HARSH TRIPATHI

Drama Thriller


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HARSH TRIPATHI

Drama Thriller


श्री कृष्ण-अर्जुन -- भाग - ३

श्री कृष्ण-अर्जुन -- भाग - ३

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.....नौकर कुछ देर में दवा ले आया और पाठक जी को दवा दी गयी। उसके बाद लगभग डेढ़ घंटे से कुछ ज़्यादा वक़्त तक पाठक जी वहीं सोफे पर ही सोते रहे, और रजनी देवी चुप-चाप आँसू बहाती उनके पैर के पास ही बैठीं रहीं बीच-बीच में नौकरों को रात के खाने के लिए निर्देश भी दे रहीं थीं।

धीरे-धीरे करके पाठक जी की आँखें खुलीं। वो उठने और उठ कर बैठने की कोशिश कर रहे थे, जब रजनी देवी जी ने उन्हें हाथ लगाकर सोफे पर ठीक से बैठाया। कुछ मिनटों तक पाठक जी कुछ नहीं बोले। रजनी देवी भी बिलकुल खामोश थीं और कभी पाठक जी को, तो कभी सिर नीचे करके ज़मीन को देखे जा रहीं थीं।

"अब कैसे है तबियत?" आँसू अच्छे से पोछ कर, बड़ी हिम्मत करके रजनी देवी ने पूछा।

गहरी साँस छोड़ी पाठक जी ने, फिर रजनी देवी की तरफ देख के बोले "अभी....ठीक है। "

"खाना लगवाऊं?"

"पाँच मिनट रुको अभी....थोड़ा पानी देना तो"

रजनी देवी खुद उठीं और फ्रिज में से आधा गिलास पानी लिया फिर बाकी आधी गिलास में रसोई जा कर गरम पानी मिलाया।

पाठक जी को पानी देते हुए पूछा "बिस्किट लेंगे एक?"

पाठक जी ने 'हाँ ' में सिर हिलाया। नौकर को रजनी देवी ने बिस्किट लाने की आवाज़ दी जो प्लेट में २ बिस्किट ले आया। पाठक जी ने बिस्किट खा कर पानी पिया। दोनों कुछ देर तक खामोश बैठे थे। पाठक जी ने इस इसे तोड़ा "खाना लगवा दो....भूख लगी है। "

रजनी देवी बड़ी सी डाइनिंग टेबल पर खाना लगवाने लगीं। "वैभव आया?" पाठक जी पूछना चाह रहे थे मगर पूछा नहीं।

दोनों ने भोजन करना शुरू कर दिया था। कमरे में उस समय केवल नौकरों की आवाज़, और कलछुल, चम्मच आदि की प्लेटों से टकराने की आवाज़ ही सुनाई दे रही थी। कमरे में तनावपूर्ण शान्ति व्याप्त थी।

पाठक जी ने खाना ख़त्म किया और मेज पर बैठे रहे जब तक रजनी देवी जी का खाना ख़त्म नहीं हो गया। खाना खा कर दोनों उठे और अपने कमरे की ओर जाने लगे। रजनी देवी जी ने पीछे मुड़कर नौकरों से बोला "वैभव आये तो उसका खाना लगा देना गरम कर के। "

बिस्तर पर वह दोनों लोग बिलकुल चुप बैठे थे, जैसे डाइनिंग टेबल की खामोशी कमरे में साथ-साथ ही चली आयी हो। इस चुप्पी को पाठक जी ने तोड़ा "देखिये रजनी, ऐसा तो आप नहीं कह सकतीं कि मैं अपने बेटे का बुरा चाहता हूँ और उसको एम.पी. बनाना नहीं चाहता.... क्योंकि अगर ऐसा होता तो वैभव की काली करतूतों पर मैंने उसको जितना बचाया है आज तक, ये कभी नहीं होना था। "

रजनी देवी सिर नीचे कर के सुन रहीं थीं।

"मैं जानता हूँ कि हमने उसको पैदा होने के पहले दिन से आज तक यही कहा है कि सांसद वही होगा....लेकिन आप मुझे समझाइये कि जिन लोगों को, जो लगभग ४० लाख से ज़्यादा लोग हैं, वोट देना है, उनको क्या बोल कर वोट मांगे जाएँ?.....वो भी तब जब इनकी कारगुज़ारियों के बारे में सड़क पर चलने वाले हर बाशिंदे को पता है? ये जहां कहीं जाते हैं, मार-पीट करते हैं और इनका आखिरी वाक्य ये होता है "....जानता है मैं कौन हूँ?...वैभव पाठक नाम है मेरा.....पाठक जी का लड़का हूँ मैं...." , अब आप बताइये, ऐसे में इनको वोट मिलेंगे तो कैसे ? विजय को मेरी और कृष्णा बाबू की फोटो लगी गाड़ी के साथ गाँव-देहात के लोग महीने में ३-४ बार देखते हैं, वैभव पाठक को साल भर में २ बार , बोलिये वोट कहाँ से मिलेंगे? वोट पाने के लिए जनता के बीच जाना , दिखना पड़ता है....अब बहुत जल्द ही वह समय जाने वाला है जब बाप बड़ा नेता होता था और बाप के नाम पर, भावनात्मक लगाव के कारण बेटे-बेटी को चुनाव में वोट मिल जाया करता था। अब उदारीकरण, निजीकरण की ये जो आंधी चली है, इसके बाद जो समय आने वाला है, वो ऐसा होगा कि गाँव-देहात के युवा जो पढ़-लिख जायेंगे वो, उस नेता को अपना माई-बाप नहीं समझेंगे जिसको पीढ़ियों से उनके बाप-दादा अपना माई-बाप मानते आये हैं। आने वाले वक़्त में गाँव के लोग भी वोट उसी को देंगे जो उनके बीच, उनके लिए काम करता दिखेगा.....और ये तो आप भी जानती ही हैं कि बिना ग्रामीण वोट के जीत असंभव है। "

".....तो आप ही बताइये कोई रास्ता" परेशान रजनी देवी ने कहा।

पाठक जी ने कहा "मेरी मानिये तो आप वैभव को समझाइये कि अपनी आदतों में सुधार लाये, अच्छा आचरण और बात करने की अच्छी तमीज होना राजनीति में सफल होने की पहली शर्त है। अगर परिवार और बीवी से जुड़ी बातों को निकाल भी दिया जाये तो भी अपनी छवि जनता की नज़रों में बदलना और अच्छा बनाना , वैभव के लिए इस वक़्त सबसे ज़्यादा ज़रूरी है.... और उनके पास ज़्यादा वक़्त भी नहीं है , ज़्यादा से ज़्यादा १८-२० महीने में लोकसभा चुनाव होंगे ही, उसके पहले ही इनको अपना रिकॉर्ड जनता की नज़र में सही करना होगा।" रजनी देवी उन्हें देख रहीं थीं, गहरी साँस छोड़ते हुए बोलीं "कितनी बार तो कहा गया है उसको,.....मगर उसकी अकल पर पत्थर पड़ गए हों जैसे,.... हर मर्ज़ की तो होती है दवा, अब आदत की दवा कहाँ से लाएं?" पाठक जी ने कहा "मेरे ख्याल से आप उनको समझाइये कि अपना ज़्यादा समय हॉस्टल और होटलों में बिताने की बजाय वह विजय की संगत में बिताएं। वैभव जितना ज़्यादा उसके साथ रहेंगे , जितना उसके साथ नज़र आएंगे , उतना फायदा होगा। इस बारे में विजय को बुलाकर भी बात करनी पड़ेगी हमें, कि वह वैभव को अपने साथ ज़्यादा रखे। मै भी कृष्णा बाबू से बात करूंगा। " रजनी देवी ने कहा "ठीक है, अबकी ये भी कर के देखते हैं।"

फिर वह बोलीं ".....लेकिन मैं आपसे एक बात बोलूंगी, आप मेरे सामने उस गीतिका का ज़िक्र मत किया कीजिये , चाहे जो भी बात हो। "

पाठक जी ने कहा "अरे लेकिन आप सुनिए तो...."

बात बीच में काट कर रजनी देवी बोल पड़ीं "....मैंने कहा , चाहे जो भी हो जाये, आप मेरे आगे गीतिका का नाम नहीं लेंगे। "

पाठक जी चुप बैठे थे।

रजनी देवी ने बोलना जारी रखा "मैं जानती हूँ, वह आपकी बेटी है,....मैं ये भी जानती हूँ कि वह अच्छी पढ़ी-लिखी, काबिल, तमीज़दार लड़की है। मुझे पता है कि आप उसको काफी प्यार करते हैं, और करना भी चाहिए,... लेकिन आप भी यह जानते हैं कि मैं उसे देखना नहीं चाहती इस घर में, और अपनी ज़िंदगी में। मुझे इस जन्म में सबसे ज़्यादा नफरत उसी से है, और हमेशा रहेगी। मेरे लिए यह एक बहुत बड़ा संताप है कि मैं उसे इस घर में आता-जाता देखती हूँ। मैं जानती हूँ कि आपको ये सुनने में बहुत ही गंदा और घटिया लगता होगा कि मैं उसके बारे में ऐसा कैसे सोच सकती हूँ ?.....एक औरत को दूसरी औरत से इतनी नफरत कैसे?.......लेकिन ये मेरे जीवन की सच्चाई है पाठक जी, और मैं इस से भाग नहीं सकती। थोड़ी देर के लिए आप मेरी जगह आ कर सोचिये , मैं वह औरत हूँ जिसका पति....." , और फिर उन्होंने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

पाठक जी सुन रहे थे।

"मैं ज़्यादा नहीं बोलूंगी, ना ही बहस करूंगी मगर इतना ज़रूर कहूंगी कि मेरे बेटे का हक़ छीन कर किसी को भी ना दीजिये,....और कम से कम उसे तो कतई नहीं। "

पाठक जी ने समझाने की कोशिश की ".....लेकिन गीतिका काबिल है, जानकार भी है, उसकी छवि भी बहुत अच्छी है,...पार्टी के लोग उसे बहुत पसंद करते हैं, और सबसे बड़ी बात, जिसकी वजह से आज ये बहस हुई हमारे बीच, वो ये है कि ये संसदीय सीट बाहर के किसी इंसान के हाथ में जाये, चाहे विजय हो या कोई और , उससे तो लाख दर्जे अच्छा कि ये सीट हमारे परिवार मे ही रहे। हमारे काम का फायदा किसी बाहरी को क्यों मिले?...घी अपनी ही थाली में गिरना चाहिए।"

रजनी देवी ने कहा "आपकी बात सही है लेकिन गीतिका की चर्चा आप मुझसे मत किया कीजिये बस, ...और जहां तक सीट का सवाल है, या तो उस पर आप रहिये या फिर वैभव। मैं १-२ दिन में ही विजय को बुलाकर बात करती हूँ , आप भी कृष्णा बाबू को बोलिये कि वह विजय को समझाएं। "

"ठीक है। " पाठक जी ने कहा "मैं कल ही बात करता हूँ उनसे। अब तो तसल्ली है आपको ?"

"जी", रजनी देवी जी ने इतना कहा और बिस्तर पर लेट गयीं, फिर उनको जल्दी ही नींद आ गयी।


दूसरे दिन सुबह १० बजे के आस-पास रजनी देवी ने जार्जटाउन स्थित कृष्णा बाबू के आवास पर फोन किया। किसी नौकर ने उठाया-

"हैलो !"

"हाँ,....मैं रजनी देवी बोल रही हूँ, पाठक जी के घर से..."

"जी मैडम , प्रणाम!...जी ,कहिये?"

"विजय जी हैं क्या?"

"जी, अभी बुलाता हूँ, होल्ड करें थोड़ा "

नौकर ने रिसीवर वहीं पास में रख दिया और विजय को बुलाने चला गया, थोड़ी देर बाद विजय आया -

"जी आंटी जी, प्रणाम!"

"खुश रहो विजय!!....तुम तो जैसे गायब ही हो गए हो....अरे कभी-कभी समय निकालकर हमसे भी मिल लिया करो" ज़बरदस्ती की हँसी हंसते हुए रजनी देवी बोलीं।

"नहीं आंटी जी, इतना भी व्यस्त नहीं हूँ....आप जब भी चाहें , मैं आ जाऊंगा वहाँ " विजय ने मुस्कुरा कर कहा।

"अरे हमारे ही चाहने पर आओगे?.......कभी खुद भी चाह लिया करो। .....फिलहाल ,कुछ बात करनी है तुमसे। "

"जी, जी.....मैं कल सुबह आता हूँ ११ बजे, ठीक रहेगा?"

"बिलकुल ठीक है,.....आ जाओ तुम" , इतनी बात करके रजनी देवी ने फोन रख दिया।


पार्टी दफ्तर में उसी दिन कृष्णा बाबू जब पार्टी के किसी काम के सिलसिले में पाठक जी से मिलने आये तो पाठक जी ने बैठा लिया अपने पास "थोड़ा रुकिए कृष्णा बाबू , कुछ बात है ज़रूरी। " उस वक़्त कई लोग कमरे में मौजूद थे जिनके जाने के कुछ समय बाद बाद ,तन्हाई में पाठक जी ने कृष्णा बाबू से कहा "कृष्णा बाबू, वैभव के लिए कुछ बात करनी है। "

"जी, बताएं"

"कृष्णा बाबू , अब आपसे क्या छुपाएं?, आप तो जानते ही हैं.....हमारा लड़का वैभव,...कोई सूरत नहीं दिखती जिस से उसको सही रास्ते पर ला सकें। उसके लिए बिजनेस खड़ा किया, उसको भी बर्बाद करके बैठा वो,....शादी की ,कि क्या पता सुधार हो जाये , लेकिन अपनी शादी,...वो भी बीना जैसी लड़की के साथ.....वो उसको भी चला नहीं पाया। उसके और दूसरे कारनामें तो पता ही हैं आपको। हो सकता है हमारी वजह से कोई सामने नहीं बोलता हो.....लेकिन पीठ पीछे वो क्या बोलते हैं, मैं अच्छी तरह समझता हूँ। "

कृष्णा बाबू सुन रहे थे।

पाठक जी ने कहा "आपसे थोड़ी मदद की दरकार है।"

कृष्णा बाबू बोले "जी, कहिये,......आखिर अपना ही बच्चा है.....जो हमसे होगा, हम ज़रूर करेंगे। "

"तो फिर सुनिए, विजय से कहिये न कि वो वैभव को भी अपने साथ रख ले, जहां कहीं जाए , जो भी काम करे , उस में?....वैभव भी थोड़ा सीख-समझ जाएगा दुनियादारी, तमीज , अच्छी बातें कहना-सुनना ?.....आखिर ये दोनों बच्चे ही तो हमारी पार्टी का भविष्य हैं, आगे आने वाली ज़िम्मेदारियाँ तो इन्ही के कन्धों पर आनी है न?"

कृष्णा बाबू ने 'हाँ' में सिर हिलाया।

"अब विजय पढ़ा-लिखा, तमीज़दार, व्यवहारकुशल, दिमागी तौर पर बेहद मज़बूत और जनता से संवाद स्थापित करने में दक्ष है , वैभव तो इन सब बातों में सिरे से खारिज है।" पाठक जी ने कहा और सामने मेज पर रखा पानी पीने लगे।

कृष्णा बाबू उन्हें देख रहे थे और अपने मन में कुछ समझने का प्रयास कर रहे थे।

फिर पाठक जी ने थके स्वर में कहा "अब कितना भी कमीना है कृष्णा बाबू, है तो हमारा लड़का ही न। लोगों की नज़र में ज़रूर ख़राब होगा वो लेकिन हमारी दुनिया तो वही है न।" कृष्णा बाबू ने मौन सहमति दी।

"तो आप विजय को बोलियेगा,........इसको एक मजबूर, लाचार पिता की विनती ही समझियेगा कृष्णा बाबू। " ये कह के पाठक जी ने हाथ जोड़ लिए।

कृष्णा बाबू ने उनके हाथों को पकड़कर कहा "शर्मिंदा न करें पाठक जी, अगर आपको लगता है कि ऐसा होने से वैभव सुधर जायेगा तो मै वादा करता हूँ, मैं आज ही विजय से बात करता हूँ।" पाठक जी ने कहा "बहुत बहुत शुक्रिया आप का कृष्णा बाबू। " फिर उन लोगों ने और कुछ बातें कीं और थोड़ी देर बाद कृष्णा बाबू कमरे से चले गए।


शाम का वक़्त था, कृष्णा बाबू अपने घर में, अपने कमरे में बैठे आराम कर रहे थे और कुछ सोच रहे थे ".....तो पाठक जी वैभव के राजनीतिक भविष्य को लेकर सोच रहे हैं। मतलब शहर केंद्रीय लोकसभा सीट का टिकट वैभव को ज़रूर दिलवाना चाह रहे हैं। और जब खुद पाठक जी ऐसा चाह रहे हैं तो उनको कौन रोक सकता है?.....ये तो हो कर रहेगा। फिर विजय का क्या होगा?.....अपनी सारी डिग्रियां, काबिलियत, मेहनत, अच्छी नीयत और बेहतरीन छवि के बाद भी विजय किनारे पर ही रह जायेगा। वैभव को सुधारा कैसे जाये?....विजय की संगत से, और बदले में विजय को क्या मिलेगा?......कुछ नहीं,.....या फिर ज़्यादा से ज़्यादा विधायकी का टिकट ही। मतलब पाठक जी के लिए भी पार्टी महत्वपूर्ण नहीं है, न ही सामने वाले की मेहनत या नीयत या काबिलियत,.... उनके लिए सबसे ज़रूरी है, उनका अपना बेटा, उनका अपना खून, और उनकी राजनीतिक विरासत जिसको वह अपने बेटे के हाथ में ही सौंपना चाहते हैं, जबकि पाठक जी खुद, और पूरी दुनिया अच्छी तरह जानती है कि वैभव पाठक के अंदर सांसद तो छोड़ो ,मामूली निगम पार्षद बनने के लिए भी हड्डी ही नहीं है। शराब और ड्रग्स के नशे में धुत्त जो इंसान अपने पैरों पर ही १ घंटे तक खड़ा नहीं हो सकता, लाखों का जनमानस छोड़िये ; पार्टी ऑफिस में अपनी पार्टी के १०० -५० कार्यकर्ताओं के आगे खड़ा होकर हिंदी में १० लाइन ढंग से बोल नहीं सकता, जिसका दाखिला न ही यूनिवर्सिटी में हुआ, न ही यहां के किसी डिग्री कॉलेज में , बल्कि बी.ए. की पढ़ाई पूरी की, वो भी पत्राचार से, और द्वितीय श्रेणी में.........उसके आगे हिम्मत भी नहीं हुई कि पढ़ भी सके। पूरे शहर भर में, और पार्टी के अंदर भी , उस से लोग इस तरह नफरत करते थे जैसे शहर के लोग सुअर से करते हैं। जिस तरह सुअर को अपने आस-पास देखना कोई पसंद नहीं करता उसी तरह वैभव के प्रति लोगों का रवैय्या था। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से हमेशा जो इतनी बे-अदबी करता था और पीठ पीछे हमेशा गाली खाता था, अपने बीवी-बच्चे, परिवार जो संभाल नहीं सका और पूरे शहर को पता था कि ये व्यभिचारी है, पाठक जी उस वैभव का पक्ष ले रहे थे , और उसके लिए जगह किसको खाली करनी पड़ रही थी? विजय को,....... मेरे अपने बेटे को। उसको जिसको खुद पाठक जी और विपक्षी नेता तक आज की तारीख में सबसे मज़बूत, लोकप्रिय , सक्षम युवा नेता मानते थे। वो जिसके गुणों और रिकॉर्ड के आगे वैभव तो क्या , वैभव जैसे सौ भी खड़े नहीं हो सकते थे। पढ़ाई हो या राजनीति, या जनता की बातें समझना और समझाना, विजय का एक अलग ही मुकाम था। "...... उसे लेकर कृष्णा बाबू ने कितने ही सपने बुने थे। वे सब धूल-धूसरित होते नज़रआ रहे थे। खुद सांसद नहीं बन सके कृष्णा बाबू लेकिन विजय के ज़रिये अपना ये सपना पूरा करने की ख़्वाहिश उनकी हमेशा से थी।

एक दूसरा पक्ष पाठक जी के प्रति कृष्णा बाबू के समर्थन और ३५ साल से ज़्यादा की वफादारी का भी था। यूनिवर्सिटी से लेकर आज तक कृष्णा बाबू ने कभी पाठक जी का साथ छोड़ा नहीं था। अपने सगे भाईयों से भी कहीं ज़्यादा भरोसा करते थे पाठक जी उन पर। इन ३५ सालों से कुछ ज़्यादा के सफर में, कृष्णा बाबू के आगे कितने ही मौके आये होंगे जब वह पाठक जी को ज़मीन सुंघा सकते थे, लेकिन तभी भी उन्होंने पाठक जी को और भी मज़बूत करने का ही काम किया। कितने ही आमंत्रण मिले थे कृष्णा बाबू को विपक्षी दलों से , पद और प्रतिष्ठा के लिए, पैसे के लिए, लेकिन विनम्रतापूर्वक उन्होंने सब को अस्वीकार ही किया था। क्या इस भरोसे और वफादारी पर आज अपने बेटे की क़ुर्बानी दे दी जाये?.......बिलकुल नहीं।

सब कुछ सोच कर उन्होंने तय किया, कि बर्बादी के रास्ते पर अगर वैभव पाठक आज जा रहा है, तो वह उसे रोकने की कोशिश बिलकुल नहीं करेंगे। व्यक्ति अपने फैसलों , अपने जीवन के लिए खुद उत्तरदायी होता है और उसे होना भी चाहिए। जो व्यक्ति अपने प्रति, अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकता उसे किसी प्रकार का पुरस्कार पाने का कोई अधिकार वैसे भी नहीं है। वैभव ने अपने और अपने घर-परिवार की यह गति खुद चुनी है , और पाठक जी और रजनी देवी जी ने धृतराष्ट्र और गांधारी बनकर उसका साथ ही दिया है। ऐसे में जो हो रहा है, उसे होने ही दिया जाये , यही कृष्णा बाबू और विजय के हित में होगा।


रात में लगभग १० बजे के आस-पास का वक़्त रहा होगा। पाठक जी रात के खाने के बाद अपने घर में ही बने अपने चैंबर में अपना काम निपटा रहे थे। कुछ दिनों में पार्टी मीटिंग होने वाली थी, उसका होमवर्क करना भी ज़रूरी था। पाठक जी तेज़दिमाग इंसान थे,बिना तसल्लीबख्श होमवर्क किये कहीं भी जाते नहीं थे। इसके अलावा उनके निर्वाचन क्षेत्र के भी कुछ काम भी निपटाने ज़रूरी थे, जिनको उन्होंने कई दिन से देखा भी नहीं था। तभी चैम्बर के फोन की घंटी बजी। पाठक जी ने फोन उठाया -

"हैलो!"

"जी, पिताजी प्रणाम!.....मैं नंदन बोल रहा हूँ। " उधर से आवाज़ आयी।

"हाँ , नंदन जी,...कहिये, इस वक़्त फोन करने का कारण?....सब ठीक तो है?"

"जी, जी,....ऐसी कोई बात नहीं है, आप लोगों के आशीर्वाद से सब कुशल है। "

"और माता जी कैसी हैं आपकी?"

"ठीक हैं पिताजी, अब इस तकलीफ से उबरने में थोड़ा तो वक़्त लगेगा ही,....फिर वृद्ध व्यक्ति हैं माता जी , ज़्यादा ही सोचतीं हैं। "

"...सो तो है ,.......हंसों का खुशहाल जोड़ा था कितने सालों से , वो जोड़े का एक साथी अब है नहीं। ...बच्चे तो फिर भी अपने काम में व्यस्त होते हैं , दोनों वृद्ध ही एक दूसरे का सहारा होते हैं.....हमारे यहां भी यही चल रहा है,.....अभी हम लोग गाड़ी खींच रहे है, देखिये कब तक सलामती से खींचते हैं....."

"जी, जी"

"कहिये, कैसे किया फोन?"

"पिताजी, आपसे मिल कर कुछ बात करनी थी.....थोड़ा ज़रूरी है। जब आपको समय हो तो घर पर आ जाऊं मैं। "

"अभी तो अगले कुछ दिन में दिल्ली जाना है....डॉक्टर से अपॉइंटमेंट है और पार्टी मीटिंग भी है। मैं १२ तारीख, शनिवार को आ जाऊंगा वापस, आप १३ को, रविवार की शाम को आ जाइये,.....खाना साथ में खाते हैं, और आपसे मुलाक़ात भी हो जाएगी।"

"जी , बहुत अच्छा,... अब मैं रखता हूँ नीचे,...प्रणाम !!, माँ जी को भी प्रणाम बोलियेगा।"

"जी, जी , बिलकुल,....शुभ रात्रि।"

फिर कॉल डिस्कनेक्ट हो गयी।


टीवी और अखबारों में ,पाठक जी और श्रमशक्ति पार्टी के बारे में यूँ तो चर्चाओं का बाजार गर्म ही था , एक और खबर पिछले कुछ समय से अखबारों में आ रही थी जो आम लोगों के बीच और राजनीतिक हलकों, और बिजनेस क्लास में भी कुछ सरगर्मी पैदा कर रही थी। अकबराबाद-लखनऊ रोड पर अकबराबाद शहर से ४५ किलोमीटर दूर एक गाँव था ,रसूलपुर निंदौरा। मुस्लिम-बहुल इस गाँव में ज़्यादातर आबादी किसान परिवारों की थी जिनका आय का ज़रिया खेती ही था। वहाँ की ज़मीन काफी अच्छी फसल पैदा करने वाली ,अधिक उपजाऊ मिट्टी वाली ज़मीन थी। वहाँ के कुछ किसान पिछले कुछ समय से धरने पर बैठे थे जो किसी बड़ी विदेशी प्राइवेट आई.टी. कंपनी के, आई.टी. नॉलेज पार्क प्रोजेक्ट बनाने की योजना हेतु भूमि अधिग्रहण किये जाने का विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि इस आई.टी. नॉलेज पार्क प्रोजेक्ट से उनका कोई फायदा नहीं होने वाला है, उलटे उनकी आजीविका का एक मात्र साधन , उनकी ज़मीन और चली जाएगी। इस कारण वे पिछले कुछ दिनों से विरोध प्रदर्शन पर बैठ गए थे।


दरअसल वह समय देश के राजनीतिक-आर्थिक, और सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य के लिहाज़ से अत्यंत ही संवेदनशील समय था। १९९० के बाद पूरी दुनिया में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की ज़बरदस्त आँधी चल रही थी, जिसे रोका जाना या वापस मोड़ा जाना कतई नामुमकिन था। भारत भी इस आँधी से अछूता नहीं रह सका। १९९० के बाद से भारत सरकार व लगभग सभी राज्य सरकारों द्वारा चरणबद्ध तरीके से आयात पर से प्रतिबन्ध हटाने, विदेशी निवेश के लिए द्वार खोलने , विदेशी पूँजी, श्रम व प्रौद्योगिकी का मुक्त प्रवाह सुनिश्चित करने हेतु कदम उठाये जाने लगे थे। केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारें , चाहे किसी भी पार्टी की हों, यह चाहतीं थीं कि उनके यहां ज़्यादा से ज़्यादा निवेश आये, और इस प्रक्रिया में विदेशी निवेशकों के आगे राज्य सरकारों द्वारा ,उनके मन-माफिक निवेश के ऑफर रखे जा रहे थे। काफी कम समय में ही ,दुनिया भर में यह सन्देश भी जा रहा था कि भारत निवेश करने और मुनाफ़ा कमाने के लिहाज़ से बहुत अच्छी जगह है, और यहां के राज्यों में पैसे लगाए जाने चाहिए। इस तरह से यह कुछ ऐसा वक़्त था जब सरकार, निजी क्षेत्र , और जनता भी आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर उड़ान भरने के लिए तैयार हो रहे थे।

लेकिन इस सुहाने सपने पर बहुत गहरी चोट की थी १९९२ की बाबरी मस्जिद विंध्वंस की घटना ने। दिसंबर , १९९२ में मस्जिद गिरी , और उसके बाद पूरे देश भर में भयानक साम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गए थे जो किसी के भी काबू से बाहर ही थे। मार्च , १९९३ में बंबई में एक साथ अलग-अलग स्थानों पर भीषण बम धमाके हुए जो मस्जिद विंध्वंस का बदला लेने के तौर पर देखे गए। देश में दंगों का स्वरुप और भी ज़्यादा भयावह हो गया था। राष्ट्रपति ने भी ४ राज्यों की राज्य सरकारों को संविधान का पालन न कर पाने के आरोप में तत्काल अनुच्छेद ३५६ के तहत बर्खास्त कर दिया था। इसमें उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार भी थी। दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में भी उपद्रव अपने चरम पर था और काउंटर-इंसर्जेन्सी ऑपरेशन्स लगातार जारी थे। हालत केवल भारत में ही बुरी नहीं थी बल्कि भारत के बाहर भी दुनिया भर में भारतीय तथा विशेष रूप से हिंदू प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा था। पड़ोसी देशों पकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव के साथ साथ खाड़ी के देशों , अफ्रीका के देशों में बड़ी संख्या में मंदिर तोड़े गए, हिंदुओं की दुकानें लूटीं गयीं तथा भारतीय कंपनियों के दफ्तरों को काफी नुकसान पहुंचाया गया। पकिस्तान और बांग्लादेश में तो उग्र भीड़ ने इंडियन एयरलाइन्स के दफ्तरों को भी फूंक दिया। यूरोप और अमेरिका में भी मंदिरों को क्षतिग्रस्त किये जाने, उन पर कालिख पोते जाने की कुछ खबरें आयीं थीं। इन सबसे दुनिया में भारत के बारे में बेहद खराब सन्देश जा रहा था। दुनिया भर के विश्वविद्यालयों के दिग्गज प्रोफेसर , बड़ी वैश्विक संस्थाओं के बड़े अधिकारी लगातार मस्जिद विंध्वंस व सांप्रदायिक दंगों के लिए भारत की निंदा कर रहे थे। इन सबका प्रभाव निवेश पर पड़ना ही था।


बाबरी मस्जिद विध्वंस को मुश्किल से २ साल बीते थे , दंगे-फसाद भी लगभग पूरी तरह से ख़त्म ही हो चुके थे। उत्तर प्रदेश में भी उसके बाद विधानसभा चुनाव हो चुके थे, जिनमे पाठक जी की श्रमशक्ति पार्टी ,कुछ अन्य छोटी पार्टियों के साथ सरकार बनाने में सफल रही थी। लेकिन निवेश अभी भी उस गति से नहीं आ रहा था जैसी अपेक्षा थी। ऐसे में ब्रिटेन की दिग्गज कंप्यूटर सॉफ्टवेयर निर्माता कंपनी फोटॉन इंफोटेक ने भारत में लगभग १००० करोड़ रुपये का निवेश करने की जब घोषणा की, तो राज्य सरकारों में होड़ लगी कि उसे अपने यहां कौन बुलाता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसमें बाज़ी मार ली और कंपनी को अपने यहां अकबराबाद के रसूलपुर निंदौरा गाँव में आई.टी. नॉलेज पार्क लगाने के लिए राज़ी कर लिया। इसके पहले आई.टी. नॉलेज पार्क की शुरुआत दक्षिण के राज्यों में हो चुकी थी लेकिन उत्तर भारत का यह प्रथम आई.टी. पार्क होता। अब इसमें मार्के की बात यह थी कि फोटॉन इंफोटेक ने इस प्रोजेक्ट में ७०० करोड़ रुपये सीधे लगाने की तैयारी की थी जबकि भारत में वह रियल एस्टेट के बिजनेस में किसी नामी और स्थापित रियल एस्टेट डेवलपर के साथ शेष ३०० करोड़ रुपये की पार्टनरशिप में उतरना चाहती थी। उत्तर प्रदेश में ख्याति प्राप्त रियल एस्टेट कंपनी अग्रवाल इंफ्रास्ट्रक्चर्स यह अनुबंध हथियाने में कामयाब रही। अग्रवाल इंफ्रास्ट्रक्चर्स के मालिक थे मिस्टर नंदन अग्रवाल यानी पाठक जी के दामाद।

अब जब आई.टी. नॉलेज पार्क की खबर गाँव में फ़ैली तो रसूलपुर निंदौरा में प्रदर्शन शुरू हो गया था। नंदन इसी सिलसिले में पाठक जी से मिलना चाहते थे।


सुबह करीब ११ बजे थे जब एक मोटरसाइकिल के बाहर रुकने की आवाज़ आयी। विजय पाठक जी के ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ जहां पाठक जी बैठे अखबार पढ़ रहे थे।

"प्रणाम अंकल जी!" , पाठक जी के चरण स्पर्श करते हुए विजय ने कहा।

पाठक जी ने आशीर्वाद देते हुए सुखद आश्चर्य से पूछा "अरे विजय!!.....तुम सुबह-सुबह यहां?"

"जी, आंटी जी ने बुलाया था, कुछ बात करनी थी शायद। मैं पार्टी दफ्तर निकल रहा था तो इधर आ गया" विजय ने सदाबहार मुस्कराहट के साथ जवाब दिया। इतने में रजनी देवी जी आ गयीं, विजय ने बढ़ कर उनके पैर छुए "प्रणाम आंटी जी! "

आशीष देते हुए रजनी देवी ने हॅंसकर कहा "आओ विजय, बैठो। ......ईद के चाँद हो गए हो तुम तो ?.....दिखते ही नहीं?" पाठक जी चुप-चाप उन दोनों के चेहरे देख रहे थे।

सोफे पर बैठते हुए विजय ने कहा "नहीं आंटी जी, आपके लिए तो हम हमेशा तैयार हैं। बीच में ३-४ दिन यूनिवर्सिटी जाना पड़ गया था किसी काम से, फिर कल मेजा की तरफ गया था, अगले २-१ दिन में निंदौरा की तरफ भी जाऊंगा। "

पाठक जी ने बीच में कहा "हाँ, सुना है कुछ किसानों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है वहाँ पर?"

विजय ने कहा "सुना हुआ है मैंने भी, जाऊंगा एक बार देखने। " फिर उसने रजनी देवी से पूछा "जी, कहिये आंटी जी, कैसे याद किया?" रजनी देवी ने कहा "अरे बताती हूँ, ऐसी भी क्या जल्दी मची है? ......पहले बोलो चाय या कॉफ़ी?"

"चाय"

रजनी देवी ने २ फीकी और एक मीठी चाय बनाने को नौकर से कहा।

पाठक जी अब रजनी देवी की तरफ ध्यान से देख रहे थे।

रजनी देवी ने गंभीर स्वर में बोलना शुरू किया "देखो विजय, अब जानते तो हो ही तुम, वैभव के बारे में सब.......मैं दरअसल ये चाहती हूँ कि तुम उसको अब अपने साथ रखो , उसको भी अपने साथ ले जाओ जहां तुम जाते हो , जिन लोगों से मिलते हो, उनसे मिलाओ, लोगों से जुड़ना सिखाओ, उनकी बातें सुनना और उनकी समस्याओं का समाधान कैसे किया जाये, ये समझाओ। "

विजय और पाठक जी उनकी ओर देख रहे थे। इतने में चाय आ गयी। नौकर ने तीनों चाय अलग करके रख दी।

रजनी देवी ने बोलना जारी रखा " मैं जानती हूँ , तुमसे या किसी से भी यह कहना उचित नहीं है। वैभव बच्चा नहीं है जो कोई उसको कुछ सिखाये ,........लेकिन वो तुम्हारा बड़ा भाई जैसा है,.......और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि छोटा भाई , बड़े से ज़्यादा बेहतर होता है और बड़ा भाई ,छोटे से सीखता है। "

विजय ने चाय पीते हुए कहा "आंटी जी, आप परेशान न हों, अगर वैभव भाई की मर्ज़ी हो, और वो ठीक समझें तो वो बिलकुल मेरे साथ चल सकते हैं...... बल्कि मैं १-२ दिन में निंदौरा जाऊंगा, मैं चाहता हूँ कि वैभव भाई भी हमारे साथ चलें , हमें बहुत खुशी होगी। "

विजय ने आगे रखे टेलीफोन की तरफ इशारा करके कहा " आंटी जी , फोन इधर दीजियेगा , वैभव भाई से मैं अभी बात करता हूँ। "

रजनी देवी ने फोन का तार खींच कर आगे रखा , विजय ने वैभव के ऑफिस का नंबर मिलाया। शायद ऑफिस के नौकर ने उठाया था फोन--

"हैलो!!"

"हैलो, मैं पार्टी ऑफिस से विजय बोल रहा हूँ, वैभव भाई हैं क्या?"

"नहीं, साहब तो नहीं हैं। "

"कहाँ गए हैं?"

"बता कर नहीं गए हैं........आप बताइये, कुछ बात है तो जब वो आएंगे मैं बोल दूंगा। "

"नहीं, आप उनको यही बोलियेगा कि पार्टी ऑफिस से विजय का फोन था। "

"जी, अच्छा। "

फिर विजय ने फोन काट दिया। पाठक जी ने अखबार खोल कर उसमे मुँह धँसा लिया।

विजय ने खड़े होते हुए कहा "आप वैभव भाई को कह दीजियेगा आंटी जी , वो चल देंगे हमारे साथ,.....अच्छा मैं चलता हूँ, प्रणाम!" फिर विजय ने दोनों हाथ जोड़ लिए। फिर पाठक जी के भी पैर छू कर विदा ली।

विजय घर से बाहर निकल रहा था और गीतिका हाथों में फाइलें दबाये घर के अंदर आ रही थी। गेट पर ही मुलाक़ात हुई दोनों की। गीतिका ने हॅंसकर कहा "...बड़ी तेज़ी में विजय बाबू !.....कहाँ की गाड़ी छूट रही है?......पुराने दोस्तों का तो ख़याल ही नहीं रहा तुम्हें?

मुस्कुराते हुए विजय ने कहा "नहीं ऐसा नहीं है। तुम्हे तो मैं हमेशा याद करता हूँ,.......हाँ, मिलना ज़रूर मुश्किल से होता है क्योंकि मैं वकील नहीं हूँ न?"

गीतिका ने हॅंसकर पूछा "इधर का रास्ता कैसे भूले आज?"

"ख़ास कुछ नहीं ऐसा, आंटी जी ने बुलाया था, चाय पीने के लिए , और कुछ बात करने के लिए,....अच्छा मैं निकलता हूँ , पार्टी ऑफिस पहुंचना है। "

फिर दोनों ने दुआ-सलाम किया ,और गीतिका अंदर चली गयी जबकि विजय अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट कर पार्टी ऑफिस कि ओर निकल गया।


एक मोटरसाइकिल मम्फोर्डगंज की सड़कों पर अपना रास्ता बनाते हुए जा रही थी। एक मोटा सा मोटरसाइकिल-सवार बैठा था उस पर, मुँह पर गमछा लपेटे हुए और आँख पर काला चश्मा चढ़ाये। कई छोटी, तंग , घुमावदार गलियों से गुज़रती हुई वह मोटरसाइकिल एक पुराने से, गंदे से दिखने वाले घर के सामने जा कर रुकी। आस-पास ऐसे ही कुछ मकान थे, और ज़्यादा लोगों का उधर आना-जाना भी नहीं था जबकि वैसे मम्फोर्डगंज ,अकबराबाद का काफी संभ्रांत और नामी मोहल्ला था। वह घर वास्तव में एक होटल था जिस पर मालिक ने बोर्ड वगैरह कुछ लगा नहीं रखा था। मोटरसाइकिल स्टैंड पर खड़ी कर के वह मोटा आदमी उस घर के अंदर गया और सीधे रिसेप्शन काउंटर पर पहुंचा। बिना कुछ बोले उसने ५०० रुपये का एक नोट निकाल कर काउंटर की मेज पर रखा। काउंटर पर बैठे आदमी ने पहले अपने फोन से कोई नंबर मिलकर कहा "हाँ, वह आ गए हैं " फिर उस ने उस नकाबपोश से केवल इतना कहा "दो सौ एक। " फिर वह मोटा आदमी होटल के अंदर की अँधेरी , सीलन भरी सीढ़ियों पर अकेले चढ़कर ऊपर के फ्लोर पर कमरा नंबर २०१ के सामने पहुंचा। उसने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से किसी महिला की आवाज़ आयी " कौन है ?" इसने झल्लाकर कहा "अरे यार हम हैं , खोलो जल्दी। " उस महिला ने दरवाज़ा खोला। ये आदमी जल्दी से अंदर दाखिल हुआ और तेज़ी से दरवाज़ा बंद कर दिया। फिर इसने उस महिला को खुशी से गोद में उठा लिया और नाचने लगा , वह महिला भी हँस रही थी "अरे......पागल हो गए हो क्या?......उतारो यार मुझे......" वह आदमी नाचते हुए बिस्तर के पास पहुंचा और उस महिला को बिस्तर पर फेंक दिया और खुद उछलकर बिस्तर पर उस महिला के बगल गिर पड़ा। फिर उस महिला के ऊपर लेटते हुए उसे अपनी बाहों के घेरे में जकड़ कर उल्लासित स्वर में अपना गमछा और चश्मा उतारते हुए वैभव बोला "हाँ यार ! पागल ही हो जाता हूँ मैं तुमसे मिलकर,.......छाया , तुमसे मिलकर ऐसा लगता है कि थोड़ी देर के लिए ही सही , मगर मैं आज़ाद और, अपनी मर्ज़ी का मालिक हूँ।" ये कहते हुए उसने छाया के चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। छाया ने हॅंसकर कहा "क्यों?......अपनी ही तो मर्ज़ी के मालिक हो तुम वैभव पाठक,.....तुम्हारे आगे किसकी मर्ज़ी चल सकती है?...पूरे अकबराबाद को पता है ये, अकबराबाद के भावी सांसद महोदय!" वैभव ने कहा "अरे नहीं!.......काहे का सांसद? ये लोगों की ग़लतफ़हमी है.....असलियत ये है कि मैं अपने घर में ग़ुलामों जैसा रहता हूँ। लगातार उन बुड्ढा-बुड्ढी की नज़र में रहता हूँ,....... हमेशा उन के भाषण सुनता रहता हूँ कि ये मत करो, वो मत करो.......ऐसा करो, वैसा करो.......तंग आ चुका हूँ मैं उस नरक से। तुम्हारी बाहों में आकर मुझे पता लगता है कि मेरा भी अपना वजूद है।" फिर उसके ऊपर से उतर कर वह बगल में लेट गया और बोला "वैसे, तुम्हारा अच्छा है यार, बुड्ढा-बुड्ढी का ऐसा कोई चक्कर नहीं है" छाया फिर मुस्कुरायी "बुड्ढा है तो लेकिन बड़ा एक्टिव है.....अक्सर काम-काज के लिए बाहर ही रहता है।" वैभव ने उसकी ओर देख कर कहा "और एक मेरे यहां बुड्ढा है, बीमार हो कर घर बैठ रहा है अब।" छाया ने कहा "बुड्ढा -बुड्ढी तो ठीक है,.... मैनेज भी हो जाता है, लेकिन तुम्हारे साथ अच्छी बात ये है कि बीवी और बच्चे नहीं रहते उस घर में , नहीं तो तुम मुझ से मिल नहीं सकते थे। मियां -बीवी में सवाल-जवाब मुश्किल हो जाता है। मेरे साथ तो दिक्कत है बहुत,......एक तो पति है, ऊपर से बेटी, सोचो कैसे-कैसे करके मिलती हूँ तुमसे। " वैभव ने हंसते हुए कहा "अरे तुम्हारा पति तो एक नंबर जोगी है,.....हमेशा ही बाहर रहता है।" दोनों फिर ज़ोर से हँसे और एक दूसरे में खो गए।

उस दिन वैभव शाम को जल्दी घर आ गया था। माँ-बाप के साथ रात का खाना खा कर ऊपर अपने कमरे में चला गया वह। लगभग एक घंटे बाद रजनी देवी भी उसके कमरे में आयीं। वह लेटा हुआ था, माँ को देख कर उठ के बैठ गया। बोला "अरे मम्मी , आप यहां चली आयीं, मुझे ही बुला लिया होता " रजनी देवी ने उसके बिस्तर पर बैठते हुए कहा "नहीं , तुमसे करनी थी कुछ ज़रूरी बात, इसलिए आ गए हम"

"जी, बोलिये,....क्या हुआ?"

"यही तो समस्या है कि कुछ हो नहीं रहा है " रजनी देवी कुछ गुस्से में बोलीं।

"मतलब?"

"मतलब ये कि तुम्हारी आदतों में थोड़ा भी सुधार नहीं हो रहा है, और तुमको कुछ दिख नहीं रहा है कि इसका नतीजा कितना बुरा हो सकता है हम सभी के लिए "

वैभव सुन भी रहा था और नहीं भी।

"तुमको समझ में नहीं आ रहा है कि २० महीने में लोकसभा चुनाव हैं, पूरी संभावना है कि तुम्हारे पापा इस बार लड़ेंगें नहीं, ऐसे में ये शहर की सीट पर लोगों की नज़र है। जबकि हम लोग चाहते हैं कि यह सीट हमारे ही परिवार में बनी रहे.........लेकिन ऐसा लगता है कि तुम्हे इस बात से कोई मतलब नहीं हैं। तुम हॉस्टलों और होटलों में सिर्फ शराब , और अपनी ठरक मिटाने के पीछे ही पागल बने रहो।"

चुप ही था वैभव।

"अरे लोगों से वोट लेना है अगर तो उनके पीछे जाना पड़ता है, उनके आगे अच्छा दिखना पड़ता है , उनके लिए काम करता हुआ दिखना पड़ता है, भले ही दिखावटी ही सही लेकिन ये करना पड़ता है,.....लेकिन तुम कुछ दूसरी चीज़ों के पीछे ही भाग रहे हो। अपने बाप का नाम लेकर शहर भर में कुकर्म करते फिरते हो, अगर ये चुनाव तुम लड़ोगे तो सोचो वोट किस बात पर मागेंगे हम लोग?"

वैभव सुन रहा था।

"और वैसे भी , इस सीट पर कई लोग तैयारी कर रहे हैं, जैसे वो कृष्णा बाबू का लड़का ,विजय,....सुना है कि पार्टी के काफी ज़्यादा लोग ये चाहते हैं कि इस सीट से वही चुनाव लड़े,......और सबसे ख़राब बात, कि तुम्हारे पापा के दिमाग में उस नामुराद गीतिका का भी नाम चल रहा है।"

वैभव ने गुस्से में कहा "गीतिका को कैसे मिल जाएगी सीट?"

"अरे गधे!.....केवल गीतिका ही नहीं, विजय भी है.....और क्यों नहीं मिलेगी सीट उसको?.....तुम्हारे करम कोई इतने अच्छे तो हैं नहीं कि लोग तुमको वोट दें। लोगों की नज़र में तुम एक नंबर के घटिया आदमी, और चरित्रहीन, व्यभिचारी इंसान हो,.....एक भी अवगुण तुमसे बाकी है भी तो नहीं " रजनी देवी झल्लाकर बोलीं।

फिर वैभव ने कहा "तो क्या करूँ मैं?"

"अपने चाल-चलन में सुधार करो, जिस से लोगों के बीच तुम्हारी छवि बदल सके। पार्टी के कामों में ज़्यादा समय दिया करो, पार्टी दफ्तर ज़्यादा जाया करो.......अपने पापा के क्षेत्र में लोगों से मिला करो , उनकी समस्या सुनो,.....और ये सब करने का ज़्यादा वक़्त नहीं है, सिर्फ २० महीने हैं तुम्हारे पास।"

वैभव सुन रहा था।

"....और सबसे ज़रूरी बात, विजय के साथ अपना समय ज़्यादा बिताओ। जो कुछ मैं तुमसे करने को कह रही हूँ, ये सब वह पिछले २ साल से लगातार कर रहा है। तुम उसके साथ अगर रहोगे तो ये समझ पाओगे कि अपने पापा की ये सीट तुम कैसे बचा पाओगे। मैंने विजय से बात की है, वो अगले २-३ दिन में निंदौरा जाएगा वहाँ के किसानों से मिलने,....तुम भी जाओ उसके साथ , तुम भी मिलो किसानों से, उनसे बात करो, क्योंकि वोट वहीं से आना है।"

"जी"

फिर रजनी देवी उसको समझाते हुए बोलीं "बेटे , पापा ने अपनी राजनीतिक विरासत बड़ी मेहनत से तैयार की है इतने सालों में, किसके लिए?...तुम्हारे लिए ही तो? अगर तुम ही इसे संभाल नहीं पाए तो इतने सालों की मेहनत का फायदा कोई और लूट कर ले जायेगा,....इसलिए मेरी बात पर ध्यान दो और चुनाव तक अपने-आप को संभाल लो।"

वैभव ने हामी भरी "जी ठीक है, मैं विजय के साथ जाऊंगा निंदौरा , मिलूंगा वहाँ पर लोगों से।" उसका चेहरा देख कर और उसकी आवाज़ सुनकर, शायद माँ को लगा कि बेटे को पहली बार डर लगा है।

"चलो अच्छा , मैं चलती हूँ, लेकिन मेरी बात का ध्यान रखना बेटा" ये बोलकर माँ ने बेटे का माथा चूमा और कमरे से निकल गयीं।


दिल्ली में औरंगज़ेब मार्ग स्थित पार्टी मुख्यालय पर पार्टी कार्यकारिणी की मीटिंग शुरू हो चुकी थी। पाठक जी, कृष्णा बाबू , उज्जवल सिंह आदि वरिष्ठ नेता कमरे में एक ओर फर्श पर बिछे मोटे गद्दे पर, मसनदों के बीच में बैठे थे। बाकी नेता गद्दों पर सामने बैठे थे। बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और टिकटार्थी बाहर थे। अंदर सभी सीटों पर राजनीतिक समीकरणों और संभावित उम्मीदवारों पर चर्चा हो रही थी। पार्टी के कई नेता अपने साथ सिफारिश करने वालों की लिस्ट भी लाये थे। एक लिस्ट की काट के लिए दूसरी लिस्ट रखी जा रही थी। हर एक ज़िले, विधान सभा क्षेत्र, ब्लॉक तक का विश्लेषण किया जा रहा था सिवाय एक सीट को छोड़कर। उस सीट पर कोई भी बात नहीं कर रहा था या यूँ कहें कि करना नहीं चाह रहा था। लेकिन कब तक बात नहीं होती? आखिरकार पाठक जी ने ही नाम लिया "अकबराबाद शहर केंद्रीय,......अब इस पर अपनी राय दीजिये।" कमरे में सन्नाटा पसर गया। कुछ समय के बाद उज्जवल सिंह ने कहा "इस पर राय तब रखें जब हमें पता हो कि आप वहाँ से लड़ रहे हैं या नहीं?...अगर आप ही खड़े हों वहाँ से तब तो कोई राय की ज़रूरत नहीं है।" पार्टी नेताओं ने अपना मौन समर्थन व्यक्त किया। फिर पाठक जी ने कहा "थोड़ी देर के लिए मान लीजिये कि मैं नहीं लड़ रहा हूँ....अब?" सभी वरिष्ठ और कनिष्ठ नेताओं ने फिर से चुप्पी साध ली थी। पाठक जी तीक्ष्ण निगाह से उनके चेहरों को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। उनको बड़ा झटका लग चुका था। उनकी बड़ी उम्मीद थी कि ऐसा बोलते ही सभी नेता एक स्वर में वैभव का नाम लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं कुछ। वैभव का नाम कोई लेना नहीं चाहता था, और उसके पार्टी में समर्थक बहुत कम, न के बराबर ही थे, साथ ही और किसी का नाम पाठक जी के आगे लेने का जोखिम कोई उठाना नहीं चाहता था , इसलिए तनावपूर्ण चुप्पी छायी हुई थी।

पाठक जी इसे अब तक समझ चुके थे। वे बोले "अरे भाई!....आप लोग बोलिये तो सही, आप लोग पार्टी के आधार स्तंभ हैं, पार्टी के हित का सवाल है.....अभी तक जैसे हर सीट पर बात हो रही थी, इस पर भी आप लोग अपनी बात रखें। ......और ऐसा थोड़ी है कि ये चुनाव से पहले कार्यकारिणी की आखिरी मीटिंग है, अभी तो बहुत सी मीटिंग्स होंगी, बहुत सी चर्चाएं होंगीं। आप आराम से बोलिये।" कमरे में कुछ अस्पष्ट सी भनभनाहट शुरू हो गयी , जिसे सुन कर पाठक जी ने कहा "ऐसे नहीं, साफ़ स्वर में बोलिये, जिसे भी बोलना है।" और फिर से वे लोगों के चेहरे पढ़ने लगे। किसी ने अभी भी कुछ नहीं कहा। फिर पाठक जी ने कहा "अरे...मैं केवल चुनाव ही न लड़ने की बात ही तो कर रहा हूँ , ऐसा थोड़ी कहा कि मैं राजनीति से हट रहा हूँ,....या पार्टी के मामलों से हट रहा हूँ।" लोग अभी भी चुप थे।

अंततः पाठक जी ने कृष्णा बाबू की ओर मुखातिब होकर पूछा "चलिए कृष्णा बाबू, आप ही बोलिये कुछ। इन लोगों को लग रहा है कि ये कुछ बोलेंगे तो मैं खा जाऊंगा इनको। "

कृष्णा बाबू भी असल में पाठक जी की तरह ही लोगों के मन को टटोलने की कोशिश कर रहे थे, अपने बेटे विजय के लिए। वह भी सोच रहे थे कि क्या बोला जाये? जब पाठक जी ने उनसे कहा तो सभी की निगाह उन पर जा कर टिक गयीं। कृष्णा बाबू ही पाठक जी के आगे कुछ बोल सकते थे। कूटनीति में दक्ष कृष्णा बाबू ने कहा "पाठक जी, अगर आप वहाँ से लड़ते नहीं हैं तो मेरे ख्याल में हमारे आगे दो रास्ते हैं। एक तो ये कि किसी नए युवा नेता को वहाँ से लड़ाया जाये, जैसे वैभव या गीतिका बेटी,...क्योंकि उस सीट पर आप निरंतर जीत ही रहे हैं तो ऐसे में इन दोनों का रास्ता आसान होगा...." कृष्णा बाबू ने चालाकी से विजय का नाम नहीं लिया "....और दूसरा रास्ता ये कि किसी वरिष्ठ, विश्वस्त नेता को वहाँ से खड़ा किया जाये।"

पाठक जी ने फिर वहाँ मौजूद अन्य लोगों की ओर देखा, कहीं से कोई प्रतिक्रया नहीं आयी।

"अगर वैभव लड़े तो?" ,पाठक जी ने सबसे पूछा।

कमरे में फिर से भनभनाहट शुरू हो गयी। पाठक जी ने झल्लाकर कहा "अरे मुझसे भी बोलियेगा कोई?"

उज्जवल सिंह ने हिम्मत करके कहा "असल में....पाठक जी....वैभव बेटे के नाम पर थोड़ा विवाद है। अन्य नेता शायद डर से ये बात कह नहीं पा रहे हैं,.....जनता के बीच वैभव की छवि, दरअसल पार्टी के लिए चिंता की बात है।"

पाठक जी जो नहीं सुनना चाह रहे थे , उन्होंने वह सुन ही लिया था।

फिर एक अन्य नेता की आवाज़ आयी "पाठक जी, अगर वैभव जी की जगह गीतिका जी या विजयराज जी को उतारा जाये तो हमें ज़्यादा लाभ होगा,....उन दोनों की लोकप्रियता काफी अधिक है, पार्टी कार्यकर्ताओं में भी और आम जनमानस में भी।"

कृष्णा बाबू ने चालाकी से अपनी मुस्कराहट को जज़्ब कर लिया।

पाठक जी ने फिर कृष्णा बाबू से पूछा "...कहिये कृष्णा बाबू?"

"मेरे ख्याल से अभी गीतिका और विजय , या वैभव को भी समझ लें,....ये तीनों काफी युवा हैं और शायद सांसदी जैसे काम का बोझ उठाने के लिए अभी पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। इन्हे थोड़ा और वक़्त,थोड़ा और राजनीतिक अभ्यास की ज़रूरत है....इस सन्दर्भ में इन्हे विधायकी के साथ कुछ और काम भी दिया जाना चाहिए जिस से ये अगले आम चुनाव तक सांसदी के लिए तैयार हो सकें। तब तक किसी दूसरे वरिष्ठ पार्टी नेता को सांसद बना कर भेजा जा सकता है, इस बीच इन तीनों के काम का समय-समय पर आकलन किया जाता रहेगा। इस से आगे के लिए पार्टी को मदद मिलेगी, .....और वैसे भी हम जानते हैं कि हमारे नेता पाठक जी ने भी शुरुआत विधायकी से ही की थी , तब जाकर वह आज इतने प्रभावशाली और सफल राजनीतिज्ञ हैं।" कृष्णा बाबू ने कमरे में मौजूद अन्य नेताओं की ओर मुँह करके कहा।


पाठक जी कृष्णा बाबू को देख रहे थे और उनके इस कथन का अर्थ समझने की कोशिश कर रहे थे। कृष्णा बाबू अभी भी अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया सुनना चाह रहे थे।


कमरे में मौजूद दूसरे कई लोगों ने 'हाँ' में सिर हिलाया। पाठक जी ने उन्हें देख कर कहा "स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आ रही है।" फिर उन्होंने पूछा "...कोई और दूसरा विचार?" फिर कोई आवाज़ नहीं आयी। फिर पाठक जी ने कृष्णा बाबू और उज्जवल सिंह जी से पूछा "विधायकी के साथ इन्हे और कौन से काम दिए जाने चाहिए?" उज्जवल सिंह ने कहा "पाठक जी , इनमे से किसी एक को, मेरे ख्याल से गीतिका बेटी को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष पद दिया जा सकता है। वास्तविक बागडोर आप अपने ही हाथ में रखिये, और आप को भी जनता के बीच समय-समय पर सक्रिय रहना होगा , क्योंकि आपकी ताकत के बिना इन तीनों को भी जनता का विश्वास नहीं मिलेगा।"

कृष्णा बाबू ने कहा "सोलह आने सही कह रहे हैं उज्जवल बाबू।" बाकी लोगों ने भी इसे सही बताया , इस बार एक स्पष्ट प्रतिक्रिया आयी थी।

पाठक जी को अंदर एक फीकी सी ख़ुशी ये सोच कर हुई कि पार्टी को अब भी उन्ही का नेतृत्व सर्वमान्य है, और भविष्य का पार्टी अध्यक्ष पद उन्ही के घर में रहेगा। लेकिन बड़ा दुःख यही हो रहा था कि वैभव को पार्टी अध्यक्ष पद के लायक भी नहीं माना जा रहा था।

उनके अंदर तब और बड़ा काँटा चुभा जब एक दूसरे नेता ने हिम्मत करके कहा "विजय जी को पार्टी उपाध्यक्ष और प्रचार समिति का इंचार्ज बनाया जा सकता है। यूनिवर्सिटी में तो वह उपाध्यक्ष रहे भी हैं और किसी विषय पर बिलकुल सटीक, तार्किक जानकारी और प्रस्तुतीकरण करने में तो उनको महारथ है।" इस बार कमरे में मौजूद लगभग सभी ने हाथ उठाकर पहले से भी स्पष्ट प्रतिक्रया दी थी। पाठक जी का सालों का सपना, उनका अरमान चूर-चूर हो चुका था। वैभव का कहीं नाम भी नहीं आया था। उनका दिल रो रहा था। परन्तु, उन्होंने अपनी भावनाओं को कतई ज़ाहिर नहीं होने दिया।

कृष्णा बाबू अपनी इस छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण जीत से संतुष्ट थे। उन्हें यह टीस ज़रूर थी कि सांसदी के लिए विजय का नाम नहीं चल पाया। वरिष्ठ नेता को सांसद बनाने का प्रस्ताव उन्ही ने रखा था और उनको पता नहीं था कि इस पर आम सहमति बन जाएगी। कृष्णा बाबू की कूटनीति उनके बेटे पर ही भारी पड़ गयी थी। लेकिन उन्हें ख़ुशी इस बात की भी थी कि भविष्य के लिए मज़बूती से तैयार होने में पार्टी उपाध्यक्ष और प्रचार समिति के प्रमुख का पद अति लाभदायक सिद्ध हो सकता है और इसी बहाने विजय को मीडिया में भी अच्छा फुटेज ज़रूर मिलेगा।

दोपहर के खाने के लिए मीटिंग रोक दी गयी थी। पाठक जी मुख्यालय में बने अपने कमरे में आ गए थे।

वह काफी परेशान थे। उनका खाना कमरे में आ गया था और वह खाने पर बैठ गए थे, लेकिन मुँह से निवाला निगला नहीं जा रहा था। उनकी खाना खाने की इच्छा भी नहीं हो रही थी। उनके लड़के ने उनके आगे बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी थी। पार्टी के अंदर वैभव के पक्ष में कतई माहौल नहीं था। अब यदि जानबूझ कर, ज़बरदस्ती वह पार्टी के लोगों पर वैभव का नेतृत्व थोपते हैं, तो पार्टी में अराजकता, और असंतोष भड़क सकता है। इतनी साल की मेहनत से और बच्चे की तरह पाल-पोस कर खड़ी की गयी पार्टी के लिए, वह बहुत ज़्यादा बुरा होगा। फिर यदि पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की बात सुनते हैं तो अपने और रजनी देवी के अरमानों का गला घोंटना पड़ेगा, इसके अलावा कोई चारा नहीं होगा। पाठक जी को गीतिका के बारे में पार्टी कैडर की सहमति इतनी बुरी नहीं लग रही थी, जितनी विजय के नाम पर सहमति। पाठक जी को नज़र आ रहा था कि अब समय आ गया है जब विजय और कृष्णा बाबू के पर कतरने होंगे, वरना वैभव के आगे की राह मुश्किल हो जाएगी। वह कोई बीच का रास्ता निकालना चाहते थे कि पार्टी कैडर को नाराज़ किये बिना वैभव का हित साध सकें। यहां स्थिति ये थी कि इसे तय करने में वह कृष्णा बाबू की मदद भी नहीं ले सकते थे। उन्होंने तय किया कि "अगर वैभव का हित साधा नहीं जा सकता तो न सही , लेकिन विजय का रास्ता किसी भी हाल में अवरुद्ध करना ही होगा,........ हाँ, यही करना होगा।" यह निश्चय करके पाठक जी मीटिंग में वापस आये।

अब और दूसरी बातों पर मीटिंग में चर्चा हो रही थी तथा तेज़ी से काम निपटाए जा रहे थे। आज रात की ही अकबराबाद एक्सप्रेस से पाठक जी, कृष्णा बाबू और उज्जवल सिंह को वापस भी आना था। मीटिंग का आधिकारिक वक्तव्य तैयार किया जाने वाला था, जिसकी विषय वस्तु व भाषा तय की जा रही थी। काफी माथापच्ची के बाद आम सहमति बनी और पाठक जी ने हमेशा की तरह वक्तव्य लिखने के लिए सादा काग़ज़ कृष्णा बाबू की ओर बढ़ाया। कृष्णा बाबू भी लिखने के लिए तैयार बैठे थे, उन्होंने कागज़ ले लिया और सभी नेता पाठक जी की ओर देखने लगे। पाठक जी ने बोलना शुरू किया और कृष्णा बाबू ने लिखना, इसी क्रम में पाठक जी बोल रहे थे ".....उपरोक्त सभी बिंदुओं के अतिरिक्त अकबराबाद केंद्रीय सीट पर भी चर्चा हुई..." , तो कमरे में सभी लोगों ने बहुत ध्यान से सुनना शुरू कर दिया था।

"...इस बात पर आम सहमति बनी है कि अपनी स्वास्थ्य दशाओं के कारण पार्टी अध्यक्ष श्री बिंध्येश्वरी प्रसाद पाठक आगामी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे,तथा इस सीट से पार्टी के वरिष्ठ नेता व झूंसी-जगतपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक, श्री उज्जवल सिंह जी पार्टी के उम्मीदवार होंगे। साथ ही यह भी तय किया गया है कि प्रभावशाली युवा नेता श्रीमती गीतिका पाठक जी पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष अगले लोकसभा चुनाव तक के लिए नियुक्त की जाएँगी ,तथा झूंसी-जगतपुर विधानसभा सीट से विधानसभा उपचुनाव होने की स्थिति में पार्टी की उम्मीदवार होंगी, और इस दौरान संस्थापक अध्यक्ष श्री बिंध्येश्वरी प्रसाद पाठक जी अपने पद पर बने रहेंगे तथा महत्त्वपूर्ण निर्णयों में अपनी भूमिका का निर्वहन करते रहेंगे। इस बात पर भी आम सहमति हुई कि पार्टी के सर्वाधिक लोकप्रिय ,ऊर्जावान व सक्षम युवा नेता श्री विजयराज मिश्रा को पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया जायेगा,......." , कृष्णा बाबू लिखते जा रहे थे और प्रतीक्षा कर रहे थे कि गीतिका की तरह विजय के लिए भी विधानसभा चुनाव की उम्मीदवारी और उपाध्यक्ष पद की घोषणा की जाएगी , लेकिन अंत तक पाठक जी ने ऐसा कोई कथन नहीं बोला। अब तक कृष्णा बाबू की ख़ुशी काफूर हो चुकी थी और उनका चेहरा उतर चुका था। औपचारिकता निभाने के लिए अंत में पाठक जी ने सबसे पूछा "...कहीं कुछ छूट तो नहीं गया है?" , किसी ने भी कुछ नहीं कहा। पाठक जी ने कृष्णा बाबू की ओर हाथ बढ़ाया जिस पर बड़े दुखी मन से कृष्णा बाबू ने वक्तव्य रख दिया और केवल इतना बोले "...जी बिलकुल ठीक है।" जिस तरह से अपनी ख़ुशी को वह जज़्ब कर गए थे, उसी तरह से अपनी तकलीफ को भी चेहरे पर रत्ती भर भी न आने दिया। पाठक जी अपना खेल दिखा चुके थे।


उस दिन सुबह लगभग १० बजे पार्टी ऑफिस से विजय ने पाठक जी के घर फोन किया था जिसे रजनी देवी ने उठाया।

"हैलो!"

"हाँ बेटा विजय, बोलो"

"आंटी जी ,मैं निंदौरा जा रहा हूँ , मैंने सोचा वैभव भाई अभी तो घर पर ही होंगे, अपने दफ्तर गए नहीं होंगे, इसलिए फोन किया। आप भेज दीजिये उनको, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ अपने साथियों के साथ यहां पार्टी ऑफिस पर।"

"बेटा वह तो निकल गया यहां से, रुको थोड़ी देर , मैं उसके ऑफिस फोन कर के उसको कहती हूँ।"

रजनी देवी ने फोन काट कर फिर वैभव के ऑफिस फोन किया जो हमेशा की तरह उसके किसी नौकर ने ही उठाया।

"हैलो!"

"मैं पाठक जी के यहां से रजनी देवी बोल रहीं हूँ,....वैभव कहाँ है?"

"कहीं बाहर निकले हैं मैडम , बोले थे कि एक-डेढ़ घंटे में आएंगे।"

ये सुनते ही रजनी देवी समझ गयीं थीं कि उनकी और पाठक जी की सारी मेहनत बर्बाद होनी है। फिर उन्होंने खिन्न मन से फोन काट दिया। कुछ देर बाद पार्टी ऑफिस फोन मिलाया और फोन उठाने वाले से केवल इतना कहा "विजय को कहना, वह निकल जाये,....वैभव नहीं जा पायेगा " , और फोन रख दिया।

वैभव शाम को जब आया तो रजनी देवी ने उसके कमरे में जा कर उस से खूब बहस की, लेकिन शराब के नशे में वह धुत्त था; कितना सुना, कितना नहीं सुना, पता नहीं।


अगली सुबह ६:३० बजे, अकबराबाद एक्सप्रेस अपने गंतव्य पर पहुंची। गाड़ी आने से पहले ही, रात के टीवी समाचार और सुबह के अखबारों से दिल्ली की मीटिंग की पूरी खबर अकबराबाद पहुँच चुकी थी। रजनी देवी रात से ही अत्यंत दुखी थीं, रात का भोजन भी नहीं किया था और पूरी रात सोई भी नहीं थीं। सुबह ७:३० बजे पाठक जी अपने घर में दाखिल हुए। नित्य क्रिया के बाद बहुत हल्का सा नाश्ता किया और सोने चले गए। रजनी देवी ने भी उनके साथ ही नाश्ता किया लेकिन ज़्यादा कुछ बात नहीं की , केवल डॉक्टर को दिखाने के बारे में ही पूछा।

दोपहर के खाने के कुछ पहले पाठक जी सो कर उठे। ड्राइंग रूम में आकर बैठे और पढ़ने के लिए सामने पड़े ३-४ अखबारों में से एक उठाया। मोटे अक्षरों में खबर पढ़ी "श्रमशक्ति पार्टी में व्यापक बदलाव, बिंध्येश्वरी पाठक के बिना चुनाव लड़ेगी पार्टी " , कुछ देर बाद दूसरा उठाया " श्रमशक्ति पार्टी ने दी युवाओं को महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी " ,फिर तीसरा उठाया " राश्रपा का बड़ा फैसला, गीतिका पाठक होंगी कार्यकारी अध्यक्ष , लड़ेंगीं विधानसभा चुनाव " इस तरह से पाठक जी ने देखा कि पार्टी गतिविधि को काफी प्रमुखता से मीडिया में जगह मिली है। अब तक रजनी देवी भी वहाँ आ गयीं थी, जिनका चेहरा देख कर कोई भी आसानी से बता सकता था कि वह अवसाद के सागर में डूबी हुई हैं। पाठक जी की स्थिति कोई बहुत अलग नहीं थी लेकिन उसको अपने भावों को छुपाना आता था।

पाठक जी ने उनको देखते हुए बैठ जाने का इशारा किया "बहुत कोशिश की हमने रजनी, लेकिन ऐसा लगता है कि पार्टी में छोटे से बड़ा तक , कोई भी वैभव को किसी पद पर देखना नहीं चाहता है। उनको लगता है कि वैभव की छवि, पार्टी के लिए चुनावों में आत्मघाती सिद्ध होगी।"

रजनी देवी चुप बैठी रहीं।

पाठक जी ने फिर पूछा "वैभव गया था विजय के साथ निंदौरा ?"

अब रजनी देवी का धैर्य जवाब दे गया था और वह ज़ार-ज़ार रोने लगीं।

पाठक जी भी समझ गए थे अब, उन्होंने कहा "छोड़िये रजनी, जब किस्मत में ऐसी ही औलाद लिखी हो तो क्या कर सकते हैं?"

रजनी देवी बोलीं "कर तो आप बहुत कुछ सकते थे। "

पाठक जी हतप्रभ रह गए "अरे!....मैं क्या करता?.....वैभव का नाम जितनी बार लिया, कोई कुछ बोला ही नहीं, वहीं विजय और गीतिका पर तो लोगों ने हाथ उठाकर जवाब दिया।"

"पाठक जी , आपका लड़का है वो, आपका अपना खून , हमारे घर का चिराग " , रजनी देवी अब बेहद गुस्से में थीं। "अरे आपकी अपनी पार्टी है पाठक जी, आप ही से शुरू और आप ही से ख़त्म,......वहाँ आपको सवाल नहीं पूछना था , वहाँ आपको हुक्म देना था, ...किसकी औक़ात थी कि आपके ही हुक्म को मानने से मना कर देता? आप बहुत बड़ी गलती कर के आ गए पाठक जी।" फिर कुछ देर बाद बोलीं "आखिर उस गीतिका को आपने टिकट दिलवा ही दिया, एक गंदे खून को आपने इनाम दिलवा दिया और अपने सगे खून के साथ इतनी दग़ा?"

पाठक जी भी तैश में आ गए "गलत बोल रहीं हैं रजनी जी आप। भगवान जानता है, पूरी ताक़त लगाई थी हमने वैभव के पीछे, लेकिन ये कमीना ......इतने सालों से ये जैसे का तैसा ही है। आप देखिये ,निंदौरा भी नहीं गया ये......यही सब करके इसने अपनी और अपने घर की लुटिया डुबो दी। गीतिका की वजह से कम से कम अपने हाथ में तो है पार्टी। ये सूअर, अपने पैरों पर ठीक से खड़ा भी नहीं हो सकता, इतनी शराब पीता है ये.......नीयत का कच्चा , चरित्रहीन आदमी......"

रजनी देवी बीच में ही चीख उठीं ".....तो क्या हुआ , जैसा बाप वैसा बेटा, बाप के ही तो नक़्शेकदम पर चल कर नाम रोशन करेगा न!"

पाठक जी बहुत गुस्से में थे लेकिन गुस्से को अपने भीतर ही रखा। रजनी देवी की आवाज़ सुनकर नौकर भी आ गए थे, जिन्हे पाठक जी ने वापस भेजा। रजनी देवी अपने कमरे में चली गयीं।


विजय और छाया के साथ कृष्णा बाबू अपने घर में नाश्ता कर रहे थे, और गंभीरता से कुछ सोच रहे थे। छाया ने पूछा "क्या हुआ पापा?"

"कुछ नहीं बेटा ,.....पाठक जी चाल खेल गए। "

फिर उन्होंने सारी बात दोनों को बताई।

उन्हें सुनकर छाया ने कहा "मैंने तो इनसे पहले ही कहा था। दिस इज़ द बेसिक कैरेक्टर ऑफ़ डर्टी , ब्लडी पार्टी पॉलिटिक्स।"

"मुझे लगा था कि उपाध्यक्ष का पद और विधायकी तो विजय को मिलेगी ही। पार्टी में सारे लोग इस बात से राज़ी थे। लंच तक ठीक था सब , लंच के बाद पता नहीं पाठक जी के दिमाग में क्या आया होगा?"

छाया ने कहा "सीधी बात है पापा , इनके आगे बढ़ने का मतलब है कि वैभव का क़द गिर जाना, इसलिए उन्होंने इन्ही पर वार कर दिया "

विजय ने मुस्कुराकर कहा "पापा , आप ही तो कहते हैं कि राजनीति में ऊपर चढ़ने में समय ज़्यादा लगता है......तो जो लग रहा है, वो लगने दीजिये। आप ने ही तो कहा था कि सोना जितना तपता है, उतना ही निखरता है, और वैसे भी प्रचार समिति के प्रमुख के तौर पर मेरी सक्रियता तो बढ़ ही जाएगी अब, तो जो काम पार्टी ने दिया है, ढंग से वह करता हूँ , बाकी मैं ज़्यादा नहीं सोचता। "

"देखा पापा!, इनका यही तरीका शुरू से है......इसीलिए आज ये हालत हुई है।" छाया ने बीच में बोला।

कृष्णा बाबू ने कहा "देखो विजय, तुम्हारी बात अपनी जगह ठीक है, लेकिन ये हुआ तो गलत ही है। किसी को पीछे छोड़ना हो, तो अपना क़द ऊँचा करना चाहिए, न कि किसी के सिर पर पैर रख कर ऊपर बढ़ना चाहिए। वैभव नालायक है, लेकिन ये मतलब तो नहीं कि तुम्हें दबाया जाये।"

छाया ने कहा "इनसे मैंने यही कहा था , मगर जब ये सुनें तब तो ?" फिर छाया बोली "मैं तो ये कहती हूँ कि अब इन्हे ये निंदौरा जैसी फ़ालतू की दौड़-भाग बंद करनी चाहिए। कुछ नहीं रखा इनमें,....बहुत हुआ सम्मान!"

कृष्णा बाबू चुप रहे।

विजय ने कहा "यार मैं ये दौड़-भाग पार्टी में किसी पद के लालच में नहीं करता हूँ.....ये मुझे संतुष्टि देता है इसलिए करता हूँ। हम यहां बैठ कर जो भी कुछ खा-पी रहे हैं, ये कहाँ से आता है? ये वहीं से आता है न!........आज़ादी के करीब ५० साल पूरे होने चले हैं, फिर भी आज भी वो लोग इतनी तकलीफ में हैं, क्यों?.....बस यही देखने समझने मैं वहाँ जाता हूँ कि जो भी थोड़ा-बहुत मेरी वजह से उनकी स्थिति सुधर सके, तो मेरे लिए बहुत होगा। इसका पार्टी से नहीं मतलब , मैं किसी और पार्टी में होता तो भी यही करता। ये इत्तेफ़ाक़ है कि मेरी पृष्ठभूमि राजनीतिक है, मेरे पिताजी विधायक हैं, और हमारी पार्टी यहां सत्ता में है.....देखो तो इस वजह से भी हमारी ज़िम्मेदारी तो बढ़ ही जाती है। "

छाया को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

अंत में कृष्णा बाबू बोले "..फिर भी विजय, अपने आँख-कान खुले रखना भी बहुत ज़रूरी है....बहूरानी ठीक कह रही है, कहीं फ़ालतू जाने की ज़रूरत नहीं है। " कृष्णा बाबू क्षुब्ध थे, ये साफ़ दिख रहा था।

विजय हैरान था, कृष्णा बाबू ने आज तक उसे इस तरह से कभी नहीं रोका था।


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