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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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न्याय संगत

न्याय संगत

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"आइए शंभू सरजी अंदर आइए न।" कहकर रमेश जी ने अपनी पत्नी को चाय बनाकर लाने के लिए कहा। "अरे चाय-वाय नहीं, वह तो और कभी हो जाएगी। असल में मैं एक जरूरी काम से आया हूँ।' "कहिए न सर, बंदा हाजिर है।" "दरअसल तुम तो जानते ही हो न, कि मेरी एक लघुकथा चयनार्थ तुम्हारे पास आई है।" "जी, जानता हूँ न सर, मैंने पढ़ी भी है।" "कैसी लगी?' "वह क्या है न सर, इस बार सौ से अधिक एंट्री आई हैं, अतः कमेटी ने निर्णय लिया है, कि अभिभावकों को ही निर्णायक बनाया जाए। "ओह!" "आपने तो वेबसाइट पर देखा ही होगा न? सर, सबकी रचनाएँ ऑनलाइन कर दी गई हैंI" "हाँ, मैंने वहाँ पर दूसरों की रचनाएँ भी पढ़ी है।" "आपको उनकी रचनाएँ कैसी लगी सर?" "यानि तुम कुछ नहीं कर पाओगे।" "जी सर। सर, आप तो जानते ही हैं न, वोटिंग सिस्टम कर दिया है, जिस भी रचना को सबसे अधिक वोट मिलेंगे, वही विद्यार्थियों की पाठ्य पुस्तकों में शामिल की जाएगी। जब छात्रों के भविष्य का सवाल है, तो अभिभावकों से अच्छे निर्णायक तो कोई और हो ही नहीं सकते हैं न, सर।" "ठीक है, मैं चलता हूँ।" "एक और बात, जहाँ तक मित्रता का सवाल है, तो उसकी खातिर जान भी हाजिर है और अगर मित्रता की खातिर मैं अपना बेस्ट दे सकता हूँ, तो मुझे काम के लिए भी अपना बेस्ट ही देना होगा न सर?"


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