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Mukta Sahay

Horror Thriller


4.5  

Mukta Sahay

Horror Thriller


नया घर और.... भाग 6

नया घर और.... भाग 6

4 mins 310 4 mins 310

मरीज़ को परेशान ना करें, आप दोनो बाहर जाएँ और इन्हें आराम करने दे, नर्स ने रजनी और रमेश को झिड़का। दोनो ने कहा हाँ, हम निकल ही रहे हैं और धीरे से निकलने लगे। तभी पंडितजी ने कहा, सुनो नया यंत्र ले आओ क्योंकि पूजा ज़रूरी है। मैं मेरे गुरू भाई से कहूँग़ा, वह पूजा कर देगा। बाधाएँ आएँगी पर तुम दोनो हिम्मत नही हारना। नर्स अब ग़ुस्से में आ गई। रजनी - रमेश के साथ पंडितजी को भी डाँट पिला दी।

रजनी रमेश घर आ गए। रात हो गई थी। जैसे जैसे अंधेरा बढ़ रहा था वैसे वैसे दोनो की धड़कने भी तेज हुई जा रही थीं। रजनी ने उस खरोंचे हुए यंत्र को सिरहाने पर रखा था। रजनी – रमेश एक दूसरे का हाथ पकड़े लेटे थे पर आँखों में नींद बिल्कुल नही थी। हर आहट पर घबरा कर दोनो एक दूसरे को ज़ोर से पकड़ लेटे थे। इसी भय के साये में कब आँख लगी और कब सुबह हुआ पता ही नही चला।

रजनी – रमेश के कमरे की खिड़की से बाहर लगा झूला दिखता था। आज वह भी एकदम शांत था। इतनी शांति भी घबराहट दे रही थे दोनो पति-पत्नी को। दोनो ने महसूस किया कि शायद उनके बाज़ू पर बंधे सिद्ध धागे की वजह से यह रात शांत रहा।

रमेश का फ़ोन बजता है। पंडितजी के गुरू भाई थे। घर का पता माँग रहे थे और आज शाम में ही तीन बजे पूजा की बात कह रहे थे क्योंकि इस पूजा के लिए वही सही समय था। कुछ समान के साथ नया यंत्र लाने को भी कहा उन्होंने। रजनी – रमेश अब फिर पूजा की तैयारी में जुट गए। काफ़ी मशक्कत के बाद यंत्र मिला और सभी पूजन सामग्री के साथ दोनो घर आए। अब बस नए पंडितजी का इंतज़ार था। दोनो की दृष्टि घड़ी पर ही लगी हुई थी तीन बज गए थे। फ़ोन बजा, नए पंडितजी ने फिर रास्ता पूछा। रमेश ने उन्हें विस्तार से बताया। वह बोले, पास ही हूँ, मैं बस दस मिनट में पहुँच जाऊँगा, आप सारी तैयारी रखना ताकि बिना समय का नुक़सान किए पूजा प्रारम्भ हो जाए। साढ़े तीन, चार, पाँच अब तो साढ़े पाँच हो गए थे और पंडितजी नही पहुँचे और ना ही अब उनका फ़ोन लग रहा था। रजनी – रमेश , दोनो हताश-निराश बैठे थे की पूजा का दूसरा तीसरा प्रयास भी सफल नही हुआ।

लगभग छः बजे नए पंडितजी का फोने आया। आवज में बहुत थकावट थी। वह कह रहे थे कि जिन दुकानों और गलियों को रमेश ने बताया था वह उन्हें नही मिला। वह पाँच बजे तक भटकते रहे पर वह उनका घर नही दूँढ़ पाए। रास्ते में मिलने वाले लोगों से भी पूछा तो उन्हें वह पता नही मालूम था जो रमेश ने उन्हें बताया था। उन्होंने यह भी बताया की उनका फोने भी गिर कर ख़राब हो गया जिस वजह से वह रमेश को फोन भी नही कर सके। नए पंडितजी बार-बार क्षमा माँग रहे थे। उन्हें बहुत ग्लानि हो रही थी की इतनी ज़रूरी पूजा नही हो सकी।

रजनी – रमेश ने अब समझ लिया थ कि पंडितजी का घर नही ढूँढ पाना उस शक्ति की ही माया रही होगी। दोनो ने निर्णय लिया की कल सुबह ही वे अपने पंडितजी से मिलने अस्पताल जाएँगे। लेकिन आज की रात फिर उसी भय के साथ गुजरेगी, सोंच कर ही दोनो के रोएँ खड़े हो रहे थे। आज दोनो ने घर की बत्तियाँ जलाए रखने का सोंचा था। रात बीत रही थी और दोनो डर से आधे हुए जा रहे थे। आधी रात के आसपास घर की सारी बत्तियाँ बंद हो गई। दोनो की धड़कने बहुत ही तेज हो गईं थी की ना जाने आज की रात क्या हो।

ज़ोर की आँधी आयी थी बाहर और बिजली भी कड़क रही थी। अंधेरी रात में जब बिजली कड़की तो दोनों की नज़र बाहर झूले पर गई। झूले पर ऐसा लगा जैसे कोई बैठा हो। दोनो अंदर तक सिहर से गए। एक बार को उन्हें लगा की शायद यह उनका भ्रम हो लेकिन जब अगली बार बिजली कड़की और उसकी रोशनी में फिर वहाँ कोई बैठा दिखा तो दोनो पति-पत्नी के होश ही उड़ गए। आज की रात बहुत भारी रहने वाली थी, दोनो ने मान लिया था। इस बार के बिजली के चमक में झूला ख़ाली था। दोनो को समझ नही आ रहा था की यह राहत की बात है या और भी ज़्यादा डर की। अभी इसी उधेड़बुन में थे की रजनी को लगा कोई बिस्तर पर उसके पास आ कर बैठा है। उसमें हिम्मत नही हो रही थी पलटने की। तभी अचानक सारी बत्तियाँ जल पड़ी। शायद बिजली आ गई थी। बाहर अभी भी आँधी थी और बिजली कड़क रही थी। रजनी ने पलट कर देखा तो वहाँ कुछ भी नही था। तभी उसे ध्यान आया कि तकिए के नीचे उसने यंत्र रहा था। तकिया उठाया तो यंत्र वहीं था और सही सलामत था। देख कर दोनो ने चैन की साँस ली। अब इंतज़ार था कल की सुबह का जब पंडितजी से मिल कर समस्या का समाधान ढूँढना था। 


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