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Yashwant Rathore

Romance Others


4.0  

Yashwant Rathore

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प्रेम नगर

प्रेम नगर

10 mins 187 10 mins 187



ये कहानी प्रेम नगर की हैं.

क्या ऐसा कोई शहर होता है , सिटी ऑफ लव ?

हां शायद आपकी ज़िन्दगी में भी होगा ।

आंख बंद कीजिए और याद कीजिए अपनी ज़िन्दगी के सबसे हसीन पल, आराम के लम्हें, वो प्यार के पल,

कुछ याद आया ...

आपका बचपन, आपकी स्कूल, आपका कॉलेज, पहला सच्चा प्यार, या अपना ससुराल या फिर ननिहाल.

क्या वो वक़्त याद आया जब आप सच में जिये थे?

जब जिंदगी का मज़ा आया था, जिसकी मिठास जब भी याद आती हैं तो ,वापस आपको अपने साथ वहीं ले जाती हैं. और आप एक सुकून से , उस प्रेम से भर जाते हो, उसी में खो जाते हो.. अह....

उन प्रेम भरे लम्हों को याद करके क्या वो शहर आपको याद नहीं आता, जिसकी गलियों से आपको मोहब्बत हो गई थी.

उस शहर के लोग आपके दिल में बसे हैं.

उस शहर के पार्क, खेलने का ग्राउंड, वहां के घर, दुकान, मंदिर सबकी यादें आप में उतनी ही ताजा हैं, जितनी उसकी याद जिसे आप अपना प्यार कहते हैं , या फर्क भी करना मुश्किल है.

हां फर्क करना मुश्किल है, क्यूंकि जब आप प्यार में होते हो ,तो सब को अपना लेते हो, उस शहर की गलियां भी जो निर्जीव हैं, वहां का पीपल का पेड़ भी और शेरू को भी,

शेरू कौन?

उस मोहल्ले का आवारा कुत्ता था, पर हमारा दोस्त, हमारी जिंदगी के प्यार भरे पलो में वो हमारे साथ था.

इस कहानी में , मै आपको साल के सिर्फ दो महीने की कहानी ही बताऊंगा, क्यूंकि उस समय हम ननिहाल आते थे और फिर अगले साल ही आ पाते थे.

2महीने की ही कहानी क्यूं?

क्यूंकि मै साल भर में बस दो ही महीने जीता था. बाकी समय तो बस गुजर जाता था.

मैं 1984 में जन्मा था, मेरा नाम जसू हैं.सब प्यार से यही कहते हैं, पूरा नाम जान के क्या करोगे, उसमे मिठास नहीं, उसमे मै भी नहीं.

सो ये 90 के दशक की कहानी है, जब में 6-7 साल का हो गया था और अपने दोस्तो को जानने लग गया था.

गर्मियों की छुट्टियों का हम साल भर इंतज़ार करते थे और परिक्षा खत्म होते ही मम्मी पापा से ननिहाल जाने की जिद किया करते थे।

पापा कभी ट्रेन में कभी बस में हमें वहां छोड़ आया करते थे.

इस शहर का नाम चितौड़ हैं, आप इसे चितौड़गढ़ के नाम से जानते हैं.

हां सिरमौर , हमारा मान चित्तौड़, पावन पवित्र भूमि, प्रताप का ओर चेतक का चितौड़, मीरा का चितौड़...

में अपने गांव में तो डरपोक बच्चे की तरह जाता था ,पर क्या था चित्तौड़ में, की, इस शहर की तरफ जाते समय मेरे मन से डर निकल जाता था.

प्यार का ये भी एहसास होता है ,जब आप प्यार में होते हो तो निर्भय होते हो.

बस से हमारा रूट जोधपुर से ब्यावर, फिर ब्यावर की घाटी से विजयनगर और फिर भीलवाड़ा से चितौड़।

ब्यावर की घाटी उस समय काफी खतरनाक मानी जाती थी, लूटपाट के भी किस्से आम थे ।

ब्यावर आते ही मेरा मन प्यार से भरने लगता था।

क्युकी वो चट्टान का कच्चे पत्थर, रोड़ के साइड के कैक्टस ओर एलोवेरा जोधपुर शहर से अलग थे और चितौड़ का फील देते थे. और में खुश हो जाता था.

सुबह के 6 बजे हैं, अप्रैल एंड हैं, साल 1991, चितौड़ का बस स्टैंड

सुबह की हल्की ठंडी भी लग रही, और कुमार सानू के गाने टैक्सियों में चल रहे है.

बस एक सनम चाहिए, आशिक़ी के लिए...........

पान की दुकानें खुली हुई है उसमे भी कुमार सानू के गाने

वो समय थोडा ठहरा हुआ था, लोग जल्दी में नहीं थे, सबके चेहरे पर मुस्कराहट थी, लोग मनमौजी थे, कोई कुमार के गानों में खोया था तो कोई

बातों में मगन

सब लोगो को देख कर ऐसा लगता था जैसे हवा में आशिक़ी घुली हैं

पापा ने टैक्सी के भाव तय किए ओर टैक्सी की, में अपने मम्मी पापा, बड़े भाई मुलू जो की मुझसे 3 साल बड़े हैं ओर छोटे भाई जीतू जो कि 3 साल छोटा है सब साथ थे.

इस टैक्सी में पीछे भी सीट्स थी, बैठ सकते थे, टैक्सी की आवाज़ सुबह की शांति में मधुर रस की तरह कानों में घुल रही थी.

हम साल भर चितौड़ की टैक्सी की इस आवाज़ का इंतजार करते थे.

बस स्टैंड से टैक्सी कलेक्ट्रेट सर्किल से होते हुवे, शास्त्री नगर की तरफ मुड़ी।

शास्त्री नगर, जी हां यही है हमारा प्रेम नगर.... अह....

कलेक्ट्रेट से बाई तरफ मुड़ते ही प्रेम नगर की सड़क आ जाती हैं, घूमते ही छोटी सब्जी मंडी हैं.

अभी तो सारे बक्शो पर ताले जड़े हैं, कहा था ना समय ठहरा हुआ था, लोग आराम से आते थे, सभी मुस्कुराते थे और कॉम्पटीशन की बीमारी नहीं थी.

लोग ऐसे थे कि घर चलाने जितना पैसा आये, ओर फिर सब ऐश करते थे, रात भर ताश का खेल चलता रहता था.

सब्जीमंडी के थोडा आगे ही उसके सामने वॉटर बॉक्स का ऑफिस था, वहां हमारे बीच वाले मामाजी(मनोज मामा) काम करते थे, उनका बिल डिस्ट्रीब्यूशन का काम था। पूरा चितौड़ इनको हीरो मामा के नाम से जानता है.

उस जमाने में भी रेड शर्ट, 3,4 तरह के बेल्ट, 3,4 तरह के कंघे और हमेशा टिप टॉप कपड़े प्रेस किए हुवे पहनते थे, आज भी उनका यही स्वभाव हैं.

वो हीरो बनना चाहते थे, नीलू जो कि राजस्थान फिल्म इंडस्ट्री की फेमस अदाकारा थी, उनके साथ एक दो स्टेज शो किए, फिर बात नहीं बनी, पर आज भी शोख ओर तेवर वहीं हैं।

मामाजी काफी हसमुख स्वभाव के है ओर मामिसा भी , सो इनके साथ बनती भी ज्यादा थी, दिन भर इन्हीं के कमरे में रेसलिंग (WWF) देखा करते थे.

रॉक हम सब का फेवरेट था ओर अंडर टेकर भी.

थोडा सा आगे चलते ही, राइट साइड मुड़ते ही, आइसक्रीम वाले बंसिलालजी, उनका घर ही उनकी दुकान था, घर में ही आइसक्रीम बनाते थे और किराना वाले सेठजी जी की दुकान थी,उनके पास वाली दुकान हमारे नाना की थी.

कॉर्नर वाली भी एक दुकान थी, उसपे वाडीलाल लिखा था, वाडीलाल आइसक्रीम के टीवी में एड भी आते थे, सो उस दुकान पर कभी गए ही नहीं, लगता था, काफी महंगी आती होगी.

नाना का नाम भगीरथ सिंह जी था, नाना चक्की चलाते थे, इस चक्की से उन्होंने खूब कमाया, अपने दो बेटियों की व तीन बेटों की शादियां की, प्रेम नगर में मकान बनाया।

नाना बहुत खुश मिजाज इंसान थे, बच्चो के साथ बहुत मस्ती करते थे.

नाना को सारा मोहल्ला ठाकर साहब कहता था, एक तो पूरा मोहल्ला बनियो ओर ब्राह्मणों का था बस एक एक घर ही अन्य जातियों के थे, ओर नाना हस्टपुष्ठ थे और बात के पक्के थे.

दूसरा उस समय चितौड़ में कच्छा बनियान चोर गिरोह का आतंक था, और नाना एक दो बार उनसे लड़ भी लिए थे.

नाना की चक्की के सामने ,रोड के दूसरी तरफ लॉन्ड्री की, स्त्री करने की दुकान थी.

नाना से मस्ती करते समय नाना हमें पैरों तले दबा दिया करते थे ओर हम सब भाई जान लगा कर भी हटा नहीं पाते थे. हम बच्चे फिर बात करते थे कि नाना बहुत ताकतवर हैं.

नाना को जीवन जीना आता था, घर की हर जरूरी चीज में वो कंजूसी नहीं करते थे, कम पैसों में भी उनकी लाइफस्टाइल बहुत अच्छी थी.

घर में 2,3 कूलर, टीवी, लैंडलाइन फोन सब आवश्यक सामग्री थी.

नाना के कमरे में हम जमीन पे बस तकिया लगा के सो जाते थे, फर्श बहुत ठंडा ठंडा लगता था.

सेठजी की दुकान से नाना टोफी जरूर दिलाते थे, सेठजी की स्माइल अभी भी हमारे मन में छपी हैं, वो क्या जो अब सेठजी नहीं रहे ओर 2 साल पहले ही नाना भी चल बसे ओर 11 महिने बाद मां (नानी) भी.

ऐसा लगा जेसे एक युग अपनी जिंदगी जी के चला गया.

नाना की दुकान से सटे ही मंदिर की दीवार हैं, ये कृष्ण जी का मंदिर है.

फिर बाएं लेते हैं ही बड़े बड़े बंगले हैं, यहां के लोगों के पास काफी पैसा हैं, एक बंगले में शिव की मूर्ति से गंगा बहती थी, उसको देखना बड़ा अच्छा लगता था, सोचते थे ये पानी कहां से आता है.

घर काफी बड़े बड़े ओर खुले खुले थे.

कॉर्नर पे ही एक दुकान है ये कम ही खुलती हैं, इसके दरवाजे लकड़ी के है, ओर दरवाजे भी काफी बड़े हैं. ये भी किराना स्टोर हैं.

मुझे याद है, चोबेजी के लड़की गुड्डी दीदी ने एक बार यहां से शैम्पू मंगवाया था.

इससे राइट होते हुवे फिर फर्स लेफ़्ट लेना हैं।

लेफ़्ट लेते ही दूसरा घर हैं राइट साइड में, जिसके पहली मंजिल पर एक कमरा ओर खिड़की है , यहां एक दर्जी अंकल बेठ ते थे, नाना हम सब के यही से कपड़े सिलवाते थे.

उनकी स्माइल भी बड़ी प्यारी थी, ऐसा लगता था सब हमसे मिलके बड़ा खुश होते थे.

फिर राइट लेना था, पर इसी मोड़ पर फ्रंट मकान, यानी पूरी गली से जो मकान दिखता ,. ये संतोष जी डॉक्टर साहब का मकान हैं.

ये हमेशा व्यवहार से भी डॉक्टर ही लगते थे ओर अब भी लगते हैं.

इनके घर के बाहर पट्टी थी कुते से सावधान.

इनके घर भी हम अक्सर जाते थे.

फिर इसी गली में सेकंड लास्ट, लेफ्ट साइड में हमारा घर आने वाला था, हमारी धड़कने बड़ जाती थी.

बीच में राघव का मकान जो हमारे सबसे छोटे वाले मामा( विक्रम मामा) का दोस्त था, अक्सर हमारे घर ताश खेलता था.

विक्रम मामा हमसे 11-12 साल ही बड़े थे ओर उस समय कॉलेज में पड़ते थे, उनकी शादी भी नहीं हुई थी, वो भी हमारे साथ अक्सर खेलते थे, जेसे सतोलिया ओर मार दड़ी.

फिर बिजेलालजी जी का घर था, जो दूध बेचा करते थे, उनसे थोडा आगे सामने की तरफ किराने वाले सेठ जी का फिर एक घर छोड़ के हमारा, हमारे से दीवार लगते ही पड़ोसी थे, चोबे पापा, चॉबेजी का घर था.

हमारे घर के सामने ही ' सिमा' का घर था, जिसकी भी यह कहानी हैं, उसके साथ वाले घर में धीरज ओर गरिमा दीदी रहते थे.

उनके छत पर कैरम बोर्ड रखा रहता था.

सीमा के घर के पास के 2 प्लॉट खाली थे, फिर लास्ट मकान मेरे जिगरी दिनेश ओर अनिल का था, ये मीणा थे कोटा के ,इनके पिताजी यहां काम करते थे सो किराए का मकान लेके रहते थे, ये भी विक्रम मामा के अच्छे दोस्त थे.

कलेक्ट्रेट से प्रेम नगर की तरफ मुड़ने के बाद 1.25 किलोमीटर का रास्ता है ये बस, पर सारी जिंदगी, प्यार ,इश्क़ सब इसमें समाया है.

टैक्सी घर आती हैं। वैसे ये घर अब बहुत छोटा लगता है पर बचपन में बहुत बड़ा लगता था, पूरा स्टील चद्दर का बड़ा सा गेट हैं. मम्मी घंटी बजाती हैं.

मेरे मासोसा चंदेरिया में रहते हैं, उनका ट्रांसपोर्ट का बिजनेस हैं, वो चितौड़ से सिर्फ 5km है,  सिंटू ओर नीटू , मसोसा के लड़के भी हमारे आने से पहले यहां आ जाते थे, सिंटू अक्सर यही रहता था, 🐒 कैप पहना रहता था, उसे अस्थमा की प्रॉबलम थी, ओर सुबह सुबह हल्की सर्दी रहती थी. ये मेरे ही उम्र का था और हम बहुत जोड़ीदार रहे, बहुत सारी मस्ती में।

सबसे बड़े मामा कलेक्ट्रेट में ही काम करते हैं. वो बड़े सज्जन पुरुष हैं, उनका रहन सहन , तरीका एक सोबर सरकारी आदमी सा था, बड़े वाले मामीसा से हम सब बच्चों को डर लगता था उनकी बड़ी बड़ी आंखो से हम डरते थे, वो गुस्सैल स्वभाव के लगते थे, उनके कमरों में जाने की हिम्मत ना होती थी. मम्मी जब होते थे तभी जा पाते थे.

डर का ये आलम था कि वो नाश्ता भी कराते थे तो निवाले बड़ी मुश्किल से उतरते थे, मन करता था, जल्दी जल्दी खा कर नीचे चले जाएं.

बड़े वाले मामा के दो बच्चे - निक्की ओर अन्नू , बीच वाले के तो 1991 में बच्चे नहीं थे, बाद में विनय,विनीता व बॉबी हुवे, छोटे वाले मामा की उस वक़्त शादी नहीं हुई थी.

सो हम तीन, सिंटू,नीटू, अन्नू निक्की, यही हमारी दुनिया थी.

मम्मी ने फिर घंटी बजाई....

नानी को पता ही था हम आने वाले हैं, वो खुशी से चिल्लाती हुई आती हैं

अरे ये कोन आया र, कौन आया र, उनकी आवाज़ सुन के हमारी खुशी का ठिकाना ना रहता

नानी - सिंटू देख, कमला( मेरी मां) आगी, मूलू होर आग्या.

मेरी मां सबसे बड़ी बेटी थी, उनके ३ भाई ओर एक छोटी बहन हैं।

मम्मी को सब जीजी कहते हैं.

इस कहानी में बहुत सारे पात्र हैं ओर सब की अपनी अपनी कहानी हैं, पर कहानी बहुत दिशाओं में ना चली जाएं सो इसको ' सिमा' ओर मुझ तक ही रखूंगा ओर कुछ जरूरी पात्रों को.

नानी गेट खोलती हैं, हम सब पैर छूते हैं, राजू मामा ( सबसे बड़े वाले मामा)

भी पहली मंजिल से हमें देख के खुश हो रहे हैं, वो भी नीचे आते हैं.

बरामवदा में हम सब बैठ जाते हैं, नाना , सब मामा और मामिसा भी आ जाते हैं, सब हमें देख के बहुत खुश होते हैं ओर सब के चेहरे पर स्माइल होती है.

तब तक सिंटू भी जग जाता है, वहीं 🐒 कैप पहने, ओर मुंह में दूध की बोतल, सिंटूं कई सालो तक, दूध की बोतल में ही दूध पिता था, बड़ी मुश्किल से उसकी आदत गई.

सिंटू हमारी मां (नानी) का सबसे लाडला दोहिता था ओर अक्सर यहीं रहता था.

सिंटू हमारे पास आ जाता है, हम सब एक दूसरे की आंखों में देख मुस्कुराते है.

इसी बीच मां चाय बना के लती, वहीं स्टील के कप, दिखने में बहुत बड़े ओर उनमें चाय बहुत कम आती थी.

बरामवदे में काले गोल स्विच देख के भी मजे आ रहे थे, ऐसे जोधपुर में नहीं थे.

उधर ही मीटर था, ओर मीटर के पास लाल दंत मंजन रखा था, पाउडर वाला, जिसे हम उंगली से मंजन किया करते थे, ओर घर के बाहर वाली नाली में थूकते थे ओर देखते थे कि कितना दूर तक गया हैं.

इक रोज़ में ही खत्म हो जाए ,ये वो कहानी नहीं.

मुझ में घुली हैं जिंदगी, इसमें इतनी आसानी नहीं

जारी हैं....



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