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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Romance

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Romance

पहले अपने पैरों खड़े तो हों

पहले अपने पैरों खड़े तो हों

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(मुहावरा--अर्थ आत्मस्वालम्बी होना ) 

गंगा अपने पति के साथ अभी अपने गांव की सीमा में आई ही थी कि काली घटा घिर आई। बेमौसम की घटा व पवन के झोंके उसे अपनी ओर चुम्बकीय आकर्षण से खींचने लगे। वह पति राघव की गाड़ी से उतर सड़क के किनारे बनी पगडण्डी में पैदल चलने लगी।अपने खेत गांव को देख आह्लाद से भर गयी।

तभी उसे पड़ोस की रमिया काकी खेत में घास काटते दिखी। हर्षातिरेक में गंगा ने वहीं से काकी को आवाज लगाई। गंगा की आवाज सुनकर घास का गट्ठर बनाती काकी के हाथ वही के वहीं रुक गये। अरे बिटिया गंगा!तुम कब आई और अकेली कैसे ??

गाड़ी की ओर इशारा करते हुए बोली ,काकी तुम्हारे जमाई बाबू गाड़ी में बैठे हैं मैं तो तुम्हे देखते ही भाग आयी। काकी कुछ कहती गंगा काकी की सब्जी तुड़ाने लगी। काकी ने घुमड़ते बादल व कड़कती बिजली देख कहा चल बिटिया गंगा !! बदली से ,अंधेरा हो रहा , घर चलते हैं। गंगा झट काकी का घास का गट्ठर सिर में रख आगे बढ़ने लगी।

तभी राघव की नजर गंगा पर पड़ी उसने चुपचाप 3-4 पोज लिये ही थे कि गंगा की नजर फोटो लेते राघव पर पड़ी साथ में काकी के होने से लजाती तेजी से आगे बढ़ी कि पत्थर की ठोकर से संतुलन बिगड़ने से गिरती गंगा को राघव ने हाथ से थाम गाड़ी में बिठा दिया ,काकी भी पीछे बैठ गयी।

राघव की नजरों से नजरें मिलते गंगा को आज से 2 साल पहले का दृश्य चलचित्र की भांति कौंध गया।

गंगा के पिता के पास बामुश्किल 4 बीघा खेत सींच वाले थे। खेती से कुछ खर्च निकलता, बाकी पिता भाई दूसरे के खेत बटाई के ले लेते। पिता ने बहुत चाहा कि बड़ा बेटा रमेश पढ़कर कोई नौकरी में लग जाये तो घर की दशा सुधर जाये। पर उसका मन ही न लगा गांव के लड़कों की संगत में बिगड़ता देख, पास के गांव की लड़की रमा से 22 साल में ही शादी कर दी थी बहू आ जायेगी तो काम में हाथ बटायेगी।गंगा पढ़ने में बचपन से बहुत होशियार थी।मां बाप ने अनपढ़ होते हुए भी उसे गांव के लोगों के विरोध के बावजूद शहर में पढ़ने को भेजा था। गंगा ने भी उन्हें निराश नहीं किया था।12 वीं में जिला में प्रथम स्थान आया था। पर इसका उसे रंचमात्र भी घमंड नही था। अब कृषि से बीएससी कर रही थी। खेत-खलिहान घर के काम करने में उसे कोई संकोच नहीं था उल्टे प्रफुल्लित हो जाती।गंगा के काॅलेज में गर्मियों के अवकाश चल रहे थे। मां ने तो बहुत मना किया था अकेली न जा। बापू बड़े भाई को साथ लेकर पड़ोस के गांव में छप्पर बनाने गए थे। भाभी अपने मायके गई थी। घर में गंगा व छोटा भाई था। मां को 2 दिन पहले आये बुखार के कारण अभी भी कमजोरी लग रही थी। गाय को कुछ खाने को ही हो जाएगा उसके दूध से कुछ खर्च निकल आता था खायेगी नहीं तो दूध कैसे निकलेगा। खेत से सब्जियां भी तोड़ लाएगी तो शाम को बनाने के लिए हो जाएंगी। गंगा मां को कह कि मैं बस अभी थोड़ी देर में आई, छोटे भाई को मां के पास छोड़ घास लाने को कह चली गयी।

अभी मुश्किल से आधा घंटा हुए होंगे खेत आये ,बादलों को घिरते देख गंगा जल्दी-जल्दी हाथ चला घास काट गट्ठर सिर में रख चलने को हुयी कि सामने देखा कोई उसे छिपी नजरों से देख रहा है। कुछ कहती इसके पहले गट्ठर भारी होने के कारण गिरती गंगा को अजनबी ने हाथों से थाम लिया।गंगा धन्यवाद कह तेज कदमों से अपने घर चली गयी। गंगा की चितवन तो राघव का दिल ही साथ ले गयी। गंगा थी ही इतनी सुन्दर मासूम उस पर शिक्षित। रात वह अपनी ननिहाल में रुका तो मामा के लड़के से उसके बारे मे बताया मात्र 1 साल का उम्र में बड़ा होने के कारण दोनों में प्यारा दोस्ताना था। उसकी बतायी कदकाठी से उसे गंगा के होने का अनुमान लग रहा था फिर भी निश्चित करना चाहता था। राघव की रात पलकों में कटी  

प्रातः दोनो मार्निग वाक को निकले ही थे कि दूसरी ओर से गंगा ताजी सब्जियां लाती दिखी। गंगा को देख राघव जड़ सा मंत्रमुग्ध हो उसे देखने लगा।"राधे भइया नमस्ते!! आप कैसे हैं शहर से कब आये "। गंगा की आवाज सुन राघव की चेतना लौटी। ये सोचकर कि भैया तो अच्छे से जानते हैं ,उसके चेहरे में मंद मुस्कान फैल गयी।गंगा के आगे निकलते ही राघव ने कहना शुरू किया भाई अब तो मेरा बेड़ा तुम्हीं पार लगा सकते हो। राधे ने कहा ,भाई वह लड़की सीधी भी है तो टेढ़ी भी कम नहीं। कह नहीं सकता ,है तो अपनी जात-बिरादरी की। पिता की स्थिति तो बहुत कमजोर है पर पूरी शेरनी है पूरा गांव प्रशंसा करता है। फिर भी भैया मेरे लिए आपको बाबू जी को भी समझाना पड़ेगा। राघव के जाने के बाद राधे ने अपने पिता से ही बात चलानी उचित समझी।उन्होंने गंगा के पिता बलराम से बात चलाई तो साफ कह दिया" भइया आप ही एकबार गंगा से पूछ लो"।तभी बाहर से आती गंगा ने धनीराम काका को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया। आओ-आओ बिटिया कब तक की छुट्टी हैं।बस काका और 10 दिन बचे पढ़ाई भी 1 साल की अभी बाकी हैं फिर आगे का देखूंगी। गंगा की मां ने कहा, "बेटा काका सोना बुआ के लड़के के साथ लगन के लिए तेरी रजामंदी चाहते हैं"।"काका बस मैं कोई पूर्ण शिक्षित व अपने पैरों पर खड़े इंसान से ही ब्याह करना चाहती हूं पिता के बल पर नहीं। बाकी आप अम्मा बाबू जी जैसा ठीक समझें "। धनीराम जी जानते थे कि राघव का पढ़ाई-लिखाई में मन ही नहीं लगता था। किसी तरह बीए पास कर 1 साल से घर बैठा था पिता अच्छे असामी थे।बात यहीं अटक सकती थी। घर पहुंच राधे को पूरी बात बता दी। राधे ने कहा,बाबू जी उसने कुछ गलत बात नहीं कही लड़की में आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा है आप तो बचपन से देख रहे हैं। बात तो तुम्हारी सही है लड़की हीरा है सोना का घर खुशहाली से भर जायेगा।राघव 4 बहनों का इकलौता भाई होने के कारण थोड़ा जिद्दी भी था उसने अपने घर जाकर स्पष्ट शब्दों में कह दिया शादी करेगा तो गंगा से अन्यथा नहीं। धनीराम जी फोन करने वाले ही थे कि राघव के पिता का फोन आ गया। उन्होने गंगा की बात बता उनसे गंगा के परिवार की जानकारी चाही। "परिवार तो जीजा जी आपकी हैसियत का दशांश भी नहीं लड़की ऐसी खोजे से भी न मिलेगी"। "मन टटोलें " तब उन्होने पूरी बात बता दी।दूसरे ही दिन राघव मामा के घर अकेला ही आ गया। मामा ने बहुत समझाया ,उसने मामा से कहा बस एक बार आप गंगा से बात करा दीजिए। भाई के सामने करूंगा। मामा जी ने गंगा के पिता को पूरी बात बता गंगा के साथ आने को बुला

भेजा।गंगा का जवाब वही था मुझे आपमें कोई कमी नजर नहीं आती पर मैं आत्मनिर्भर पति चाहती हूं जो अपने परिवार की देखभाल स्वयं कर सके। राघव ने कहा, "क्या तुम भी मुझे चाहती हो "? यहां चाहने न चाहने की बात नहीं बस आप अपने पैरों खड़े होकर दिखाइये।

राघव बोला, "क्या मेरे शर्त पूरा करने तक मेरा इंतजार करोगी "? अगर ये बात है तो मैं आपकी वाग्दत्ता हुयी आपका आजीवन इंतजार करूंगी।आजीवन नहीं बस 2 वर्ष। मैं अपने प्यार को सिद्ध कर दिखाऊंगा।बस यही एक बात राघव के जीवन का लक्ष्य बन गयी।

सच में जो लड़का पढ़ाई के नाम से होशियार होते हुए भी बचपन से भागता था ,उसने लोअर पीसीएस पास कर चकबन्दी अधिकारी के पद को गृहण करने के 6 माह बाद गंगा के साथ ही शादी की। अब तक गंगा का चयन भी ग्रामविकास अधिकारी पद पर हो गया था। 

कुछ भी हो प्यार ने राघव को कहां से कहां पहुंचा दिया। इतना प्यार करने वाला पति जिसने असंभव को संभव कर दिखाया वह गंगा के लिए क्या न करेगा। गंगा खुशी-खुशी राघव की हो गयी। गंगा ने कभी परिवार वालों को शिकायत का मौका न दिया। परिवार वालों ने भी गंगा को बेटी से बढ़कर प्यार दिया।गंगा गंगा !!कहां खोई हो ? उतरो घर आ गया देखो मेघ भी बारिश के रूप में अपनी खुशी व्यक्त कर तुम्हारा स्वागत कर रहे हैं। राघव की आवाज सुन यादों के दायरे से बाहर आती गंगा राघव की आंखो में आज भी वही प्यार की बरसात अपने लिए देख रही थी। गंगा कहना तो चाह रही थी

"तेरी यादों की बारिश में खो गयी

 थी "। मेघ तो केवल घिरे थे खुशी के आंसुओं की बारिश उसकी आंखो से हो रही थी तभी राघव ने कार का दरवाजा खोल उतारने को हाथ बढाया उसके आंसू छलक ही पड़े बहुत-बहुत धन्यवाद राघव।

" किस बात के लिए धन्यवाद गंगा ?आभार तो मुझे बोलना है मेरी बनने के लिए। दोनों के दिल भावविभोर हो एक दूजे की यादों की बारिश में रसासिक्त हुए भीग रहे थे

तब पीछे की सीट में बैठी काकी बोली बिटिया गंगा मेरा गट्ठर तो उतार देव अबेर (देर) होइ रही। हां हां काकी बस अबे उतारती गंगा राघव की ओर देख मुस्काती काकी से बोली।


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