे से गाँव में, एक साधारण आदिवासी, संथाली हिंदू परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम बिरंचि नारायण टूडू था जो अपनी परंपराओं के मुताबिक गाँव और समाज के मुखिया थे। "द्रौपदी मुर्मू" के दादा दादी भी कई वर्षों तक उस गाँव के प्रधान रहे थे।

बैदीपोसी गाँव के ही एक विद्यालय से "द्रौपदी मुर्मू" की प्रारंभिक शिक्षा प्रारंभ हुई। तत्पश्चात ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए भुवनेश्वर शहर चली गईं जहाँ रामा देवी महिला कॉलेज में दाखिला प्राप्त कर इन्होंने ग्रेजुएशन की शिक्षा प्राप्त की। ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर जब "द्रौपदी मुर्मू" उड़ीसा वापस लौटीं तो ओडिशा गवर्नमेंट में बिजली डिपार्टमेंट में इन्हें एक जूनियर असिस्टेंट के तौर पर नौकरी प्राप्त हुई। जहाँ इन्होंने 1979 से लेकर 1983 तक कार्य किया। उसके बाद 1994 से 1997 तक रायरंगपुर में मौजूद अरविंदो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में एक शिक्षिका के तौर पर भी कार्यरत रहीं।

साल 1997 से "द्रौपदी मुर्मू" ने राजनीतिक क्षेत्र में कदम रखा। प्रारंभ में पार्षद के रूप में इन्होंने चुनाव जीते। और फिर उसी वर्ष भाजपा के एसटी मोर्चा की राज्य उपाध्यक्ष बनीं। इन्होंने भाजपा के टिकट पर भी चुनाव लड़ा और दो बार रायरंगपुर की सीट हासिल की। फिर साल 2000 में ओडिशा सरकार में राज्य मंत्री बन कर "द्रौपदी मुर्मू" ने अपनी सेवा दी। तत्पश्चात साल 2000 से 2002 तक वे वाणिज्य और परिवहन में स्वतंत्र प्रभार मंत्री भी रहीं। साल 2013 में मयूरभंज जिले के लिए पार्टी के जिला अध्यक्ष पद पर उन्हें नियुक्त किया गया। "द्रौपदी मुर्मू" ने अपने जीवन काल में बहुत ही श्रेष्ठ कार्य किए हैं। जिनके तहत उन्हें साल 2022 में भारत के एक सम्मानित पद राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के रूप में चुना गया है।

"द्रौपदी मुर्मू" का विवाह श्याम चरण मुर्मू के साथ हुआ। अभी तो ज़िन्दगी का सफ़र शुरू ही हुआ था कि इनके पति इन्हें बीच सफ़र में ही छोड़कर सदा सदा के लिए इस दुनिया से चले गए। कभी-कभी ये ज़िन्दगी भी ऐसे करें इम्तिहान लेती है कि इंसान को अंदर से तोड़ कर रख देती है। "द्रौपदी मुर्मू" के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। किस्मत ने पति को तो पहले ही इनसे छीन लिया था इनके दो बेटों का साथ भी इन्हें नसीब ना हुआ।

साल 2009 "द्रौपदी मुर्मू" के जीवन का काफी दुखदायक समय रहा। इसी वर्ष उनके एक बेटे की असमय मृत्यु हो गई। जिसके कारण "द्रौपदी मुर्मू" को गहरा सदमा लगा और वे अंदर से पूरी तरह बिखर गईं। किंतु उन्होंने हार नहीं मानी खुद को इस सदमे से निकालने के लिए वे ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ गईं। पर ज़िंदगी का कुछ इम्तिहान शायद अभी बाकी था। साल 2013 "द्रौपदी मुर्मू" ने अपने दूसरे बेटे को भी एक सड़क हादसे में खो दिया। इतना ही नहीं अभी बेटे की मौत का ग़म उन्हें अंदर से झकझोर ही रहा था कि बेटे की मौत के कुछ दिन बाद ही उनके भाई और माता का भी स्वर्गवास हो गया।

इन सबके बावजूद खुद को समेट कर "द्रौपदी मुर्मू" अपने जीवन में अभी आगे बढ़ ही रही थी कि साल 2014 में उन्होंने अपने पति को भी खो दिया। परिवार के नाम पर "द्रौपदी मुर्मू" के पास केवल उनकी बेटी इतिश्री मुर्मू है जिसके सहारे ही वे अपना जीवन जीती हैं। इतिश्री की शादी गणेश हेम्ब्रम के साथ हुई है | जीवन में दुःख होने के बावजूद भी "द्रौपदी मुर्मू" ने कभी हार नहीं मानी। इन सभी घटनाओं को किस्मत का लिखा समझ कर उन्होंने खुद को समझाया। अपनी हिम्मत और हौसले से जीवन में आगे बढ़ने लगीं। और 2015 में झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनीं।

"द्रौपदी मुर्मू" ओडिशा की पहली महिला आदिवासी नेता भी रहीं हैं। इन्हें ओडिशा राज्य में राज्यपाल के रूप में भी नियुक्त किया गया था। झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनने का खिताब भी इन्हें ही जाता है। "द्रौपदी मुर्मू" ने भारतीय जनता पार्टी में रहते हुए कई कार्यों में अपनी प्रमुख भूमिका निभाई है। साल 2007 में ओडिशा विधानसभा द्वारा इन्हें साल का सर्वश्रेष्ठ विधायक के तौर पर "नीलकंठ पुरस्कार" से सम्मानित किया गया था।

राष्ट्रपति पद से पहले "द्रौपदी मुर्मू" कई बड़े बड़े पद पर रह चुकी हैं। बावजूद इसके इनके अंदर लेश मात्र भी अहंकार नहीं है। इनके जीवन की एक छोटी सी घटना जिसके आधार पर इस बात की पूर्ण पुष्टि हो जाती है। एक समय की बात है जब "द्रौपदी मुर्मू" शिव मंदिर गईं थीं तो वहाँ पर साफ सफाई ना देख कर उन्होंने स्वयं ही संपूर्ण मंदिर की साफ सफाई की। तत्पश्चात उन्होंने भगवान शिव के दर्शन किए।

"द्रौपदी मुर्मू" एक मृदुभाषी नेता होने के साथ-साथ समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने वाली एक सशक्त महिला हैं। इनमें मानवता और विनम्रता के गुण भी कूट-कूट कर भरे हैं जो कि काबिले तारीफ़ है। इन्होंने कड़ी मेहनत से ओडिशा की राजनीति में अपनी एक मजबूत और जगह विशेष बनाई है। "द्रौपदी मुर्मू" ने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया है। इनके पास ओडिशा सरकार में पशुपालन, मत्स्य पालन, परिवहन और वाणिज्य जैसे मंत्रालयों को संभालने का खास अनुभव है।

कोई सोच भी नहीं सकता था कि खुद को अभिशप्त समझने वाले समाज (आदिवासी समुदाय) की बेटी जो सिर्फ इसलिए पढ़ना लिखना चाहती थी कि परिवार की आर्थिक सहायता कर सके, रोज़ी रोटी कमा सके वो देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद पर नियुक्त होगी।

"द्रौपदी मुर्मू" ने बिना किसी वेतन के एक शिक्षक के तौर पर कार्य तो किया ही साथ ही साथ उनके प्रयास के कारण ही आज उनके समाज की लड़कियों की पढ़ने की संख्या लड़कों से कहीं ज्यादा है। "द्रौपदी मुर्मू" ने सदैव ही प्रयास और मेहनत पर विश्वास रखा है। उनका स्वयं मानना है कि "ज़िन्दगी तो कठिनाइयों के बीच ही है आगे हमें स्वयं ही बढ़ना है क्योंकि कोई हमें पुश करके कभी आगे नहीं बढ़ा पाएगा"।

एक ऐसी महिला जो अपने दो बेटों और पति को खो देने के बाद पूरी तरह डिप्रेशन में चली गई थी। लोग तो यहाँ तक कहते थे कि अब इनके बचने की भी कोई उम्मीद नहीं। वहीं "द्रौपदी मुर्मू" ने अपनी हिम्मत से स्वयं को डिप्रेशन से ही नहीं निकाला बल्कि अपने जीवन को देश के लिए समर्पित कर उन्होंने जीने की उम्मीद ढूंँढ निकाली। "द्रौपदी मुर्मू" संपूर्ण भारत वासियों के लिए एक उदाहरण है कि परिस्थितियों से हार कर बैठ जाने और स्वयं को अंँधेरों में कैद कर देने से कभी कुछ हासिल नहीं होता।


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