पुनर्मिलन भाग २
पुनर्मिलन भाग २
जिस कक्ष में कीर्तिकुमारी शयन कर रहीं थीं, उस कक्ष से चंपा, मोंगरा, रातरानी, बेला तथा और भी नाना प्रकार के पुष्पों की सुगंध आ रही थी। राधा पूरी रात अपने कक्ष में ही थीं फिर भी यह विभिन्न सुगंध इस बात का द्योतक था कि आज की रात्रि भी यमुना तट पर नंदनंदन श्री कृष्ण और बृषभानुनंदनी राधा का मिलन हुआ है। फिर आज की रात तो शरद पूर्णिमा की रात थे। ऐसा कभी नहीं हुआ कि आज द्वारिकाधीश के नाम से विख्यात, बड़े बड़े राजाओं में अग्रणी, ज्ञानियों द्वारा ब्रह्म मानते हुए पूजित, पर इन गोपबालाओं का मात्र कान्हा, शरद पूर्णिमा की रात्रि महारास रचाने न आये हों। अनोखी बात थी कि प्रत्येक महारास के समय वे सारी गोपियां अपने अपने घरों में ही उपस्थित थीं।
कीर्ति ने रात महारास में तल्लीन बेटी को जगाना उचित न समझा। पर सत्य यह भी था कि थकान केवल भौतिक क्रियाओं का प्रतिफल है। आध्यात्मिक चिंतन में कैसी थकान। वह तो खुद नवचेतना जगाता है।
राधा जगी हुई थी और विचारमग्न थी। लगभग एक सदी पूर्व इसी नंदनंदन से झगड़ते झगड़ते, उसे अपना माखन लुटाते लुटाते, वह कब उसके प्रेम में बाबली सी हो गयी थी। ग्रीष्म काल गुजर चुका था। मौसम में हल्की ठंडक थी। पर यमुना का नीर कुछ अधिक ही शीतल हो रहा था। शारदीय नवरात्रि आरंभ हो चुके थे। उसने माटी की एक प्रतिमा तैयार की। एक सिंह की मूर्ति तैयार कर उसपर माता कात्यायनी को स्थापित किया। मंत्र और विधि महत्वहीन लगी। प्राण-प्रतिष्ठा जैसे विधान की कोई जानकारी न थी। बस जानती थी तो मात्र प्रेम। वही प्रेम जो नंद गोप के सुकुमार राजकुमार के लिये मन में जगा था।
सारी सखियाँ ललिता, विशाखा, चित्रा, इंदुलेखा, चंपकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या, सुदेवी के अतिरिक्त और भी कितनी ही बालाएं सूर्योदय से पूर्व ही यमुना तट पर पहुंच चुकी थीं। विधान में कितनी सच्चाई है, यह विषय गौढ था। मुख्य था नंदनंदन को पति रूप में प्राप्त करना। इस बात से अज्ञात कि सारी सखियों का ध्येय भी वही नंदनंदन है।
सुबह सुबह यमुना के अति शीतल नीर में स्नान कर हम सभी सखियाँ माता कात्यायनी की आराधना करती रहीं। विश्वास पूर्ण था। पर अनुष्ठान में असफलता मन को खिन्न भी कर रही थीं। माता के लिये क्या अदेय। फिर भी संभवतः माता भी संकोच में थीं। जैसे एक ही वस्तु के अनेकों ग्राहक हों तो विक्रेता भी संकोच में ही पड़ता है। सर्वश्रेष्ठ वस्तु भी क्रेताओं की अधिकता में बिक्री रहित रह जाती है। फिर श्याम सुंदर की कामना तो सहस्रों को थी।
शीत में ठिठुरते ठिठुरते, माता कात्यायनी की आराधना करते करते आठ दिन बीत गये। सभी की आराधना एक ही थी।
कात्यायनी महामाये, महायोगिन्योश्वरी ।
नंदगोपसुतं देवि, पतिं मे कुरु ते नमः।।
एक ही मंत्र हजारों गोपियां गातीं पर किसी को किसी अन्य का भान न था। देवी की कृपा केवल मुझे ही मिलेगी। सचमुच उस समय प्रेम में कुछ स्वार्थ भी था। जैसे रवि, शशि और पवन किसी एक के नहीं हो सकते, उसी तरह क्या श्याम सुंदर किसी एक के प्रेम का विषय हैं।अनंत का प्रेम भी अनंत होता है। सांसारिक और भौतिक मान्यताओं का जहां अंत होता है, वहीं से तो शुद्ध प्रेम का आरंभ होता है। फिर वह शुद्ध प्रेम भी कब आसानी से मिलता है। सारा अहम मिटाना होता है। खुद से खुदी को टुकड़े टुकड़े करना होता है।
क्रमशः अगले भाग में
