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Sumita Sharma

Drama

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Sumita Sharma

Drama

सन्नाटा

सन्नाटा

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दद्दा ये बताओ तुम्हारी सेहत से तो ये लगता है कि तुमने बहुत बड़े बड़े क़त्ल झटके में निपटाए होंगें।

सो तो है बड़े चाकू ने , खुद से छोटे छुरे को गर्व से कहा।

लोग मुझे हाथ मे देखकर ही घबरा जाते थे उस वक़्त मेरा मालिक एक वार में अपना काम अंजाम दे डालता था।

आखिरी बार मैंने एक ऐसी औरत का खून पिया था जो माँ

बनने वाली थी । फिर मुझमें जंग लग गयी तो फेंक दिया गया और तब से यहीँ हूँ।

तुम कैसे छुरे भाई... तुमने क्या किया 

अरे मैंने तो बड़े , बच्चों और बूढ़ों को भी नहीं छोड़ा, फिरौती में मेरा बड़ा हाथ होता था।

इस तरह सब अपने पराक्रम का बखान कर रहे थे।

बड़े बड़े धारदार चाकू आज आखिरी बार अपनी बातें कर रहे थे कबाड़ के उस ढेर में जहाँ कई अन्य हथियार भी थे । आज की रात भर का साथ था सबका, कल तो सबको भट्टी में गल जाना था तो आज सब ज़िंदगी का जश्न मना रहे थे।

इतने में एक छोटे से चमकीले चाकू को हँसी आ गयी , छुरा डपट कर बोला , हमारी बातों पर तू क्यों हँस रहा तो ?

तेरी औकात तो सब्ज़ी काटने की भी नहीँ लगती कहीँ से और चला है हमारी बराबरी करने।

नहीँ मुझे आपसे बराबरी करनी भी नहीँ पर मैं खुश हूँ कि अपने बेहद छोटे जीवन को शान से जिया ।

मैं एक सर्जन का चाकू हूँ , मैंने खून बहाया पर किसी की जान बचाने के लिए।

लोग मेरे मालिक के पैर छूकर जाते और मैं खुश हो जाता उसकी सेवा करके। कि मेरा जीवन किसी के काम आया।

ज़िन्दगी बड़ी हो या न हो शानदार ज़रूर होनी चाहिए।

उसकी बात सुनकर सब मौन हो गए, अपने जीवन पर शर्मिंदा और कमरे में सन्नाटा छा गया।


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