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satish bhardwaj

Romance Tragedy Crime

4  

satish bhardwaj

Romance Tragedy Crime

पश्चाताप

पश्चाताप

16 mins
4

शशिकांत मिश्रा पुलिस विभाग मे कार्यरत था। रात बहुत ही देर से आया था। तो उठने मे थोड़ा सा देर हुई, आँख मोबाइल की घंटी बजने पर ही खुली। दूसरी तरफ से आवाज़ आई।

जयहिंद साहब, मिथिलेश लोधी बोल रहा हूँ हेड मोहोरीर नरपतपुर थाना।

शशिकांत ने थोड़ा झल्लाहट मे जवाब दिया “जयहिंद यार, ऐसी भी क्या मुसीबत आ गयी थी जो सुबह 8 बजे फोन कर दिया? बड़ी जल्दी थाने पहुँच गए भाई?

मिथिलेश लोधी: अभी तो कमरे पर ही हूँ जी साहब आपको सूचना देनी थी, आपकी एक डाक आई हुई थी थाने मे। थाने जाकर तो एसे उलझ जाते हैं कि भूल ही जाता हूँ। दो दिन से मेरे पास है, सोचा आज सुबह ही आपको जानकारी दे दूँ।

शशिकांत: बताओ कहाँ से है?

मिथिलेश: साहब ये मानसिक स्वस्थय संस्थान एवं चिकत्सालय, आगरा से है जी।

शशिकांत सुनते ही एकदम से सजग हुआ और बोला “क्या लिखा है?”

मिथिलेश: मैंने खोला तो नहीं है साहब...

शशिकांत: खोलो यार, पढ़कर बताओ

मिथिलेश ने पत्र को खोला और पढ़ना शुरू किया।

कुछ शुरुवाती शब्द उसने मन मे गुनगुनाते हुए ही पढे फिर उसने ज़ोर से पढ़ना शुरू किया।

मान्यवर आपके द्वारा मानसिक स्वस्थय संस्थान एवं चिकत्सालय, आगरा मे दिनाँक 15 फरवरी 2020 मे मानसिक चिकित्सा उपचार हेतु भर्ती कारवाई गयी मानसिक रोगी सुनन्दा सिंह पत्नी श्री पुष्कर सिंह की असामयिक मृत्यु दिनाँक 7 मार्च 2025 को प्रात: 10 बजे हो गयी है। मृत्यु हृदयघात के कारण हुई है। आपको सूचित किया जाता है कि शव को लेने के लिए शीघ्र संस्थान पर आ जाएँ और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करके शव को ले जा सकते हैं। अन्यथा एक सप्ताह के बाद संस्थान के द्वारा लावारिस के रूप मे शव का अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा।

इतना सुनते ही शशिकांत ने कहा “आज तो 30 मार्च है”

मिथिलेश थोड़ा घबराते हुए और पत्र का अवलोकन करते हुए बोला “साहब मेरे पास भी दो दिन पहले ही ये डाक रिसिव हुई है, हद होती है साधारण डाक से भेजी इतनी ज़रूरी जानकारी”

फिर मिथिलेश अपने पक्ष को मजबूत करते हुए एकदम से बोला “साहब आपने तो फोन भी थाने का दे रखा है, वो भी डॉट फोन... ये तो अधिकतर खराब ही रहता है आजकल, रोज सड़क खुदाई मे कहीं ना कहीं टार टूटे रहते हैं। इन्होने फोन भी किया होगा तो मिल ही नहीं पाया होगा।

शशिकांत ने कहा “क्या ही पता फोन किया भी होगा या नहीं?”

फिर एक लंबी सांस छोड़ते हुए शशिकांत बोला “बहुत लंबे समय प्रायश्चित किया बेचारी ने, चलो मुक्ति मिल गयी”

मिथिलेश कुछ याद करते हुए बोला “साहब, ये वो ही महिला है क्या थाना इंचार्ज पुष्कर सिंह जी की पत्नी, वो जो कांड हुआ था”

शशिकांत ने उदासी के साथ कहा “हाँ वो ही है… चलो धन्यवाद तुम्हारा, एकबार संस्थान का फोन नंबर दिया हुआ होगा लेटर पर, बताओ जरा”

मिथिलेश ने पत्र का फोटो व्हाट्सएप कर दिया।

शशिकांत ने दिये गए फोन नंबर पर संपर्क किया तो फोन उठ गया। उधर से एक महिला ने रूखे और तीखे अंदाज़ मे उत्तर दिया “मानसिक स्वस्थय संस्थान एवं चिकत्सालय, आगरा, क्या चाहिए”

शशिकांत ने थोड़ा रोब के साथ कहा “शशिकांत, थाना अध्यक्ष बरोली बोल रहा हूँ”

फिर उसने सुनन्दा की डिटेल बताते हुए उसके विषय मे पूछा तो उधर से आवाज़ आई “रुको बताती हूँ”

फिर कुछ देर के लिए फोन शांत हो गया।

कुछ समय बाद महिला ने कहा “अरे आज फोन कर रहे हो, क्रिमेसन कर दिया। कितने दिन सड़ाते लाश को? क्या लावारिस मे ही भर्ती कारवाई थी या तुम्हारे परिवार से थी?”

शशिकांत ने कहा “लावारिस मे ही थी”

महिला ने पूछताछ वाले अंदाज़ मे कहा “इसके पति का नाम तो लिखा है यहाँ”

शशिकांत ने झल्लाते हुए कहा “स्वर्गीय लिखा होगा, ठीक से पढ़िये”

महिला ने देखा और बोली “अरे हाँ”

महिला शायद कुछ और भी कहना चाहती थी लेकिन तब तक शशिकांत ने फोन काट दिया।

फिर शशिकांत अतीत मे खो गया।

........

दारोगा के रूप मे नरपतपुर थाने मे तीसरी पोस्टिंग थी शशिकांत की। तब थानाध्यक्ष पुष्कर सिंह था। पुष्कर सिंह साँवला और आकर्षक व्यक्तित्व वाला पुरुष था। अपनी पत्नी के साथ थाना परिसर मे ही बने सरकारी आवास मे रहता था। विवाह के लंबे समय के बाद भी कोई संतान नहीं हुई थी। पुष्कर की पत्नी सुनन्दा पढ़ि-लिखी और एक सुंदर महिला थी। गौरवर्ण, सूडोल शरीर, बड़ी आँखें और सूडोल नाक। पुष्कर अपनी पत्नी से बहुत स्नेह करता था। पुलिस की नौकरी के कारण पुष्कर की दिनचर्या निश्चित नहीं थी। पूरे दिन, कभी-कभी तो पूरी रात भी वो बस ड्यूटी ही निभाता रहता था। सुनन्दा पढ़ी-लिखी महिला थी तो उसने एक कोचिंग खोल लिया था। पुष्कर ने भी कोई आपत्ति नहीं की।

कोचिंग के फर्नीचर का काम इदरीश नाम का मिस्त्री कर रहा था। उसके साथ ही कई बार उसका 24 वर्षीय बेटा वसीम भी कोचिंग आता था। वसीम पोस्ट ग्रेजुवेट और बात करने मे माहिर युवक था। वो सुनन्दा के और भी कई काम कर देता था। उसने कोचिंग मे कई बच्चो का एडमिसन भी करवाया था। इस तरह वो सुनन्दा से अक्सर मिलने लगा था। सुनन्दा को कुछ भी काम होता था तो वसीम तुरंत करने को तैयार रहता था। जबकि इसके लिए उसे कोई पैसा या तंख्वाह भी नहीं मिल रही थी। कई बार फर्नीचर की कुछ टूट-फुट भी वसीम ने लड़के बुलाकर करवा दी और सुनन्दा से कोई पैसा भी नहीं लिया। वो सुनन्दा को भाभी कहकर बुलाता था।

जब कोचिंग में छात्र बढ़ने लगे तो सुनन्दा को लगा कि किसी को नौकरी पर रख लेगी तो सही होगा। वसीम जो बिना किसी वेतन के सुनन्दा के बहुत काम कर रहा था और एडमिसन भी ला रहा था। सुनन्दा को उससे बेहतर कोई दूसरा नहीं लगा। सुनन्दा ने उसे ही नौकरी पर रखा लिया। अब लगभग पूरा दिन वसीम, सुनन्दा के साथ रहता था। वसीम ने कोचिंग के बच्चो के लिए कुछ टूर प्लान भी किए। इस तरह दोनों टूर पर भी साथ गए। वसीम अब सुनन्दा से बहुत खुल गया था। और अक्सर उसकी खूबसूरती और उसकी बुद्धिमतता प्रशंशा करता रहता था। अक्सर वसीम सुनन्दा की वेषभूषा की प्रशंशा करता था। बल्कि यदि वसीम कहीं बाहर जाता था तो सुनन्दा के लिए कुछ उपहार भी ले आता था।  

एकदिन सुनन्दा ने वसीम से यूं ही पुछ लिया “और वसीम अब तो घर वाले शादी के लिए लड़की ढूंढ रहें होंगे, या फिर तुमने ही कोई देख रखी है?”

वसीम ने शर्माते हुए कहा “नहीं भाभी मेरा एसा कोई चक्कर नहीं, घर वाले देख रहें हैं”

सुनन्दा : नौकरी वाली तो तुम्हें चलेगी नहीं, तुम लोगो मे तो बुर्क़े से बाहर भी नहीं आने देते।

वसीम : जाहिल हैं हमारे लोग भाभी, मैं तो बुर्क़ा कभी पहनाऊंगा नहीं, और रही बात नौकरी की, वो उसकी मर्जी जो चाहे वो करे मैं हर तरह से उसका साथ दूंगा, उसे पूरी आज़ादी दूंगा”

सुनन्दा बोली “तो कैसी लड़की चाहिए?”

वसीम ने एकदम से कहा “भाभी जैसी लड़की चाहिए वैसी तो मिलेगी नहीं”

सुनन्दा ने आश्चर्य से कहा “क्यों भाई, ऐसा कैसी लड़की चाहिए तुम्हें?”

वसीम ने थोड़ा शर्माते कहा “आपके जैसी भाभी, लेकिन मुझे पता है आप जैसी दूसरी तो कायनात ने भी नहीं बनाई होगी”

सुनन्दा सुनकर थोड़ा हसी और बोली “मुझमे एसा क्या है? जो मुझ जैसी दूसरी नहीं होगी?”

फिर सुनन्दा ने थोड़े हल्के फुल्के अंदाज़ मे कहा “क्या करें? ना ही तो मेरे कोई दूसरी बहन है और ना ही तुम हिन्दू, नहीं तो करवा देती तुम्हारी शादी उससे”

वसीम ने सर झुकाये हुए कहा “फिर तो आप हमारी भाभी जान से साली बन जाती”

सुनन्दा मुस्कुरा पड़ी।

वसीम बोला “गर कोई आप जैसी है तो मैं उसके लिए हिन्दू भी बन जाऊंगा, वैसे भी कभी हमारे पुरखे भी हिन्दू ही तो थे”

सुनन्दा ये सुनकर ज़ोर से हसते हुए बोली “रिवर्स लव ज़िहाद, भाई हमरे पापा तो जान ही दे देते अपनी, अगर उनकी लड़की ऐसा कर देती तो”

वसीम भी हस पड़ा और बोला “ज़िहाद जैसे शब्द को बदनाम कर दिया इन दहशतगर्दो ने...और मुस्लिमो को भी”

सुनन्दा भी सहजता से बोली “अरे ये सब पोलिटिकल प्रोपगैंडा है यार, मैंने तो मज़ाक किया था”

वसीम : कोई नहीं भाभी, देवरों से मज़ाक नहीं करेंगी तो और किससे करेंगी”

तभी एक लड़की आ गयी। आते ही उसने अपना बुर्क़ा उतारा। उसको देखकर सुनन्दा वसीम से बोली “देख लो हालात, बिना बुर्क़े के कहीं निकलने भी नहीं देते”

इसपर उस लड़की ने उत्तर दिया “नो मैम, दट्स माई चॉइस”

ये सुनकर सुनन्दा की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं। और वो बोली “मज़बूरी को चॉइस का नाम दे रही हो”

वो लड़की बोली “दीदी इंडियन और एसियन रीज़न मे सभी को बुर्क़ा या हिज़ाब पहनना चाहिए, ये स्किन टैनिंग और सन बर्न से बचाता है”

सुनन्दा ने हसते हुए कहा “तो खाली लड़की क्यों... लड़को को भी सन बर्न से बचना चाहिए ना, क्यों वसीम?

वसीम ने एक मुस्कुराहट से उत्तर दिया।

सुनन्दा ने हसकर कहा “देखो मै तो स्लीवलेस भी पहन लेती हूँ, मेरी स्किन तो कहीं टैन नहीं हुयी”

वसीम ने इस मौके को नहीं छोड़ा “अरे भाभी आपकी स्किन तो एसी लगती है जैसे दूध मे गुलाब की पत्तियाँ बिखेर दी हों”

सुनन्दा को ये प्रशंशा अच्छी लगी और उसके गाल शर्म से लाल हो गए।

फिर वसीम ने कहा “आप वेस्टर्न नहीं पहनती हो भाभी?”

सुनन्दा ने कहा “शॉर्ट्स तो नहीं लेकिन जींस, टी-शर्ट खूब पहनती हूँ, जब कहीं घूमने जाते हैं”

फिर सुनन्दा ने उस लड़की से कहा “फ़रजाना वैसे तू तो किसी हिन्दू लड़के से शादी कर ले, फिर खूब आज़ादी मिलेगी कपड़े पहनने की”

उस लड़की ने एकदम से कहा “या आल्लहा, अब्बू और भाईजान जान से मार देंगे मुझे, एसा सोचा भी तो”

........

सुनन्दा के कोचिंग का टूर प्लान हुआ था। शाम को जब कोचिंग मे सुनन्दा और वसीम रह गए तो वसीम ने सुनन्दा को एक गिफ्ट पैक दिया।

सुनन्दा ने उसे देखते हुए कहा “ये क्या है?”

वसीम ने कहा “भाभी मेरे एक दोस्त ने गारमेंट का काम किया है तो उससे ही सबके लिए लाया था। आपके लिए भी ले आया”

सुनन्दा ने हसते हुए कहा “जो सैलरी मैं तुम्हें देती हूँ वो तो तुम मेरे गिफ्ट्स पर ही खर्च कर देते हो यार”

वसीम ने आत्मीयता से कहा “आप भी तो हमारे परिवार की तरह ही हैं भाभी”

सुनन्दा ने वसीम के बालों हाथ फेरते हुआ कहा “अरे... देवर हो तुम मेरे”

वसीम ने मुस्कुराते हुए कहा “और दोस्त भी”

सुनन्दा ने ज़ोर देते हुए कहा “बिलकुल यार”

वसीम सुनन्दा के लिए एक जींस, शर्ट और जैकेट लाया था। शर्ट का गला बहुत गहरा था और जींस लो-वेस्ट थी।

सुनन्दा से वसीम ने कहा “मैंने तो देखे भी नहीं। बहन गयी थी साथ, उसने ही लिए। कैसे लगे भाभी?”

सुनन्दा ने कहा “सो बोल्ड, बट ब्यूटीफूल”

वसीम ने कहा “तो कल आप इनको ही पहनकर चलना”

सुनन्दा ने कुछ सोचते हुए कहा “ओके”

इस तरह कब वसीम और सुनन्दा के मध्य सारी मर्यादाएं टूट गयीं, पता ही नहीं चला।

........

वैसे तो पुष्कर को समय नहीं मिल पाता था लेकिन आज पुष्कर ड्यूटी के दौरान शाम को सुनन्दा के कोचिंग की तरफ ही था। तो उसने सोचा कोचिंग चलकर सुनन्दा को साथ ही ले लेगा।

कोचिंग किराये की इमारत मे बना हुआ था। पुष्कर ने बहुत अच्छा इंटीरियर और एकस्टीरियर करवाया था। पुष्कर कोचिंग के भीतर चला गया। अब कोचिंग मे कोई नहीं था। पुष्कर को एक आवाज़ आई, ये आवाज़ वसीम की थी। लेकिन ये सुनते ही पुष्कर एकदम से ठिठक गया।

वसीम की आवाज उसे सुनाई दी “भाभी जी आपका हुस्न तो पत्थर मे भी जान डाल दे”

सुनन्दा की मदहोश आवाज़ आई “अच्छा, ऐसा है क्या?”

वसीम: क्यों मेरी दिवानगी देखकर नहीं लगता…

इसके बाद वसीम की आवाज़ घुट सी गयी। फिर सुनन्दा की शिशकियों की आवाज़ आने लगी।

शशिकांत की आँखों के सामने अंधेरा छा गया था, वो जैसे पत्थर बन गया। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि भीतर उसकी पत्नी ही है।

उसकी आँखें लाल हो गयी थीं। उसने तेजी से आगे बढ़ते हुए केबिन के भीतर से लोक दरवाजे पर एक जोरदार लात मारी, केबिन का दरवाजा टूटकर कर अलग हो गया। भीतरा का दृश्य देखकर क्रोध में पुष्कर की लाल आंखो से पानी बह निकला। सुनन्दा और वसीम दोनों एकदम निर्वस्त्र होकर सोफ़े पर एकदूसरे से चिपके हुए थे।

सुनन्दा और वसीम घबराकर एकदूसरे से अलग होकर खड़े हो गए। वसीम ने भागने की कोशिश की लेकिन पुष्कर ने एक तेज मुक्का मारकर उसे एक तरफ गिरा दिया। वसीम मे इतनी शक्ति नहीं थी जो पुष्कर का सामना कर पाता। सुनन्दा घबराकर एक तरफ खड़ी हो गयी और अपने कपड़ो से अपने शरीर को ढकने का असफल प्रयास करने लगी।

पुष्कर ने सुनन्दा से कहा “इसके साथ तो नंगी लेटी थी तू, मुझसे बदन छिपा रही है”

सुनन्दा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी, उसने कहा “हम दोनों को माफ़ कर दो”

पुष्कर ने सुनन्दा से कहा “इसके लिए भी माफ़ी तू ही मांगेगी अब”

सुनन्दा को समझ नहीं आया कि वो क्या उत्तर दे, वो रोते हुए बोली “सुनो आप, एक बार मेरी बात सुनो”

वसीम ने नीचे गिरे हुए ही कहा “सर प्लीज एक बार बात तो सुनिए”

पुष्कर ने अपनी सर्विस पिस्टल निकाल कर एक गोली सीधे वसीम के सर मे दाग दी। वसीम लुढ़क गया और उसके खून की धार पूरे फ़र्श को सुर्ख़ कर दिया।

सुनन्दा ये देखकर रोते हुए एकदम से चुप हो गयी, कुछ देर मौन रहने के बाद वो बोली “ये तुमने क्या किया पुष्कर, क्या किया?

पुष्कर ने कहा “क्यों दुख हुआ इसकी मौत का”

सुनन्दा बोली “नहीं वो बात नहीं है लेकिन तुम पर अब मर्डर का चार्ज लग जाएगा”

पुष्कर ने एक तमाचा सुनन्दा को मारा और बोला “तेरे मुंहु से ये सब बातें अच्छी नहीं लगती”

ये पहली बार था जब पुष्कर ने सुनन्दा पर हाथ उठाया था।

सुनन्दा कुछ कहना तो चाहती थी लेकिन पुष्कर ने हाथ के इशारे से चुप कर दिया और बोला “अब मैं तेरे साथ तो रह नहीं सकता, तुझे मारकर तुझे तेरे पाप से भी मुक्ति नहीं दूंगा, लेकिन मैं भी इस बदनामी और बेइज्ज़ती के साथ नहीं जी पाऊँगा। मेरी मौत के बाद मेरा सब कुछ तुझे ही मिलेगा। खूब अय्याशी करना तू”

सुनन्दा कुछ समझ पाती इससे पहले ही पुष्कर ने अगली गोली खुद को मार ली और वो भी वहीं लुढ़क गया।

........

इस मामले को तब शशिकांत ने ही देखा था। तब बहुत ही चर्चा इस मुद्दे की रही, इस घटना को लेकर पुलिस कर्मचारियों के तनावपूर्ण और हर समय व्यस्त रखने वाली नौकरी के कारण उनके परिवार को समय ना दे पाने को लेकर बहुत सी बहसे हुईं। तो वहीं समाज मे भटकाव, समाज मे बढ़ती अश्लीलता को लेकर भी खूब बहस हुईं। लवज़ेहाद के नाम पर भी बहस के मोर्चे खुल गए।

शशिकांत ही इस घटना की जाँच रिपोर्ट बना रहा था। कोचिंग मे लगे सीसी टीवी कैमरे जिनमे आवाज़ भी रिकॉर्ड होती थी, उन्होने घटना को लेकर कोई भी संदेह नहीं छोड़ा था। सुनन्दा की गिरफ्तारी हुई थी।

कोई 4 महीने बाद सुनन्दा को रिहा कर दिया गया था। हालांकि उसका परिवार या कोई भी उसकी पैरवी करने या उसको देखने तक भी नहीं आया था।

छूटने के बाद सुनन्दा रात को थाने के उस सरकारी आवास के बाहर आकार लेट गयी जहाँ कभी वो अपने पति के साथ रहती थी। शशिकांत थाने मे ही था, उसे एक सिपाही ने आकर बताया। शशिकांत ने सुनन्दा को देखा। वो पहचान मे भी नहीं आ रही थी। पहले से दुबली हो गयी थी और आँखों के चारो तरफ गहरे गड्ढे और काले दाग बन गए थे। त्वचा एकदम रूखी हो गयी थी। बाल भी बिखरे हुए और रूखे थे। शशिकांत को कुछ सुझा तो उसने उसे खाने को दिया। वो चुप-चाप खाने लगी।

शशिकांत ने उससे कई सवाल किए, लेकिन उसने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने उसकी तरफ देखा तक भी नहीं।

अब सुनन्दा की दिनचर्या बस ये ही बन गयी थी। दिनभर वो पूरे शहर मे घूमती रहती थी। लेकिन शाम होते ही उस आवास के बाहर आकर लेट जाती थी। उसे कई बार वहाँ से हटाने की कोशिश भी की गयी लेकिन नहीं मानी। वो किसी से कुछ भी नहीं बोलती थी। वो आवास भी खाली ही था और फिर खाली ही रहा। सुनन्दा कभी उस आवास के भीतर भी नहीं गयी। बस बाहर ही लेटी रहती थी। समय के साथ सुनन्दा और भी अधिक बेसुध हो चुकी थी।

शशिकांत ने सुनन्दा के परिवार से संपर्क किया। लेकिन कोई भी उसको ले जाने को यहाँ तक कि उसके बारे मे कोई बात करने को भी तैयार नहीं था।

एक दिन एक वृद्ध दंपति थाने मे आए। दोनों ने सुनन्दा के विषय मे पूछा तो उन्हे शशिकांत के ही पास भेज दिया।

शशिकांत उन्हे देखते ही पहचान गया वो सुनन्दा के माता-पिता थे।

शशिकांत ने अभिवादन करते हुए कहा “नमस्कार बाबूजी, नमस्कार अम्मा”

दोनों ने शशिकांत को आशीर्वाद दिया।

शशिकांत से दोनों ने सुनन्दा के बारे मे पूछा, वो पूछते हुए हिचक रहे थे।

शशिकांत ने कहा “जी वो दिन भर कहाँ रहती हैं कोई नहीं कह सकता लेकिन शाम होते ही यहाँ आ जाती हैं, अपने क्वार्टर के बाहर, लेकिन मैं फिर भी दिखवाता हूँ”

शशिकांत ने एक सिपाही को बुलाकर सुनन्दा के विषय मे पता करने को बोला।

फिर शशिकांत हिचकते हुए बोला “क्या आप उन्हे बस देखने आए हैं या अपने साथ लेकर जाएंगे?...मैंने पहले भी आप लोगो से कहा था, वो अपना मानसिक संतुलन खो चुकी हैं। ले जाइये, पूरा दिन भटकती रहती है, कोई और अनहोनी गयी तो बहुत बुरा होगा”

बुजुर्ग महिला अपनी आँखों मे आँसू रोकते हुए बोली “अब इससे बड़ी अनहोनी क्या ही होगी? बेटो ने तो मना कर दिया कि वो आएगी तो हम नहीं रहेंगे इस घर मे, बहुए बोल रही थी बच्चे देखेंगे और सुनेंगे इस चरित्रहीन के बारे मे तो उनपर भी बुरा असर पड़ेगा, मरने दो जहाँ मर रही है। लेकिन जब सुना कि पागल हो गयी है, मारी-मारी फिरती है तो रहा नहीं गया। अब बेटे बहू से अलग ही कहीं रह लेंगे इसके साथ”

शशिकांत ने कहा “किसी ने कोशिश ही नहीं की, नहीं तो सर का फंड या बाकी कुछ जो होगा वो भी इन्हे मिल सकता है”

सुनन्दा के पिता बोले “अब क्या ही होगा इस सब से, बाकी उसके इलाज और भरण पोषण को जब तक हम हैं तब तक तो हम कर ही देंगे, फिर जो प्रभु इच्छा”

शशिकांत ने चाय मँगवा दी उनके लिए और खुद अपने काम मे लग गया। कुछ समय बाद उसको सिपाही ने आकर सूचना दी “सर वो मिल तो गयी लेकिन सिपाहियों के साथ तो आई ही नहीं”

शशिकांत ने पूछा “कहाँ है अभी?”

सिपाही ने कहा “घाट पर है साहब”

शशिकांत तुरंत उन बुजुर्ग दंपति के पास गया और उन्हे बताया।

शशिकांत उनको सुनन्दा के पास लेकर गया। दोनों बुजुर्ग सुनन्दा की हालत देखकर फुट-फुट कर रोने लगे। वो दोनों सुनन्दा के निकट गए लेकिन उसने उन्हे बिलकुल भी नहीं पहचाना। उसकी माँ ने उसके सर पर हाथ रखा तो उसने झटके से हाथ अलग कर दिया और हटकर बैठ गयी।

सुनन्दा की माँ ने उससे कई बार बहुत कुछ कहा, पिता ने भी कहा लेकिन सुनन्दा ने कोई उत्तर नहीं दिया। ना ही उन्हे पहचाना।

फिर उन्होने सुनन्दा को अपने साथ ले जाने के लिए गाड़ी मे बैठाने का प्रयास किया तो सुनन्दा चीखने लगी, लेकिन उनके साथ नहीं गयी। इस सब मे वहाँ और भी लोग इकट्ठे होने लगे जिन्हे पुलिस वहाँ से हटाने का प्रयास भी कर रही थी। लेकिन सुनन्दा अपने माता-पिता को स्वयं को स्पर्श भी नहीं करने दे रही थी।

शशिकांत ने उनसे कहा “कोई भी महिला, पुरुष या बच्चा जब इन्हे छुने की कोशिश करता है तो ये छूने तक भी नहीं देती। तब से आज तक किसी ने इन्हे बोलते हुए नहीं सुना”

सुनन्दा की माँ ने सुनन्दा का कंधा झकझोरते हुए कहा “क्या हो गया था नाशपीटी तुझे, कहाँ बुद्धि मलिन हो गयी थी तेरी? चल अब मेरे साथ चल, क्यूँ यहाँ अपना जनम खराब कर रही है”

तब सुनन्दा उस घटना के बाद पहली और आखरी बार बोली “आएंगे वो लेने, मेरा प्रायश्चित करने दो मुझे”

फिर सुनन्दा चली गयी वहाँ से।

उसकी माँ ने तब रोते हुए कहा “बस दामाद जी क्षमा कर दीजिये इसे, ले जाइए”

वो दोनों रोते-बिलखते हुए वहाँ से चले गए।

जब तक शशिकांत वहाँ रहा वो सुनन्दा का ध्यान रखता था। शाम को जब वो आ जाती थी तो उसके लिए खाने को कुछ ना कुछ भिजवा देता था।

सवा साल बाद शशिकांत का वहाँ से स्थानांतरण हो गया तो उसे सुनन्दा की चिंता हुई। शशिकांत ने अपने अधिकारियों से बात करके सुनन्दा को मानसिक स्वस्थय संस्थान एवं चिकत्सालय, आगरा मे भिजवा दिया। बहुत मुश्किल से सुनन्दा को लेकर गए थे वो। वहाँ शशिकांत ने अपना ही नाम लिखवा दिया था संपर्क सूत्र में, क्योंकि तब तक इस सदमे से कहो या समय, सुनन्दा के माता-पिता की भी मृत्यु हो चुकी थी।

बाद मे कुछ समय तक शशिकांत, सुनन्दा का पता लेता रहा। प्रारम्भ मे सुनन्दा को वहाँ रहने मे परेशानी हुई थी लेकिन बाद मे वो वहाँ सामान्य रूप से रहने लगी। लेकिन वो कभी एक भी शब्द किसी से नहीं बोली। 

वो मौन के साथ अपना प्रायश्चित कर रही थी। आखिर अब उसको मुक्ति मिल ही गयी।


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