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Savita Gupta

Drama

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Savita Gupta

Drama

प्यारा जोड़ा

प्यारा जोड़ा

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हर रोज़ की तरह दीपक को बॉल्कनी में बॉय करने निकली थी।आज कितने” हैंडसमलग रहे हैं पीली चेक शर्ट में “घर से जाते वक्त तो कॉम्प्लिमेंट दे दी थी। अब दूर से  “फ्लाइंग कीस उछालकर “नज़र बचाकर, इधर-उधर देख कर, कहीं कोई देख नले...नौवीं मंज़िल से मेरी तारिफ़ के  बदले में दी गई  इनकी लम्बी मुस्कान को  मैंनेहाँथ हिलाकर स्वीकार किया।जब तक इनकी कार आँखों से ओझल न हो जाती मैंहर रोज वहीं बॉल्कनी में खड़ी रहती...लेकिन रोज़ की तरह उस दृश्य को भी दूर तकनिहारती जब तक वो दोनों मेरे आँखों से ओझल न हो जाते।दीपक के जाने के पाँचदस मिनट बाद ये जोड़ा गुजरता दूर से ही दिख जाता था ... वो अधेड़ मज़दूर सादिखने वाला व्यक्ति कमर तक झुकी हुई बुड़ी सी महिला का हाथ पकड़े चलता थाउसके पीछे -पीछे बुड्ढिया भी नीचे ज़मीन देखते हुए डोलती हुई, आगे बढ़ती जाती...मैं सोचती -रिश्ते में माँ -बेटा होंगे या दादी -पोता होगा या फिर कोई और रिश्ता ?जो भी हो बहुत ही प्यारा रिश्ता लगता था।

आज बच्चों के स्कूल में पेरेन्ट मीट था तो मैं भी सुबह तैयार हो गई थी, ’दीपक के साथ मीटिंग में शामिलहोने।’गेट पर गाड़ी पहुँची ही थी कि ‘वही प्यारा जोड़ा दिख गया, मुझसे रहा नहीं गया मैंने दीपक को पाँचमिनट रूकने को बोल कर उस जोड़े के तरफ़ भागी उन्हें रोक कर  सवाल किया ;उस व्यक्ति से कि कहाँजाते हो रोज आपलोग सुबह-सुबह,  फिर शाम ढले लौटते हो ? दो तीन बार पुछने पर पीछे से कमर तकझुकी बुढ़िया ने अपनी पोपली आवाज़ में जवाब दिया -अरे !’इ हमार बेटा है ;’बोल नहीं सकत है, ’दिन भर मज़दूरी करत है फिर साँझे घर फिरत है। ’घर में हमको कोई खाय पिए के नाहीं देत  दुत्कारत है, गाली-गलौज देत है।”भगवान के पास कइसे जाउँ, कोई सीढ़ी भी तो नाहीं है, कि चढ़ कर चली जाऊँ “तीन बेटाबहु का भरल पुरल परिवार है।सब अपने में मगन है...”इ हमरा श्रवण कुमार है “सबसे छोटका बेटा ;नीचेदेखते हुए ही सारी बातें बताने लगी।मदद के तौर पर सौ रूपये निकाल कर उस बुढ़िया को देना चाहा, तो वोबोली -क्या दे रही हो ? मैं कुछ बोलती कि तभी उसका बेटा इशारे से बताया की अम्मा देख नहीं सकती।पैसा लेने से भी इंकार कर दिया।कई महीनों की उत्सुकता शांत हो चुकी थी।ये लाचारी और दुर्दशा तो आमघरों के बुजुर्गों का है।लेकिन सबके पास  श्रवण कुमार नहीं।

गाड़ी में बैठी तो रास्ते भर उस माँ के ग़म में भी मुस्कुराता चेहरा, गर्व से भरे बोल गूंज रहे थे 

-“इ हमर श्रवण कुमार है “वास्तव में मैंने आज  नज़दीक से एक जीता जागता श्रवण कुमार को देखा था।


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