सिसकी...
सिसकी...
नदी चल पड़ी थी पहाड़ को छोड़कर समन्दर से मिलने, खुशी खुशी और सोचती जाती थी, लेकिन ऐसे नही , वो जायेगी जगह जगह से होकर, जगह जगह अपने होने के निशान छोड़कर, कहीं ऊंची नीची पहाड़ी से गिनकर झरना बनेगी, लोगो को मोहित करेगी, पशु पक्षी जानवर कलरव करेंगें वहां, आनन्द ही आनन्द होगा, उसके बाद मैदान से होकर निकलेगी। बंजर भूमि को कर जायेगी हरा भरा, फसलों को सीचेंगी, किसी के चेहरे की मुस्कान बनेगी, प्यासे की प्यास बुझाती.. इठलाते, इतराती जाकर अपने सागर की बाहर में समां जायेगी।
लेकिन हाय री किस्मत सपने सब सुहाने टूट गये, किसी ने उसके किनारे बैठ प्लास्टिक के बर्तन में खाया और वहीं छोड़ दिया। किसी ने बनाया उसमें जाने क्या क्या.. कितने गंदी नाले छोड़ दिये गये उसी में जगह जगह, उसकी आत्मा पर बोझ हो गया प्रदूषण.. अब पथिक उसका पानी नहीं पीते.. पक्षियों के लिए भी दूषित है वो जल, अपनी बेकदरी पर मुंह छुपाती वो, जाये तो जाये कैसे अपने समन्दर के पास। इतनी कालिख लगी है उसके दामन पर कि वो दिन पर दिन सकती जाती है और सागर से मिलने से पहले ही दम तोड़ देती है।
बस यही है एक अल्हड़ नदी की कहानी, दामन में कालिख.... आँखों में नहीं बचा पानी।।
