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Sumita Sharma

Horror

3  

Sumita Sharma

Horror

राज़ उस रात का

राज़ उस रात का

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रात के लगभग दस बजने जा रहे थे, मौसम आँधी पानी से बुरी तरह बिगड़ चुका था। मैं अपने घर की तरफ तेजी से जा रहा था कि रास्ते में संजना, मेरी पत्नी का मैसेज स्क्रीन पर फ्लैश हुआ "राजीव चार पिज़्ज़ा भी ले आइयेगा।" मैं बेकरी पर पिज़्ज़ा खरीदने रुक गया। एक मैंने बड़ा टोमेटो सॉस का पिचकू भी ख़रीद लिया। रूही मेरी बहन और मेरी तीन साल की भतीजी आहना बड़े चाव से पिज़्ज़ा के साथ खाती थीं। घर पर पहुँचने की जल्दी इसलिए भी थी कि घर पर बड़ी भाभी, रूही और संजना अकेले थीं। मम्मी पापा, भैया के साथ एक शादी में शामिल होने गाँव गए थे। हम लोगों को भी सुबह जल्दी गाँव के लिए निकलना था। मेरे मोबाइल की बैटरी जवाब दे चुकी थी, घर पहुंचा तो देखा मोहल्ले की बिजली जा चुकी थी। सबके घरों में तो रौशनी थी, पर मेरा घर बिल्कुल अंधेरे में डूबा हुआ था। कोई हलचल नहीं, जबकि इन्वर्टर तो हमारे घर में भी था। दस मिनट गेट खटखटाया, पर कोई जवाब नहीं। घण्टी भी बिजली आने पर ही काम करती थी। अब मेरा मन अनहोनी की आशंका से बुरी तरह घबराने लगा। पड़ोस के वर्मा जी को मैंने अपनी मदद के लिए बुला लिया। किसी तरह दोनों बाउंड्री फाँद कर घर के अंदर घुसे, तो ग्रिल में फँस कर जेब के साथ सॉस का पैकेट भी फट गया, पूरा घर साँय-साँय कर रहा था।


अब मुझे रोना सा आने लगा था, एक घण्टे पहले तो बात हुई थी सबसे अचानक क्या हो गया! आखिर मेरे परिवार को अचानक क्या हो गया! मैं वैसे तो नास्तिक और अंग्रेजी साहित्य का प्रोफेसर था, डिग्री कॉलेज का और एनुअल फंक्शन में मैकबेथ प्ले होना था तो कॉलेज भी शाम को मैं उसी की तैयारी करवाने के लिए ही गया था। पर आज ईश्वर से अपने परिवार की सलामती की प्रार्थना कर रहा था। सबसे पीछे वाले हॉल में ज़रा सी रौशनी देखकर हम दोनों सावधानी पूर्वक गए, खिड़की से अंदर देखने की कोशिश की तो मेरी रीढ़ की हड्डी तक सनसनाहट दौड़ गयी। घटती बढ़ती कभी नीली कभी सफेद धीमी रौशनी के सामने तीन चुड़ैलें बैठी हुईं थीं। अंधेरे में उनके पीले चेहरे और ताज़े खून की धारियाँ, सिर से चेहरे की तरफ बढ़ रहीं थीं। ऐसा लग रहा था जैसे अभी सीधे कब्र से निकल कर आईं हैं, मैकबेथ का थ्री विचेज सीन मेरे सामने साक्षात ही था। मैं खिड़की पर ज़ोर ज़ोर से हाथ पटक रहा था, मेरे साथ वर्मा जी की भी घिग्घी बंधी हुई थी। हनुमान जी का नाम लेकर मैंने दरवाज़ा तोड़ने का फैसला किया। दरवाज़े पर मैं और वर्मा जी दोनों पागलों की तरह लात मारे जा रहे थे। मैं 'संजना आहना' चिल्ला रहा था, इतने में दरवाज़े का लॉक टूट गया। दो चुड़ैलें चाकू और मोमबत्ती लेकर हमारी ही तरफ बढ़ रहीं थीं। एक ने कोने में अहाना को पकड़ रखा था। वर्मा तो मेरे हाथों में डर से झूल गया, उधर गिरने वाला तो मैं भी था, लेकिन अब जब चीख चुड़ैलों की तरफ से आई। तो मेरा ध्यान गया कि ये तो श्रीमती जी और रूही की आवाज़ थी। "क्या हो गया राजीव, आपकी शर्ट पर ये खून कहाँ से आया? एक्सीडेंट हुआ या किसी ने आप के ऊपर हमला किया है?" "बस करो तुम लोग, मेरी तो जान ही निकाल दी तुम लोगों ने। पहले पानी लाओ और बिजली को क्या हुआ?" "वो भैया हम लोग लैपटॉप पर फिल्म देख रहे थे, अचानक लाइट चली गयी तो याद आया कि इन्वर्टर का स्विच बन्द है। डर के मारे ऊपर जाने की हिम्मत नहीं पड़ी। सोचा थोड़ी देर में शायद लाइट आ जाये।" "मैंने ऊपर जा कर इन्वर्टर चालू किया और पानी वर्मा के चेहरे पर छिड़क कर गाल थपथपाते हुए कहा "निखिल उठ, ये दोनों चुड़ैल नहीं हैं, तेरी भाभी और रूही हैं।" उसे सोफे पर बिठा कर, मैंने संजना से कहा "जाओ पहले अपना चेहरा धोकर हम दोनों के लिए चाय लाओ।" चाय पीकर, फिर पूछा "ये क्या हाल बना रखा है तुम लोगों ने अपना और घर का?" रूही ने बताया "हम लोगों को बड़े भैया का लैपटॉप मिल गया तो उसे फुल चार्ज कर के हॉरर मूवी देखने का प्रोग्राम बना। दोनों भाभियाँ एक नम्बर की डरपोक ठहरीं। उनको डर भी लगता है और फ़िल्म भी देखनी थी। अकेले घर में डर न लगे तो भूत के डर के मारे कैण्डल चाकू रख लिया अपने पास, बड़ी भाभी बता रही थीं कि भूत आग और लोहे से डरते हैं।" "वो सब तो ठीक है, मोबाइल की टॉर्च जला सकती थीं या नहीं?" "वो तो हमें अंधेरे में दिखा नहीं, डर तो हम लोग भी गए थे। इधर तो आप लोग हाथ से खिड़की भड़भड़ा रहे थे। उधर फ़िल्म में भूत खिड़की भड़भड़ा रहा था। और तो और फ़िल्म की हीरोइन का नाम भी संजना था और भूत बार-बार संजना बुला रहा था, तो हम और डर गए कि शायद भूत ही ने दरवाज़ा तोड़ दिया, इसलिए हम कैंडल और चाकू लेकर बाहर बढ़े।" "पर भाभी" निखिल वर्मा ने पूछा "आप लोगों ने अपने चेहरों में क्या कर लिया था और खून कैसे टपक रहा था?" "अरे वो हम लोगों ने एक दूसरे को फेशियल करने के बाद फेस पैक लगाया था। बालों में मेहंदी और हेयर कलर जो गर्मी की वजह से चेहरे पर टपक रहा था। हालत तो फ़िल्म देखने के बाद हमारी भी खराब हो गयी थी।" "इन्वर्टर स्टार्ट करने अगर हम दो लोग जाते तो भाभी अकेली पड़ जातीं, इसलिए तीनों एक साथ चिपके बैठे रहे। रौशनी के नाम पर लैपटॉप भी काफी था। इधर अहाना भी सो कर उठ गयी, तो वो भी हमें देखकर डर के मारे रोने लगी।" "भाभी जो भी हो, आप लोगों ने हमारी जान ही निकाल दी। लड़ाई झगड़े से तो कैसे भी निपट लो, पर ये सब मैं अभी भी नॉर्मल नहीं हो पा रहा हूँ। वैसे आप लोगों को ऐसे भेष में कौन दिलेर झेल लेता है।" "हमारी ब्यूटीशियन" तीनों एक सुर में बोलीं।" अब ऐसी लापरवाही और मस्ती आगे मत करना। बड़ी डरावनी सिचुएशन बन गयी।" "सही है डर के आगे ब्यूटी है, कहकर वर्मा हँसते हुए अपने घर चला गया।


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