Sangeeta Agrawal

Romance


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Sangeeta Agrawal

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राधा - स्वामी

राधा - स्वामी

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स्वामी एक गरीब कुम्हार का लड़का था, उम्र होगी उन्नीस-बीस के करीब। सुडौल, गौर वर्ण, कंधे छूते हुए काले घुंगराले बाल, तीखी नाक,आंखों में एक अलग सा नशीलापन। सच, उसके मैले कपड़ों को ना देखो तो वह किसी राजकुमार से कम नही लगता था। गांव की लड़कियाँ उसे देखकर आहें भरतीं। हर लड़की उसे अपना बनाना चाहती थी, पर स्वामी था कि किसी की तरफ देखता भी नही था। 

स्वामी चित्रकारी के हुनर मे निपुण था । वह फूल पत्तियों, और कुछ सब्जियों इत्यादि से रंग बनाकर बर्तनों पर चित्रकारी करता, अपनी झोपड़ी की मिट्टी की दीवारों पर भी उसने सुंदर चित्रकारी करी हुई थी । झोपड़ी के बाहर एक छोटा-सा आंगन था,जहाँ उसके पिता ‘साधो’ मिट्टी के बर्तन बनाते थे। वहीं एक कौने को मिट्टी से लीप कर स्वामी, भगवानों की सुंदर तस्वीरें बनाता, जिन्हे जो भी देखता, दाँतों तले उंगली दबा लेता था। 


उसी गांव के जमींदार की बेटी थी ‘राधा’ । वह पड़ी लिखी , और बहुत सुन्दर थी । श्याम वर्ण, रेशमी घने काले लम्बे  बाल, तीखे नयन-नक्श, हर अंग ऐसा लगता जैसे किसी ने बड़े प्यार से तराशा हो, स्वभाव की कोमल। देखने मे किसी कवि की कामायनी लगती थी। 


राधा ने स्वामी के आकर्षक रूप एवं चित्रकारी के हुनर के बारे में अपनी सहेलियों से सुना हुआ था। वह उससे मिलने को उत्सुक थी, पर कैसे जाए, जमींदार की बेटी को एक कुम्हार के घर जाने का क्या काम? फिर, उसे एक युक्ति सूझी। उसने पिताजी से मंदिर के लिए एक नया कलश लेने की बात कही, और कहा वह खुद ही एक अच्छा सा कलश देख कर लाना चाहती है। मंदिर की बात थी, पिताजी ने अनुमति दे दी। राधा पालकी में बैठ कुम्हार ‘साधो’ के घर की ओर चल दी। 


कुम्हार के घर के सामने जाकर पालकी रुक गई , राधा पालकी से उतरी , और कंधारों को वहीं रुकने की बोल वह अंदर आंगन की तरफ चल पड़ी । आँगन मे प्रवेश करते ही राधा ने देखा, आंगन के एक कौने में माँ सरस्वती का बहुत ही सुन्दर चित्र बना हुआ था। दूसरी तरफ चित्रकारी करे हुए बड़े ही सुंदर मिट्टी के बर्तन रखे हुए थे।

 

राधा उन बर्तनों की अद्भुत चित्रकारी को देखने में खोई हुई थी, तभी झोपड़ी से स्वामी निकल कर आया। आंगन में एक अतिसुंदर लड़की को देख कर वह हकबका गया। उससे कुछ कहते नही बना। राधा भी स्वामी को सामने देख सकुचित हुई, और फिर वशीभूत सी नज़रों से स्वामी को देखने लगी। उसे ऐसा लगा मानो सामने साक्षात् कोई देव खड़े हों। इतना मन्मोहक युवक उसने पहले कभी नही देखा था। कुछ समय तक दोनों एक दूसरे को सम्मोहित हुए देखते रहे। होश आते ही राधा ने सकपकाई नज़र से इधर उधर देखा फिर थोड़ा संभल कर माँ सरस्वती के चित्र की और देखते हुए बोली, “तुम बहुत अच्छे चित्र बनाते हो, देखना एक दिन तुम बहुत बड़े चित्रकार बनोगे” ।

स्वामी यह सुन सकुचाया, फिर अजीब सी हंसी हंस कर बोला, “यह कैसे संभव है ? मेरी चित्रकारी को भला कौन पूछेगा ?”

राधा कुछ देर रुक कर बोली, “क्या तुम मेरा चित्र बनाओगे ?”,

वह चौंका, “आपका?” 

राधा ने कहा. “हां , यदि तुम्हें एतराज़ न हो तो”

स्वामी से कुछ कहते नही बना, बस विस्मित भरी नज़रों से राधा को देखते हुए सिर हिला दिया। 

 “तुम्हें संदेश भेजूंगी, तब आ जाना”, यह कह कर राधा चित्रकारी किये हुए बर्तनों में से एक कलश चुनने लगी। एक सुन्दर कलश को चुनने के बाद स्वामी से उस कलश का सौदा किया और बाहर निकल कर पालकी में बैठ गयी। 

उस मुलाकात के बाद से राधा का दिल हिलोरें खा रहा था, वो बार-बार स्वामी से खरीदे हुए पूजा के कलश को निहारती रहती। उस कलश के साथ साथ उसे स्वामी का चेहरा नज़र आने लगता। उधर स्वामी का हाल भी कुछ ऐसा ही था। उसके दिल मैं भी अजीब सी उथल पुथल मची हुई थी, उसे समझ नही पड़ता था, कि उसका भाग्य अचानक यह क्या रंग दिखाने लगा। उसे खुशी और जिज्ञासा की मिली-जुली अनुभूति हो रही थी। बेसब्री से वो राधा के संदेश का इंतज़ार करने लगा । 


एक दिन मौका पा कर, राधा ने घर के एक नौकर की बेटी के हाथों संदेश भेज कर, स्वामी को अपने पिताजी के पुराने खा ली पड़े हुए गोदाम में आने को कहा। राधा ने पहले ही गोदाम की साफ़ सफाई करवा दी थी। स्वामी के आने से पहले उसी नौकर की बेटी से कह कर दो चौंकी, एक मोटा हाथ से बना हुआ पत्रा (हाथ से बना कागज) और पानी का ज़ग रखवा दिया। 


स्वामी अपना चित्रकारी का पूरा सामान लिए वहाँ पहुँच गया। राधा वहीँ, एक चौकी पैर बैठी उसका इंतजार कर रही थी। स्वामी को देखते ही वह खड़ी हो गई और बोली, “आओ स्वामी, यह रहा तुम्हारा पत्रा है, इसमें तुम्हें मेरा चित्र बनाना है” । स्वामी ने पहली बार ऐसा पत्रा देखा था , खैर उसने राधा को एक चौंकी पर बैठने के लिए कहा और अपने थैले से रंगों का सामान निकाल चित्र बनाना शुरू कर दिया। शुरू शुरू में राधा की तरफ देखने में थोड़ा झिझका, उससे नज़रें नही मिला पा रह था। एक कोमल सी ललायी उसके गालों से लेकर कानों तक फैल गयी थी। पर जैसे जैसे वह अपने काम में रमता चला गया, झिझक अपने आप चली गयी। चित्र बनाते हुए , वह राधा के रंग रूप और व्यक्तित्व की गरिमा में खोता जा रहा था। राधा की कमल जैसी आंखों में उसे मानो समुद्र नज़र आ रहा हो, जिसके अंदर डूब जाने को दिल करता है। राधा भी बगैर हिले, एक-टक स्वामी को निहारें जा रही थी। प्रतीत होता था , जैसे इस दुनिया में उन दोनों के सिवा कुछ बाकी ही न रहा हो।


चित्र पूरा होने पर राधा ने जब अपना चित्र देखा तो उसे लगा वह आईना देख रही हो। इतना जीवंत प्रतीत हो रहा था चित्र, उसने उत्साहित हो कर कहा, “स्वामी तुम्हारे हाथों में तो जादू है, मैं तुमसे और भी अपने चित्र बनवाऊंगी, तुम अगले सप्ताह फिर आ जाना। आओगे न?” कह कर वह स्वामी को उत्सुकता से देखने लगी. 

स्वामी सकुचाते हुए मुस्कुराया और, धीरे से हाँ में सर हिला कर वंहा से अपना सामान समेट कर चल दिया। उस दिन उसे लगा जैसे उसके पैर ज़मीन पर नहीं हवा मे पड़ रहे थे। 


यह सिलसिला चल पड़ा, स्वामी अलग अलग ढंग से राधा की सुंदरता को चित्रों में ढालने लगा था। राधा सम्मोहित हुई स्वामी को देखती रहती और स्वामी राधा की आँखों में खोया हुआ चित्रकारी करता रहता। स्वामी के बनाये हुए हर चित्र मे राधा एक नए रूप मे जीवित नज़र आती। उनका प्यार इन चित्रों के रंगों में रस-बस गया था, वह अब राधा और स्वामी नही 'राधा-स्वामी' बन गए थे। 


एक दिन अचानक राधा की तबियत खराब हो गयी, उसको पास ही शहर के अस्पताल में ले जाया गया। तेज ज्वर चढ़ा हुआ था। स्वामी ने जब सुना तो उसका दिल जैसे बाहर को आ गया। खाना पीना सब छूट गया. वह भूखा प्यासा , बैचेनी से जमींदार की हवेली के आसपास चक्कर लगाता रहता की कंही से राधा की खैर खबर मिल जाये। 

आज पांच दिन हो गए,राधा का ज्वर उतरने का नाम ही नही ले रहा था, उधर स्वामी राधा से मिलने के सिवा कुछ भी और सोच नहीं पा रहा था, पर वह कैसे मिले, उसे कौन मिलने देगा। 

फिर भी उसने तय किया की वह आज राधा से ज़रूर मिलेगा। गाँव से शहर की बस पकड़ी और पूछता पूछता अस्पताल जा पहुंचा। रात का समय था। अपनी राधा से मिलने की तमन्ना में जैसे स्वामी को वक़्त और जगह की सुधबुध ही नहीं थी। अस्पताल की दीवार फाँद, वह राधा को ढूँढता ढूँढता उसके बिस्तर के पास जा पहुंचा। उसने धीरे से राधा का नाम लेकर पुकारा, तो राधा ने आँखें खोली, और सामने स्वामी को खड़ा देखकर भावुक हो उठी। उसकी रुकी रुकी सी गहरी साँसे जैसे स्वामी का इंतज़ार कर रही थी। स्वामी की आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी,उसने राधा का हाथ पकड़ लिया, और अपने ओठों से उसके तपते ओठों को चूम लिया,अपना सिर उसके सीने पर रख दिया। राधा और स्वामी अब हमेशा के लिए एक दूसरे में समावित हो चुके थे, भोर हुए जिसने भी उन्हे देखा, भावविहील हुए बगैर ना रह सका।

 

उनकी मृत्यु के कुछ दिन पश्च्चात जब राधा के पिताजी किसी काम से अपने पुराने गोदाम गए , तो वहाँ स्वामी द्वारा बनाए हुए राधा के चित्रों को देख बहुत आश्चर्य चकित हुए। हर चित्र में राधा ऐसे लग रही थी जैसे साक्षात उनके सामने खड़ी हो, उन्होंने कुछ सोच सारे चित्र प्रेस में राधा-स्वामी नाम से दे दिए। वह चित्र देश भर में ख्याति प्राप्त करने लगे उनकी प्रतिलिपीयां ऊँचे दामों पर बिकने लगीं, राधा ने सही कहा था स्वामी देखना एक दिन तुम बहुत बड़े चित्रकार बनोगे।।



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