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Sangeeta Agrawal

Drama


4.6  

Sangeeta Agrawal

Drama


" दीवार ढहने लगी "

" दीवार ढहने लगी "

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रुपाली ओ रुपाली”,  नीचे से ताई सास आवाज़ दे रही थीं, “राम जाने यह कितना सोती है, अच्छे घर की बहूएं सबरे तड़के उठ कर घर के कामों में लग जाती हैं, और यह महारानी है कि छ: बजने को आए, अब तक पड़ी सो रही है, हे  राम... घोर कलयुग चल रहा है ”, ताई बड़बड़ाते हुए अपने कमरे में चल दीं। मैं ताई की आवाज़ सुन, हड़बड़ा कर उठी और जल्दी से गुसलखाने में घुस गयी ।


 मेरा विवाह शहर के एक रईस सेठ केतन प्रसाद जी के साथ हुआ था। इनका कपड़ों का व्यापार है, और शहर में बड़ी ही धाक है ।  मेरी और इनकी की उम्र में करीब सोलह-सत्रह साल का फर्क है । कुछ अपने अकेलेपन की वजह से और कुछ ताई सास के दबाव के आगे, इन्होने शादी के लिए हां कर दी थी ।


मैं बिन माँ बाप की एक अनाथ लड़की जिसे रिश्ते की बुआ ने बड़े एहसानोँ  से पाला था। अपने मां-बाप का तो मुझे चेहरा तक याद नही, मैं पैदा भी नही हुई थी कि, गांव में आयी बाढ़ में पूरा गांव ढह गया, मेरे  पिता भी उस बाढ़ में कहीं बह गए। गांव वालों ने खूब ढूंढा, पर कुछ पता ना चला। मेरी माँ जो उन दिनों मुझ से गर्भवती थी, अपने जापे के लिए  दूसरे गांव अपने मायके आयी हुई थी।  जब माँ को गांव में आयी हुई बाढ़ में पिताजी के बह जाने का पता चला तो उन्हें गहरा सदमा लगा और मेरे पैदा होते ही वह भी चल बसी।  मुझे,  बुआ अपने साथ ले आईं, बुआ  अकेली रहती थीं, उन्होंने शादी नही की थी।  वह स्वभाव की बहुत कड़क हैं,पर मेरी पढ़ाई-लिखाई  मे उन्होंने  कोई कसर नहीं छोड़ी । उसी पढ़ाई का यह नतीजा था की बी. ए. पास होते ही मेरे लिए यह रिश्ता आया।  बुआ ने फौरन हां कर दी, मुझ से पूछने का तो मतलब ही नही बनता था।  “तेरी शादी हो जाए तो मैं गंगा नहाँऊ। “,  और इस तरह  मैं शादी होकर यहाँ आ गयी। 


नहा-धो कर मैं जल्दी-जल्दी नीचे आ गयी, और रसोई में घुस गयी। यह तो व्यापार के सिलसिले में दूसरे शहर गए हुए थे।  कह रहे थे, “दस दिन तो लग ही जाएंगे, तुम चिंता ना करना यहाँ ताई माँ हैं तुम्हारे साथ, और मन बहलाने के लिए कभी थिएटर या मार्केट चली जाया करना।  नाथू ड्राइवर को बोल के जा रहा हूँ, वह ले जाया करेगा।” 

 मैं कुछ ना बोली बस सिर हिला दिया। हमारे बीच पति पत्नी जैसा कुछ भी नहीं हुआ था, वह अपने व्यापार और बाहर की दुनिया के बारे में खूब बात करते, और मैं भी बड़े ध्यान से उनकी सारी बाते सुनती,  पर रात को वह कभी साथ ना सोए, सोने के लिए वह दूसरे कमरे चले जाते थे । इन्हे अपनी पहली पत्नी, “हां मेरी शादी एक विधुर से हुई थी”, के जाने के बाद किसी और औरत की तरफ आकर्षण नही हो पाया, मैं तो बस उनका एकाकीपन दूर करने के लिए आयी थी। हम अच्छे दोस्त तो बन गए थे, पर ये मुझे उनकी पत्नी के रूप में अपनायें यह तमन्ना दिल में ही रह जाती थी।  

मैंने जल्दी जल्दी रसोइये के साथ मिलकर रसोई का काम निपटाया, ताई का सुबह का जलपान उनके कमरे में पहुंचा दिया। सुबह के जलपान के बाद ताई ने मुझे अपने कमरे में बुला भेजा, बोली “दस दिन बाद पूनो है, मुझे गंगा स्नान के लिए जाना है, कल तड़के सुबह निकलूंगी। तुम संभल कर रहना, मेरा जाना जरूरी है, नही तो यूँ  तुम्हें अकेला छोड़ कर ना जाती। “  मैंने उन्हे तसल्ली दी कि मैं घर का अच्छे से ख्याल रखूँगी वे किसी बात की चिंता न करे ।

सुबह तड़के ही ताई सास चली गयीं, और मैं घर पर अकेली रह गयी। रसोईये को कुछ बनाने के लिए मना कर दिया, भूख लगेगी तो मैं अपने आप कुछ देख लूंगी।  किताबें उठा कर इधर उधर पन्ने पलटने लगी, पर मन नही बैठ रहा था।  पास थिएटर में गिरीश कर्नाड का कोई नाटक चल रहा था, वही देखने का मैंने मन बनाया और नाथू से बोल शाम के टिकट मंगवा लिए। 

थिएटर में बड़ी गहमा-गहमी थी, यह गिरीश कर्नाड का माना हुआ नाटक था, काफी बड़ी बड़ी हस्तियां आई हुई थीं।  मैं भी अंदर हाॅल में जाने का इंतजार कर रही थी, तभी मेरे पास से एक प्यारी सी खुशबू का झोंका मुझे महकाता हुआ  चला गया।  मैंने मुड़कर देखा तो एक बहुत सुंदर सजीला व्यक्ति जिसके चेहरे पर रईसी और बुद्धिजीवी की मिली-जुली चमक थी, पास से गुजरता हुआ निकला।  मैं उसे देखती रह गयी, जब सब अंदर जाने लगे, तब मैं भी अंदर जाकर अपनी सीट पर बैठ गयी।  

थोड़ी देर में नज़दीक से,  ‘हेैलो’  की आवाज़ आई,

आंखे उठा कर देखा तो वही व्यक्ति मुस्कराता हुआ खड़ा था, उसने बड़े अदब से मेरी बगल की सीट पर बैठने के लिए पूछा, मैंने मुस्करा कर सिर हिला दिया। नाटक शुरू होने में अभी थोड़ा समय था। 

उसने बैठने के पश्च्चात बातचीत शुरू करते हुए पूछा, “आप अक्सर आती हैं नाटक देखने ?”,

 मैं बोली, “जब कभी मौका मिलता है, तब देख लेती हूं”,

 वह फिर बोला, “जी, मेरा नाम शेखर है, आप ?”,  

“जी मेरा नाम रुपाली है”,

“ मैं एक प्रोफेसर हूँ”, उसने फिर बात आगे बढ़ाने के उद्देश्य से बोला। 

मैं बस मुस्करा दी। सच पूछो तो उसका यूँ मेरे पास बैठना मुझे अच्छा लग रहा था। नाटक शुरू हो चुका था, लेकिन आज मेरा मन नाटक देखने में नही लग रहा था, जाने कैसी सिहरन सी अंदर दौड़ लगा रही थी। 

नाटक खत्म होने के बाद बाहर निकल में नाथू को ढूंढ ने लगी, तभी शेखर मेरे सामने आकर खड़ा हो गया, बोला, “एक काॅफी तो बनती है दोस्ती के नाम”, 

मैं चौंकी, दोस्ती? अभी तो बस हम एक दूसरे का नाम ही जानते हैं, पर इस प्रस्ताव को ना नही कह सकी या शायद मैं कहना ही नही चाहती थी । हम एक काॅफी शाॅप पर जाकर बैठ गए ।

 “आप ने यहाँ का युगल गार्डन देखा है ?”,शेखर ने पूछा । 

मैंने ना में सिर हिला दिया, 

शेखर ने कहा, “कल मेरी छुट्टी है, अगर आप चाहें तो हम कल युगल गार्डन चल सकते हैं”, मैंने सोचा घर पर अकेली बोर होने से अच्छा है कि थोड़ा बाहर घूम आऊं, मन बहला रहेगा, मैंने हां कर दी,

दूसरे दिन शाम के पांच बजे शेखर ने गार्डन के पास मिलने का तय किया ।

 

मैं तैयार होने लगी, अंदर न जाने कैसी एक उमंग सी लहरा रही थी, संवरने का मन कर रहा था । शादी के बाद कभी संवरने का मन ही नही हुआ, क्योंकि इन्हे ऐसी कोई चाह ही नही थी कि उनकी पत्नी सजे-संवरे। मैं जैसी भी रहूँ उन्हें वैसी ही स्वीकार थी । वह जब तक मुझे प्रेयसी के रूप में नही देखेंगे तब तक इन सब बातों का कोई मतलब भी नही था।

नाथू से गाड़ी निकालने को कहा, एक बार अपने को आईने में देखा तो जैसे खुद ही अपने पर मोहित हो गयी, सच में मैं इतनी सुन्दर हूँ, फिर इनको कैसे ना लुभा पायी ? मन ही मन सोचा और फिर जा कर गाड़ी मे बैठ गयी। 

नाथू को युगल गार्डन पार्किंग मे ही इंतज़ार करने को कहा। शेखर पहले ही वंहा इंतज़ार कर रहा था।  सच में गार्डन बहुत सुन्दर बनाया हुआ था। हम घूमते रहे फिर एक बेंच देख वहाँ बैठ गए।  धीमी-धीमी सी हवा चल रही थी, ज्यादा कुछ भीड़-भाड़ नहीं थी, शेखर अपने विश्वविद्यालय और वहाँ के छात्रों के कुछ किस्से सुना रहा था।बाते करते-करते अचानक उसका हाथ मेरे बेंच पर रखे हाथ पर आ गया।  मेरे अंदर जैसे कुछ पिघल सा गया, मैंने कोई विरोध नही जताया, बस शांत बैठी रही।  

“रुपाली”, उसने पुकारा,

 “हूँ?”,  कहते हुए मैंने उसकी तरफ देखा। 

वह बोला, “मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो, शायद पहली नजर में ही मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ, जानता हूँ यह हमारी अभी दूसरी ही मुलाकात है, पर मैं तुम्हें अपनी जीवन संगनी बनाना चाहता हूँ, क्या तुम मेरी जीवन संगनी बनोगी?”,

मैं  हतप्रभ रह गयी, यह मुलाकात यूँ मोड़ ले लेगी सोचा ही नही था, मुझे ऐसा लगा मानो किसी ने आसमान से ज़मीन पर ला पटका हो ।

   “मैं विवाहित हूँ”

द्रणता से यह शब्द कह, मैं तेजी से उठ गार्डन से बाहर निकल आयी और गाड़ी में जाकर बैठ गयी। 

मेरी सांसें तेजी से चल रही थीं।  घर आ मैं बिना कपड़े बदल बिस्तर पर पड़ गयी, और रोने लगी।  रोते-रोते कब आँख लग गयी पता ही नही चला ।

सुबह उठ कर स्नान कर पूजा घर को ऐसे साफ किया, जैसे मैं अपने मन को साफ कर रही हूँ   । इनकी अल्मारी साफ करी, कपड़े करीने से लगा कर रख दिए, किताबें भी करीने से सजा दी । आज ना जाने क्यों इनकी बहुत याद आ रही थी, तभी तार आया कि वह चौदह तारीख़ को आ रहे हैं, उनका काम जल्दी निपट गया था। मैं बैचैनी से इंतजार करने लगी । 

आखिर चौदह तारीख़ आ गयी, मैंने झटपट रसोईए के साथ मिलकर घर के सब काम निपटाए, फिर उसे घर भेज दिया और इनका इंतजार करने लगी।  गाड़ी कॉरिडोर में रुकी, मेरा दिल खुशी से उछले लगा, वह अंदर आए तो  मैंने न आव देखा न ताव, बस दौड़ कर उनसे जा  लिपटी। मेरी सांसे तेजी से चल रही थीं, यह भी हकबका गए, इन्होंने भी कभी मेरी इतनी समिपता महसूस नही की थी, इनकी सांसे  भी तेज होने लगी, और फिर इन्होंने जब मुझे अपनी बांहो के घेरे में कसा तो ऐसा लगा जैसे हमारे बीच खड़ी कोई दीवार ढहने लगी थी।।



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