अनु उर्मिल 'अनुवाद'

Drama


4.5  

अनु उर्मिल 'अनुवाद'

Drama


बेईमान इरादे

बेईमान इरादे

6 mins 180 6 mins 180

"विपुल गाड़ी धीरे चलाओ न प्लीज्, मुझे डर लग रहा है" संजना घबरा रही थी। "ओके बेबी" विपुल ने गाड़ी की गति कम करते हुए कहा। वो आज बहुत ज्यादा उत्साहित था। आख़िर इस दिन के लिए उसने कितने पापड़ बेले थे। और आज उसकी मेहनत का फल उसे मिलने वाला था। वो मन ही मन सोच रहा था। "अब देखूंगा उन कमीनों को। बहुत मजाक बनाते थे न मेरा। आज साबित कर दूँगा कि मैं मर्द हूँ। जब चाहूँ किसी भी लड़कीं को हासिल कर सकता हूँ..."  दरअसल छह महीने पहले विपुल और उसके दोस्त कॉलेज कैंटीन में बैठे हुए थे। वो लोग आती जाती लड़कियों को देख रहे थे। तभी रंजन ने विपुल को ताने मारते हुए बोला "देख ले बेटा जी भर के देख ले तू बस ऐसे ही आँखे सेंक सकता है। शिकार तो तुझसे होना नही है क्योंकि उसके लिए जिगर की जरूरत होती है। मर्द बनना पड़ता है" "तुम लोगो को क्या लगता है मैं मर्द नही हूँ। अगर मैं चाहूँ तो किसी भी लड़कीं को अपनी उंगली पर नचा सकता हूँ" ये सुनकर उसके सभी दोस्त ठहाके मार कर हँसने लगें। "रहने दे बेटा। हिरनी का शिकार मेमनों के बस की बात नही। ये तो हम जैसे शेरों का काम है। तू अभी बच्चा है मेरे लाल" रंजन ने विपुल के गाल खींचते हुए कहा।

और एक बार फिर से टेबल पर ठहाके गूंजे। विपुल गुस्से से भर गया। उसने चिढ़ते हुए कहा "ये बात है तो ठीक है, मैं तुम लोगो को साबित कर के दिखाऊंगा कि मैं मर्द हूँ वो भी पूरे सबूत के साथ" "ओहो, चैलेंज क्या बात है रंजन ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा। "हाँ हाँ चैलेंज" विपुल ने कहा। "तो ठीक है। अपनी क्लास में जो संजना नाम की नई लड़कीं आयी है, जो बेहद खूबसूरत है। दम है तो उसका शिकार कर के बता। तो हम सब मान लेंगे कि तू एक असली मर्द है" रंजन ने कहा। बाकी दोस्तों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई। "ठीक है छह महीने में उसे अपने बिस्तर पर लाऊंगा" विपुल ने आत्मविश्वास के साथ कहा।  

विपुल पढ़ने में काफ़ी होशियार था और दिखने में भी अच्छा था। मगर उसने कभी पढ़ाई लिखाई के अलावा दूसरी बातों में दिलचस्पी नही दिखाई थी। उसने अब तक किसी लड़कीं के साथ दोस्ती नही की थी। इसलिए उसके दोस्त उसका मजाक भी बनाते थे। ये बात उसको बहुत खटकती थी। इसलिए आज उसने फैसला किया कि अपने दोस्तों के आगे ख़ुद को साबित कर के रहेगा। उसने संजना से दोस्ती का हाथ बढ़ाया। विपुल कॉलेज का टॉपर था, हर लड़की उससे दोस्ती करना चाहती थी। संजना ने भी यही किया। दोनो रोज मिलने लगे।

विपुल अपनी बातों से संजना का दिल जीतने की कोशिश करने लगा और एक दिन वो कामयाब भी हो गया। संजना ने खुद आगे बढ़कर विपुल से अपने प्यार का इज़हार किया। विपुल मन ही मन बहुत खुश हुआ और उसने झट से संजना का प्रेम प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।  विपुल अक्सर संजना के करीब आने की और उसे छूने की कोशिशें करता था मगर संजना उसे रोक देती थी। वो कहती थी बिना शादी के ये सब सही नही है। विपुल समझ गया कि संजना उसे आसानी से अपने करीब नही आने देगी। उसे अपना मकसद पूरा करने के लिए कोई और रास्ता सोचना पड़ेगा। कुछ दिन बाद वैलेनटाइन डे आने वाला था। विपुल ने सोचा ये ही सबसे बेहतर मौका है।

उसने संजना से कहा कि "मैं वैलेंटाइन डे का पूरा दिन तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूँ। मैं पूरा दिन तुमसे बातें करना चाहता हूँ, और तुम्हें जी भर कर देखना चाहता हूँ। अगर तुम नही मानी तो मैं तुमसे कभी बात नही करूँगा" । संजना विपुल को नाराज नही करना चाहती थी इसलिए वो राजी हो गयी।    विपुल की कार फॉर्म हाउस के गेट पर रुकी। उसने एक दिन पहले ही सारे नौकर और गार्ड को आज की छुट्टी दे दी थी। फॉर्म हाउस की चाबी विपुल के पास थी। उसने दरवाजा खोला और संजना को अंदर आने को कहा।

संजना घर को चारों तरफ से देख रही थी। सोफे पर बैठते हुए बोली "विपुल तुम्हारा फॉर्म हाउस तो काफी सुंदर है। कितनी शांति हैं यहाँ।" "अच्छा तुम्हें इतना पसन्द आया तो ठीक है जब हमारी शादी हो जाएगी तो हम लोग हर वीकेंड यहाँ आएंगे" विपुल ने उसे बहकाने के इरादे से कहा। संजना ने शर्माते हुए नज़रें झुका ली। "अरे शरमा क्यों रही हो। एक दिन तो हमारी शादी होनी ही है। आओ मैं तुम्हें घर दिखा दूँ" पूरा फॉर्म हाउस दिखाने के बाद विपुल संजना को बेडरूम में ले गया। संजना को बैठाते हुए उसने कहा "मैं तुम्हारे लिए कुछ पीने के लिए ले आता हूँ, फिर हम इत्मीनान से बातें करेंगे" "ओके" संजना ने मुस्कुराते हुए कहा। विपुल किचन में गया और उसने दो गिलासों में कोल्ड्रिंक डाली और फिर अपनी जेब से नींद की एक गोली निकालकर एक गिलास में डाल दी। वो कोल्ड्रिंक लेकर कमरें में गया और दवा वाली गिलास संजना को थमा दी। दोनों बातें करते हुए कोल्ड्रिंक पीने लगे। थोड़ी देर में दवा असर दिखाने लगी और संजना की आँखे भारी होने लगी। विपुल चेहरे पर कुटिल मुस्कान लिए उसे देख रहा था। "विपुल मुझें नींद आ रही है"

संजना ने ऊँघते हुए कहा। "कोई बात नही, सो जाओ तुम हम बाद में बातें कर लेंगे" विपुल ने कहा। विपुल ने संजना को बिस्तर पर लिटा दिया और खुद सामने वाले सोफे पर बैठ कर संजना के सोने का इंतज़ार करने लगा। कुछ देर में संजना गहरी नींद में सो गई। विपुल इसी पल के इतंजार में था। वो उठा औऱ अपने मोबाइल में वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन कर के फोन टेबल पर रखा। वो धीरे धीरे संजना की ओर बढ़ने लगा।

उसने संजना के कंधों से दुपट्टा हटाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि उसकी नज़र पलंग के सामने वाली दीवार पर लगे आईने पर पड़ी। विपुल उस आइने में खुद का अक्स देखकर चौक गया है। उसे अपने चेहरे में एक घिनौनी सी वहशियत नज़र आई। वो वही ठिठक गया। "ये क्या हो रहा है आज पहली बार मुझे आइने में अपनी ही सूरत इतनी डरावनी क्यों लग रही है? उसे अपना ही चेहरा किसी शैतान के जैसा दिख रहा था"    उसकी नज़र सोती हुई संजना के चेहरे पर पड़ी। "ये लड़कीं सोती हुईं कितनी मासूम नज़र आ रही है। इसे कितना यकीन है मुझपर और मैं इसे इतना बड़ा धोखा देने जा रहा था सिर्फ़ अपने आप को मर्द साबित करने के लिये। क्या किसी स्त्री का सम्मान भंग करना ही मर्दानगी की निशानी है" उसे यकायक ही संजना के चेहरे में ख़ुद से जुड़ी हर स्त्री का चेहरा नज़र आने लगा।

उसकी दिल के धड़कन तेज़ हो गयी। कभी उसे संजना में अपनी बहन का चेहरा दिखाई देता, तो कभी अपनी माँ नज़र आती और कभी अपनी मासूम भतीजी। उसने घबरा कर अपने चेहरे को अपने हाथों से ढक लिया तो उसे महसूस हुआ कि उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे हैं। उसकी साँसे फूलने लगी। उसका पूरा शरीर पसीनें से तरबतर हो गया। उसने तुरंत मोबाइल उठाया और बेडरूम से भागा और हॉल में जाकर धम्म लगा फूट-फूट कर रोये जा रहा था।  न जाने कब तक विपुल ऐसे ही चुपचाप बैठा रोता रहा।

शाम को जब संजना जागी तो विपुल की चेहरा देखकर उसने विपुल से कहा "क्या हुआ? तुम्हारी आँखे इतनी लाल क्यों है? रो रहे थे क्या?" "नही वो तो मैं बाहर टहल रहा था तो आँख में कचरा चला गया। चलो अब बहुत देर हो गयी है। मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूँ" और विपुल संजना को लेकर घर की चल दिया। उसे खुद पर बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। साथ ही इस बात की खुशी भी थी कि सही वक्त पर उसका जमीर जाग गया और उसका बेईमान इरादा कामयाब होने से बच गया। वो बार-बार भगवान का शुक्र मना रहा था कि उन्होनें उसे अपनी ही नज़रों में गिरने से बचा लिया।


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