श्रीमद्भागवत गीता जीश्लोक 1
श्रीमद्भागवत गीता जीश्लोक 1
श्रीमद्भागवत गीता जी एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए बहुत आवश्यक है। गीता जी का स्थान मात्र धार्मिक पुस्तक के रूप में नहीं वरन् हमारे हृदय, मस्तिष्क व विचारों में होना चाहिए जिससे हम हर क्षण निर्देशित होते रहें एक-एक शब्द गूंजता रहे, हम अपने जीवन को एक दिशा दे सकें।
आज हमारे जीवन में निराशा,दैन्य भाव, हताशा, हमारी अनियमित दिनचर्या के परिणाम हैं। हमारी दिनचर्या कैसी हो, यह गीता जी हमें बताती हैं।
भगवान कृष्ण ने स्वयं महाभारत के भीष्म पर्व में 18 अध्याय 700 श्लोकों में अर्जुन को माध्यम बना उपदेशित की थी प्रत्येक श्लोक हमें हमारे जीवन की विषम से विषम परिस्थिति में मार्गदर्शक है। इसी से गीता देववाणी कही गयी है। श्रीमद्भागवत गीता इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह बाकी अन्य पुस्तकों की भाँति कपोलकल्पित कहानी नहीं, इसे युद्ध के मैदान में कहा गया है जहाँ हजारों लाखों की संख्या में सैनिक, भीष्म, अर्जुन, दुर्योधन, कर्ण जैसे योद्धा सुन समझ रहे थे।
गीता जी को गीतोपनिषद की संज्ञा दी गई है। इसके पहले 2 शब्द है धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्रे और यह कृष्ण अर्जुन संवाद के रूप में लिखी गई है यह महर्षि वेदव्यास जी द्वारा 5000 ईसा पूर्व रचित है।
कृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश मात्र एक व्यक्ति विशेष अर्जुन पांडव या किसी धर्म संप्रदाय को लक्ष्य कर नहीं कहे हैं बल्कि पूरी मानव जाति के कल्याणार्थ अमृत संदेश ज्ञापित किए हैं। जब हम नियमित रूप से किसी से अगाध निश्चल प्रेम करने लगते हैं तो उसके मौन की भाषा बिना कहे समझ लेते हैं वैसे ही गीताजी के निमित्त पठन-पाठन से यह स्वतः लोगों को भावार्थ समझ आने लगते हैं व जीवन में उतरते चले जाते हैं।
गीता में अर्जुन की भक्ति, कृष्ण का प्रेम,माता कुंती की ममता, विदुर का न्याय, धृतराष्ट्र का अंध पुत्र प्रेम, द्रोण का गुरुत्व,भीष्म की प्रतिज्ञा, माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे हर संबंध के निर्वहन की शिक्षा है। हर घर में गीता का एक श्लोक प्रतिदिन बच्चों को बताना चाहिए जिससे धीरे-धीरे उनके जीवन का सर्वांगीण विकास हो सके।
गीता जी ज्ञान, संस्कृति वैराग्य, योग और जीवन के संबंधों के जीने की अनुपम शैली सिखाती है। इसे पढ़ने से हमारा व्यक्तित्व एक उत्कृष्ट शान्तिपूर्ण व्यक्तित्व में परिवर्तित होता जाता है। आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिक को गीता जी में अगाध श्रद्धा विश्वास था।
हम सभी दुखो से घिरे हुए हैं, और अतीत की कडवी यादों और अपने कष्टों से मुक्ति पाना चाहते हैं इसके लिए गीता जीवनदायिनी है। हमारी हर दुविधा का पूर्ण उत्तर है।
भविष्य में क्या होगा? ये विचार हमारे दिमाग से निकल जाते है और हम वर्तमान में जीने लगते हैं। गीता पढ़ने वाले व्यक्ति को सच और झूठ, ईश्वर और जीव का ज्ञान हो जाता है। उसे अच्छे और बुरे की समझ आ जाती है।
गीता पढ़ने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है और व्यक्ति साहसी और निडर बनकर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ता है। नियमित गीता पढ़ने से शरीर और दिमाग में सकारात्मक ऊर्जा विकसित होती है।कर्त्तव्य बोध की भावना विकसित होती है।
आरोग्यता प्राप्त होती है।श्री कृष्ण जी ने आहार को सात्विक, तामसिक व राजसिक माना है। सात्विक भोजन को सर्वश्रेष्ठ कहा है। आहार-विहार से आरोग्यता प्राप्त होती है। रोग मनोकायिक होते हैं जो योग से सरलता से भगाये जा सकते हैं
देवी गुण राक्षसी गुणों के बारे में बताया है जिससे हम सद् आचरण करें
मोक्ष मार्ग व योग निद्रा मार्ग को भी बताया है। पीपल वृक्ष को श्रीकृष्ण जी ने स्वयंरूप कहा है पीपल में ऑक्सीजन अधिक होती है हर एक कारण के पीछे वैज्ञानिक विश्लेषण छिपा है।
मुझे श्रीमद्भागवत गीता जी के 7 श्लोक बहुत ही प्रेरक व जीवन दायी लगते हैं।मैं सातो श्लोक आप से कहानी रूप में बताऊंगी।
1****
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।
क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि भ्रष्ट होती है। जब बुद्धि भ्रष्ट होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है, जब तर्क नष्ट हो जाता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है। इस क्रोध को जितना जल्दी हो सके छोड़ देना चाहिए।
जैसे कोहरा सर्दियों में सूर्य प्रकाश को ढक लेता है ठीक उसी प्रकार क्रोध करने से निर्णय लेने की क्षमता विलुप्त हो जाती है। क्रोध में विवेक नष्ट हो जाता है बाद में पश्चाताप हाथ लगता है।
बुजुर्गों ने कहा है
जब बुद्धि ( मति )ही मारी जाये तब अच्छे बुरे का विवेक ही न रह जायेगा और पतन का कारण बनेगा।
संत तुलसीदास जी ने मानस में कहा है
जहां सुमति तहां संपति नाना जहां कुमति तहं बिपति निधाना।
मैं एक ऐसे अपने जानने वालों की कहानी साझा कर रही हूं जो सबके लिए प्रेरणादायक है, मैं भी बहुत प्रभावित हुयी क्रोध न करने की कोशिश करती हूं।
एक बहुत ही सज्जन व्यक्ति थे। उनको एसएलआर कैमरा का मन बहुत ही कर रहा था जबकि उनका काम मोबाइल से आराम से चल रहा था पर रात-दिन उसी के ख्याल आते आखिर उन्होंने ले ही लिया।
बहुत संभाल कर बंद अलमारी में रखते पर उसी की चिन्ता में मन लगा रहता उनका इससे बहुत अधिक जुड़ाव हो गया था।
एक दिन किसी परिचित के आने से, जल्दी में होने से बाहर ही भूल गये। 6 वर्षीय बेटे ने अभी उत्सुकतावश देखना शुरू ही किया था अचानक से सामने आये पापा को देख डर के कारण हाथ से छूट गया तब तक पत्नी भी किचेन से आ चुकी थीं।
अधिक आसक्ति से संतुलन पहले ही भंग हो चुका था, उन्होने क्रोध में आव देखा न ताव, अपनी पत्नी को कनटाप में एक झन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया। वहीं खड़ा उनका 6 वर्षीय बेटा देख रहा था वह डरकर तेजी से,पास में रहने वाले ताऊ जी के घर भागता है रास्ते में एक बाइक से टक्कर खा गिर जाता है बच्चे को सिर में अधिक चोट आती है।
7 दिन जीवन-मरण की स्थिति में गुजरते हैं। घर आकर पता लगता है गाल में जोर का थप्पड लगने से पत्नी के कान का पर्दा फट गया है उनका भी इलाज के बाद ठीक हो गया। अब परिवार मे डर और तनाव का माहौल हो गया था। वे पति और पिता का प्यार नही भय का पर्याय हो चुके थे। पैसा भी कैमरा से तिगुना खर्च हो चुका था।
यहां यह सब क्रोध के कारण हुआ श्लोक के अनुसार क्रोध तब होता है जब किसी आसक्ति में बाधा आती है।
अब घर की ऐसी हालत देख उनका मन एकदम उचाट हो गया किसी ने उन्हें नियमित गीता अर्थ सहित समझने की सलाह दी जीवन मे उन्होने कभी क्रोध न करने की कसम खा ली इसका परिणाम बहुत नजदीक से देख चुके थे। क्रोध आता भी तो उस स्थान या व्यक्ति से थोड़ी देर को दूर हो मौन धारण करते सब ठीक हो जाता है।
क्रोध करने वाले का अधिक नुकसान होता है उत्तेजना, स्नायविक संतुलन को अस्त-व्यस्त कर देती है कुछ अंगो में अधिक ऊर्जा भेज दी जाती है कुछ जरूरत की शक्ति नहीं पाते और फेल्योर का कारण बनते हैं।यह एक विषाक्त जहर है।
