Ashish Dalal

Tragedy


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Ashish Dalal

Tragedy


रिसते घाव (भाग-२)

रिसते घाव (भाग-२)

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अपने घर से करीबन आधे घण्टे का सफर तय कर राजीव जब अपनी बहन के घर पहुँचा तो उनके घर के आसपास पड़ोसियों की भीड़ पहले से जमा हुई थी। जनवरी की उतरती ठण्डी में घर के बाहर आस पड़ोसी अलाव सुलगाकर उससे निकलती गर्मी के आसरे हाथ सेंकते हुए बैठे आपस में बातें कर रहे थे।

राजीव को आया देख वहाँ से उठकर एक सज्जन उसके पास आये। राजीव को उन्हें पहचानने में एक पल की भी देरी न लगी। उस सज्जन ने राजीव को इशारे से कुछ कहा और राजीव रागिनी और आकृति को लेकर उस सज्जन के पीछे पीछे घर के अन्दर दाखिल हुआ। राजीव को आया देख श्वेता अपनी मम्मी के पार्थिव शरीर के सिरहाने से उठ खड़ी हुई और राजीव से लिपटकर रोने लगी । राजीव अपनी आँखों से उमड़ते हुए आंसूओं को काबू में न रख सका और उसकी भी रुलाई फूट पड़ी। तभी वहाँ सुरभि की मृत देह के आसपास बैठी महिलाओं में से एक महिला खड़ी होकर श्वेता को समझाने लगी। तभी रागिनी ने आगे बढ़कर राजीव को सम्हाला और फिर श्वेता को समझाकर वापस नीचे बिठा दिया। राजीव वहीं खड़े खड़े कुछ देर अपनी मृत बहन के निस्तेज हो चुके चेहरे को निहारने लगा। रागिनी ने अपनी ननद के पैरों को छुआ और माथा टिकाकर फिर उनके पैरों के समीप ही बैठ गई। आकृति अब भी सदमे थी। वह चुपचाप श्वेता के पास जाकर बैठ गई और फिर दोनों बहनों की आँखों से आँसू बहने लगे।

राजीव अब भी अपनी जगह पर ही खड़ा हुआ था। वह अब भी यकीन नहीं कर पा रहा था कि जिन्दगी के बड़े से बड़े फैसले खुद अकेले लेकर जिन्दादिली से जीने वाली उससे उम्र में दो वर्ष बड़ी बहन सुरभि अचानक ही जिन्दगी से हार कर कायरों वाला रास्ता अख्तियार कर दुनिया से इस तरह अचानक विदाई ले लेगी। अपने जमाने से हमेशा दो कदम आगे रहने वाली सुरभि जिन्दगी की दौड़ में पीछे कैसे रह सकती है। बीती हुई बहुत सारी बातें सोचते हुए राजीव का सिर भारी हुआ जा रहा था। वैसे भी दुख के क्षणों में खासकर किसी स्वजन की मृत्यु के वक्त उसकी असमय विदाई हो जाने से इन्सान का मन उसके संग बितायें सुखद क्षणों को याद कर ज्यादा दुखी होता है। राजीव को अब उस कमरे में रहना असहनीय लगने लगा। वह सुरभि के पैरों को छूकर वापस बाहर आ गया। सुरभि के घर से कुछ दूर चलकर वह कॉलोनी के गेट तक आ गया और स्ट्रीट लाईट के खम्बे के नीचे खड़े होकर उसने जेब से सिगरेट निकालकर सुलगा ली। राजीव जब जब भी तनाव महसूस करता उसका मन सिगरेट पीने की तलब से तड़पने लगता।

अभी उसने सिगरेट के दो कश खींचकर धुआँ अपने होठों को गोलकर बाहर निकाला ही था कि वही सज्जन राजीव के पास आकर खड़े हो गए। उन्हें आपने पास आया देख राजीव सिगरेट फेंकने ही जा रहा था कि उन्होंने उसे टोका।

‘पी लो। सिगरेट पीने के आदि हो तो रह नहीं पाओगे इसके बिना। अभी बहुत कुछ निर्णय लेना बाकी है अत: तुम्हारे मन का शान्त होना जरूरी है।’

‘कहिये डॉक्टर साहब। आप अकेले में मुझसे कुछ कहना चाहते थे।’ राजीव ने कुछ देर पहले उनके द्वारा आँखों से किए गए इशारे की तरफ उनका ध्यान इंगित कर उनकी और देखा और दोनों उँगलियों के बीच पकड़ रखी सिगरेट को हल्का सा झटका देकर जमा हुई राख नीचे गिरा दी।

‘डॉक्टर होने के साथ सुरभि जी का पड़ोसी भी हूँ। उनकी परेशानी का कारण क्या रहा होगा यह नहीं जानता पर उनकी डेथ नींद की गोलियों के ओवर डोज की वजह से हुई है।’ डॉक्टर साहब ने अपनी बात कही।  

‘डॉक्टर साहब। समझ नहीं पा रहा हूँ ये सब कैसे हो गया ?’ राजीव ने उन्हें देखते हुए सिगरेट का एक लम्बा कश खींचा और फिर सिगरेट नीचे फेंक कर उसे अपने दायें पैर से मसलकर बुझा दिया। परेशान होते हुए उसने अपने सामने खड़े अपनी बहन के पड़ोसी और पेशे से डॉक्टर मि. अस्थाना की तरफ देखा। 

‘देखो राजीव, मैं कोई बहुत बड़ा डॉक्टर तो हूँ नहीं फिर भी एक पड़ोसी होने के नाते सलाह दूँगा कि जो हो गया सो हो गया अब उनकी मौत की वजह चाहे जो भी रही हो उसे अपने तक ही सीमित रखकर श्वेता का ध्यान रखो।’   

‘पर दीदी ने कभी ऐसी कोई समस्या का जिक्र नहीं किया जिसकी वजह से उन्हें कुछ ऐसा करना पड़ जाएँ।’ राजीव सुरभि की हुई असमय मौत से ज्यादा व्यथित उसके पीछे के कारण को न पकड़ पाने की वजह से परेशान होता हुआ दुखी हो रहा था।   

‘इन्सान की जिन्दगी में कुछ बातें ऐसी होती है जो किसी से भी नहीं कही जा सकती। सुसाइड का केस पुलिस केस बनता है पर यह बात अभी तक मेरे, श्वेता और तुम्हारे अलावा किसी को पता नहीं। अब तुम्ही बताओं आगे क्या करना है। पुलिस इस मामले में शामिल हुई तो फिर पोस्टमार्टम और बहुत सी कार्यवाही के चलते सुरभि जी की मृतदेह का सम्मान नहीं बना रहा पाएगा।’ डॉक्टर अस्थाना ने एक छुपी सलाह देते हुए राजीव की आँखों को पढ़ने का प्रयास किया ।

‘अब जो रहा ही नहीं उसके पीछे रहे रहस्यों को जानने के लिए मैं दीदी की मौत का तमाशा नहीं बनाना चाहता।’ राजीव ने परेशानी के बीच एक हल निकालते हुए जवाब दिया। 

‘तो ठीक है, फिर अपने नाते रिश्तेदारों को फोन कर दो बाकी की व्यवस्था मैं सम्हाल लूँगा।’ कहते हुए डॉक्टर अस्थाना ने राजीव के कंधे पर हाथ रखकर उसे सांत्वना दी और वहाँ से चले गए।

कुछ देर अकेले चुपचाप खड़े रहने के बाद राजीव ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और उसकी उँगलियाँ चिर परिचित नम्बरों को एक एक कर डॉयल करने लगी।


क्रमशः


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