संवेदना
संवेदना
विम्मी और रमोला दोनों सखियाँ एक ही अपार्टमेंट में रहती हैं । दोनों अपनी रचनाधर्मिता बड़े जतन से निभाते हुए अकसर साथ-साथ ऑन लाइन काव्य सम्मेलन में प्रतिभागी भी बनती ।
आज रमोला को एक ऑन लाइन काव्य सम्मेलन में अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रण का फोन आया तो उसने माफी मांगते हुए कहा - " फिर कभी इस कार्यभार को निभाऊंगी । आज मुझे एक बीमार दादीमाँ को देखने जाना अनिवार्य है क्योंकि मैं उनसे मिलने का वादा कर उनकी बहू से मिलने का समय निर्धारित कर चुकी हूँ।"
फोन पर उधर से आवाज आई - "क्या वहाँ जाने के समय में बदलाव नहीं कर सकती ? अध्यक्षता करने का सुअवसर था…"
"कृपया आप मेरी मजबूरी समझने की कोशिश करें ।" आग्रहपूर्वक रमोला ने कहा ।
"आज मंच पर बहुत बड़े-बड़े नामी-गिरामी कवि आ रहे हैं वरिष्ठ कवियों के बीच…."
उनकी बात खत्म होने से पूर्व रमोला बोल पड़ी- " जी, मैं आपकी बात अच्छी तरह समझ रही हूँ । कल के समाचारपत्र में इसकी चर्चा भी होगी..."
"जी बिल्कुल सही समझी , एक अच्छा सुअवसर है इसीलिए कह रहा था । आप एकबार पुनः विचार कर लें ..."
" बूढ़ी माँ को मेरा इंतजार है । संवेदनशीलता ही तो साहित्य का आधार है, उसे ही खत्म कर दूँ..."
शायद उधर वाले कुछ और ही चाह रहे थे । वे अनेक तरह से अपनी बात रख रहे थे पर रमोला का जवाब एक ही था ।
विम्मी जिसकी अभी तक यही इच्छा थी कि रमोला फोन वाले की बात मान ले । अब वह भी दोनों की बातें सुन गर्व से पुलक कर सहेली के हाथों को कस कर थाम ली।
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