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V. Aaradhyaa

Abstract Drama

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V. Aaradhyaa

Abstract Drama

पराई नार जो लखिहौँ (भाग -6)

पराई नार जो लखिहौँ (भाग -6)

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(भाग -6)


मधुमास के दिनों में अगर किसी नवविवाहित जोड़े को विरह का दर्द सहना पड़ जाए तो कैसा लगेगा...?


ऐसा ही कुछ सहना पड़ रहा था भव्या और शिशिर को। इधर बाहर की दुनिया में चाहे कुछ भी हो रहा हो... लेकिन भव्या का मन हमेशा पति के सानिध्य के लिए विकल रहता था।


वह बहुत ही बेसब्री से शिशिर का इंतजार कर रही थी। और शायद उधर शिशिर की मनोदशा भी कुछ ऐसी ही थी। क्योंकि वह इस बार दो दिन पहले ही आ गया था।

वैसे तो शिशिर को शनिवार को आना था लेकिन इस बार वह गुरुवार को ही आ गया था और इस सरप्राइस से भव्या एकदम खुशी से पागल हो गई।


वह समझ गई थी कि...उसकी तरह ही शिशिर भी उसके सानिध्य के लिए व्याकुल रहता है। और क्यों ना हो भला...?

आखिर... उनकी नई नई शादी हुई थी।


मधुमास के दिनों में अगर किसी नए विवाहित जोड़े को विरह की दिन देखने पड़ जाएं तो उनकी क्या हालत होगी...? कुछ कुछ यही हालत शिशिर और भव्या की भी हो रही थी।


यूँ शिशिर को समय से भी पहले आया हुआ देखकर खुशी के मारे भव्या के तो पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।


इधर... शिशिर की बेताबी का भी तो कोई अंत नहीं था। वह भी तो बस भव्या के साथ समय बिताना चाहता था और उसको देखने के लिए ही तो इतना व्याकुल होकर दो दिन पहले चला आया था। ना जाने उसे अपने साहब की कितनी मेहनत करनी पड़ी थी तब जाकर कुछ दिन की छुट्टी मिली थी। इसलिए वह ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पत्नी के साथ गुजारना चाहता था और इस छुट्टी का सही मायने में सदुपयोग करना चाहता था।


इधर भव्या भी तो कब से व्याकुल थी। उसे तो शिशिर को बहुत कुछ बताना भी था। लेकिन इस समय उसे कुछ भी याद नहीं था। सिवाय इसके कि शिशिर बहुत दिनों के बाद घर आया है और उसे अपने पति के बाहुपाश में स्वर्ग जैसा आनंद आ रहा था।

दद्दा भी शिशिर से काफी सारी बात करना चाहते थे। लेकिन उस वक्त दलान पर कुछ लोग आए थे।

जब शिशिर आया तो दद्दा दालान पर ही मिल गए थे। उन्हें प्रणाम करने के बाद जब वह भव्या से मिला तो पूरी दुनिया को ही भूल गया वेदर भव्या भी अपने पति के बांहों में अपनी सारी जिम्मेदारी भूलकर बिल्कुल उसके प्यार में खो गई।


एक दूसरे के सानिध्य में दोनों को पता ही नहीं चला... कि दोनों कब तक एक दूसरे में खोए रहे और कुछ देर तक भव्या एक तक शिशिर को देखती रह गई थी उसे लग रहा था ना जाने कितने जन्मों के बाद वह शिशिर को देख पा रही है।


आज ना तो भव्या को यह याद रहा था कि उसे शाम की संध्या बाती की थाली तैयार करनी है या फिर रात के रसोई की तैयारी करनी है।


यहां तक कि... आज भव्या को इतनी भी सुध नहीं रही थी कि...वह अक्सर शाम को अपने दोनों देवर अनुज और अनूप को पढ़ाया भी करती थी और उन्हें कुछ अलग सा नाश्ता बना कर भी खिलाती थी। और सब मिलकर हंसते बोलते शाम को एक साथ बैठकर भुंजा भी तो खाते थे।

अक्सर शाम को त्रिशाला मौसी कंसार से भुजा भुजा कर ले आती और बड़े शौक से खाती थी। भव्या को भूंजा बहुत पसंद था। और सबसे ज्यादा उसे पसंद था चना और गेहूं का भूंजा खाना। उस पर से उसमें त्रिशाला मौसी जो प्याज और हरी मिर्च और थोड़ा सा सरसों का तेल मिला देती....फिर तो जो आनंद आता तो कहना ही क्या...!


लेकिन आज उसे यह भी याद नहीं था।

इधर शाम को खेल कर जब दोनों भाई घर आए तो अनुज और अनूप अपनी भाभी को नहीं देख कर व्याकुल हो गए।


उन्होंने त्रिशाला मौसी से पूछा,

" भाभी कहां है मौसी? "


अनुज सबसे छोटा था और भव्या उसे बहुत प्यार करती थी। छोटे भाई की तरह उसे पढ़ाती भी थी। और उसे बहुत प्यार भी किया करती थी। इसलिए अनुज ने लाड में आकर कहा,


" जल्दी से भाभी को बुलाओ! मुझे भूख लगी है। वह शाम में कुछ नाश्ता नहीं बनाएगी?क्या और मुझे गणित के कुछ सवाल भी हल कराने हैं? आखिर भाभी है कहां पर...? और भैया कहां गए....? वह इस बार हमारे लिए क्या लेकर आए हैं...?


अनुज ने इतने सारे सवाल कर दिया कि त्रिशाला मौसी की समझ में नहीं आया कि वह क्या जवाब दें कि....

तभी अनूप भी बोल उठा,


"मौसी! आज तो भैया बाहर ही नहीं दिखाई दिए। लगता है...भैया भाभी अपने कमरे में हैं चलो उनको बुलाते हैं!"


दरअसल शिशिर जब भी शहर से आता था तो अपने दोनों छोटे भाइयों के लिए काफी सामान लेकर आता था।


तरह-तरह के रंगीन टी-शर्ट कमीज और भी काफी सारी चीजें। इसी के क्या आकर्षण में अनुज बिल्कुल नहीं रह पा रहा था। और अनूप भी चाह रहा था कि...

भाभी उसे कुछ अच्छा सा बनाकर खिलाएं उसके साथ समय बिताएं और भैया जल्दी से अपना लाया हुआ सामान दिखाएं।


त्रिशाला मौसी इन दोनों भाइयों को समझाते हुए बोली कि,


"अब थोड़ी देर में दोनों निकलते होंगे। रुको तब तक मैं तुम दोनों के लिए कुछ बना कर ले आती हूं!"


अब जब बहुत दिनों बाद त्रिशाला मौसी रसोई में कुछ बनाने गई तो उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कैसे बनाएं....?


क्योंकि...इतने दिनों से जबसे भव्या ब्याह कर आई थी तब से तो त्रिशाला मौसी को उसने रसोई का ज्यादा काम नहीं करने ही दिया था। वह बस ऊपर का काम कर दिया करती थी। इसलिए उन्हें अभी शाम का नाश्ता बनाना बहुत भारी पड़ गया और दूसरी तरफ वह भव्या को भी परेशान नहीं करना चाहती थी। इसलिए जल्दी से चिवड़ा भूनकर के दोनों भाइयों के लिए लेकर आई।


पहले का समय होता तो दोनों भाई यही चिवड़ा देख कर खुशी से नाचने लग जाते। लेकिन आज वह दोनों इसे देखकर बिल्कुल भी खुश नहीं हुए।


दरअसल भव्या ने उन्हें तरह-तरह के अलग तरीके का नाश्ता खिलाकर दोनों की आदत बिगाड़ दी थी। इसलिए उन्हे अब तो त्रिशाला मौसी के हाथों का स्वाद पसंद नहीं आ रहा था। वह दोनों तो अपने भव्य भाभी के हाथों का ही खाना पसंद करने लगे थे।


किसी तरह त्रिशाला मौसी ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि...


" रात का खाना भाभी अच्छा बना देगी, अभी तुम लोग यही खा लो!"

दोनों मुंह बनाते हुए खाने लगे कि तभी दद्दा आ गए...


उन्होंने भी त्रिशाला मौसी से पूछा कि,


" मौसी! शिशिर कहां है...?जब से आया है तब से सिर प्रणाम पाती के बाद पता नहीं कहां गया...? कब से तो उसने अपना मुंह ही नहीं दिखाया है। और दुल्हिन भी दिखाई नहीं दे रही। उसने ने भी आज मेरे संध्या बाती की थाली नहीं सजाई!"


यह कहते हुए दद्दा की आवाज में थोड़ी झुंझलाहट सी थी। जिसे त्रिशाला मौसी ने बहुत अच्छी तरह महसूस किया था।

इधर...अनुज और अनूप मुंह बनाते हुए किसी तरह चिवड़ा खा रहे थे।


उधर त्रिशाला मौसी सोच रही थी कि...

इतने कम समय में ही इस बहुरिया ने सबके दिल पर अपनी छाप छोड़ दी है।

इस घर में तो उसके बिना काम ही नहीं चल सकता।

भला क्या जादू जानती है....यह बहुरिया कि सब उसके कायल हो गए हैं...!!!


क्रमश :



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