अनु उर्मिल 'अनुवाद'

Abstract


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अनु उर्मिल 'अनुवाद'

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फेयरवेल

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श्री नायर आज बहुत उत्साहित थे और थोड़े उदास भी। आज वो अपने पद से सेवानिवृत्त होने वाले थे। वे सांवेर बैंक में कैशियर के पद पर कार्यरत थे। वे हमेशा की तरह आज भी समय पर बैंक पहुँच गए। तीस साल की नौकरी में उनका ये अनुशासन कभी टूटा नहीं था। वे काफ़ी सरल हृदय व मृदुल स्वभाव के थे। वे एक मध्यम वर्गीय परिवार से सम्बद्ध थे औऱ बेहद ईमानदार थे। उनकी इसी ईमानदारी और अनुशासन के उनके सभी सहकर्मी कायल थे। बैंक के अधिकारीगणों में भी उनका काफी सम्मान था। लॉक डाउन के कारण उनकी भव्य विदाई नहीं की जा सकती थी। इस बात का सभी को मलाल था। परंतु सभी सहकर्मियों ने मिलकर उन्हें कुछ यादगार उपहार देने का निर्णय किया था।

 विदाई का कार्यक्रम शाम को होना था। श्री नायर तल्लीनता से अपने काम में लगे हुए थे। तभी बैंक में एक बुजुर्ग महिला अपने पोते के साथ प्रवेश करती है। वे दिखने में काफी कमजोर औऱ थकी हुई लग रही थीं। 

"बाई, तमारे ठीक से याद हे नी। याज बैंक हे नी तमारो" गन्नू ने चारों ओर नज़र डालते हुए कहा।

"हाँ बेटा लागे तो याज ही। हूँ तो 12 साल पेहला अइ थी याँ ! ओर फिर म्हारे कदि कोई काम भी तो नी पड़यो लेण देण को !" नन्दा जी ने चेहरे से पसीना पोंछते हुए कहा।

"ठीक है चालो वाँ पता करें !" गन्नू ने काउंटर की ओर इशारा करते हुए कहा और नन्दा जी का हाथ थामे काउंटर पर गया।

"कहो बेटा ! क्या काम है ?" कैशियर श्री नायर ने पूछा।

"साब ये मेरी दादी हैं। इनका खाता इस बैंक में है। सरकार ने जो मजदूरों के खाते में 500 रुपये डाले है वो लेने के लिए आई हैं !"

"ठीक है तुम डायरी दो मैं चेक कर के बताता हूँ !" और श्री नायर कंप्यूटर में डिटेल देखने लगे। चेक करने पर पता लगा कि नन्दा जी का खाता जन धन योजना के तहत नहीं खुला था। उन्होंने गन्नू से कहा "बेटा ! तुम्हारी दादी का जनधन खाता नहीं है और सरकार ने सिर्फ़ जनधन खाता धारकों को ही सहायता दी है !"

ये सुनकर गन्नू और नन्दा जी निराश हो गए। नन्दा जी ने कहा "हम घणी दूर से पेदल चली नी आया हे साब ! बहोत परेशाण हें हम !"

"कहाँ से आये हो ?" श्री नायर ने पूछा।

"जी साब हम मांगलिया से आये हैं। दादी का खाता यहां है। हम लोग मजदूरी करते हैं !"

"इतनी दूर से पैदल चलकर आये हो ?"

"जी साब ! मजदूर इंसान हैं। पैसे भी नहीं है और कोई सवारी भी नहीं चल रही। पैसे की जरूरत थी तो आ गए !" गन्नू ने कहा।

श्री नायर ने उन दोंनो को ध्यान से देखा। दोंनो काफी थके हुए और निराश लग रहे थे। उन्होंने जब नन्दा जी का खाता चेक किया था तो उसमें मात्र 70 रुपये थे। श्री नायर को नन्दा जी और गन्नू की हालत पर बहुत तरस आया। उन्होंने उन दोनों की सहायता करने का निश्चय किया। 

"आप दोनों बैठिए। मैं जरा देर में आता हूँ !" इतना कहकर श्री नायर मैनेजर के केबिन में पहुँचे। उन्होंने मैनेजर साहब को सारी बात बताई।

सारी बात सुनकर मैनेजर साहब ने कहा "मुझे दुःख है कि वो लोग इतनी परेशानी उठा कर आये और उन्हें निराश लौटना पड़ेगा। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं ?"

श्री नायर ने कुछ सोच कर कहा "सर मैं इन लोगो को निराश नहींं करना चाहता। मैं इन लोगों की सहायता करना चाहता हूँ !"

"मगर कैसे ? क्या अपनी जेब से पैसे देना चाहते हैं आप ?" मैनेजर साहब ने कहा।

"नहीं सर इतने सालों की नौकरी में सिर्फ अपनी और परिवार की जरूरतें ही पूरी कर पाया हूँ। किसी की ज़िंदगी बदल सकूँ इतना बड़ा तो बन नहीं पाया। मगर आज मौका मिला है कि कम से कम एक इंसान की मदद कर सकूँ !" श्री नायर ने मुस्कुराते हुए कहा।

"आप कहना क्या चाहते हैं मिस्टर नायर ? मैं कुछ समझा नहींं !" मैनेजर साहब ने अचरज भरी नजरों से श्री नायर को देखते हुए कहा।

"सर मैं चाहता हूँ कि आज शाम को आप लोग मेरे विदाई समारोह में जो खर्च करना चाहते हैं, वो आप इस महिला को दे दें !"

"ये आप क्या कह रहें हैं नायर साहब। एक तो पहले ही लॉक डाउन की वजह से हम सब आपको ठीक तरह से विदा नहीं कर पा रहे हैं। फिर भी सारे स्टाफ ने पैसे जमा किये ताकि वो आपकों एक यादगार विदाई दें सके। सब आपका इतना सम्मान करते हैं, वो सब आपको खुशी देना चाहते हैं और आप वो रकम दान में देना चाहते हैं। जब आप घर जाएंगे तो घर वाले भी तो जानना चाहेंगे कि आज इस खास दिन आपको क्या गिफ्ट मिला तो उन्हें क्या जवाब देंगे ?" मैनेजर साहब ने कहा।

"सर सन्तुष्टि से बड़ा उपहार कोई किसी को क्या दे सकता है। आप लोग ये सब मेरी ख़ुशी के लिए ही करना चाहते हैं न, तो मेरा मन माफ़िक उपहार मुझें दे दीजिए। आज आखिरी बार इस कुर्सी पर बैठने जा रहा हूँ। अपनी नौकरी से एक अच्छा काम करने का ये अंतिम अवसर मिला है, तो वो कर लेने दीजिये सर। और फिर मेरे इस काम के सहभागी तो आप लोग भी बनेंगे, आखिर ये रकम आप लोगों ने ही जमा की है। रही बात घर वालों की तो मैं जानता हूँ वो लोग मेरे इस काम से बहुत खुश होंगे। ये महिला जो आशीर्वाद देंगी वही मेरे और मेरे परिवार के लिए सबसे बडा उपहार होगा !" श्री नायर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। उनके हृदय की सुंदरता आज उनके चेहरे पर परिलक्षित हो रही थी।

"ठीक है नायर साहब ! जैसी आपकी मर्जी। आज आपका हमारे बैंक में आखिरी दिन है। आज हम आपको निराश नहीं करेंगे !" मैनेजर साहब श्री नायर की महानता से अभिभूत हो गए ।

मैनेजर साहब ने सारे स्टाफ को श्री नायर की इच्छा से अवगत कराया। सारा स्टाफ ये बात सुनकर बहुत खुश हुआ। उन्हें गर्व हो रहा था कि उन्हें श्री नायर जैसे महान हृदय व्यक्तित्व के साथ कार्य करने का मौका मिला।

मैनेजर साहब ने श्री नायर की इच्छानुसार सारी जमा रकम नन्दा जी को दे दी। नन्दा जी की आँखों से आँसू बहने लगे और गन्नू भी मुस्कुरा उठा। नन्दा जी कुछ बोल तो नहीं पा रही थीं मगर अपने दोनों हाथ उठाकर सबकों आशीर्वाद दे रही थी। जब उन्होंने श्री नायर के सर पर हाथ रखा तो वो अपने आँसू रोक न पाए। आखिर उनकी जिंदगी का इतना महत्वपूर्ण दिन इतना यादगार जो बन गया था।


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