नवजीवन
नवजीवन
नवजीवन
भचाऊ तहसील के मनफारा गाँव की सरकारी स्कूल आज उत्सव के रंग में रंगी थी।
स्कूल के प्रिंसिपल करसन के चेहरे पर आज एक अलग ही चमक थी।
आज का दिन खास था — मुख्यमंत्री साहब स्कूल के नए कक्षों के उद्घाटन के लिए आने वाले थे।
साथ ही भारत के 77वें गणतंत्र दिवस की भी भव्य तैयारी थी।
स्कूल का मैदान तिरंगे, देशभक्ति गीतों और बच्चों की खिलखिलाहट से जगमगा उठा था।
गाँव के बुज़ुर्ग, अभिभावक और शिक्षक — सभी इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने आए थे।
मुख्यमंत्री साहब के करकमलों से ध्वजारोहण शुरू हुआ।
जैसे-जैसे तिरंगा आकाश की ओर ऊँचा उठता गया, करसन की आँखों में एक पुरानी याद चमक उठी।
पच्चीस साल पहले आए विनाशकारी भूकंप में उसकी माँ लीला का निधन हो गया था।
उस दिन यही स्कूल की ज़मीन काँपी थी, दीवारें टूटी थीं — लेकिन आज वही स्कूल फिर से खड़ा था।
देश भी संविधान की शक्ति के साथ अटल खड़ा है।
“जन गण मन…”
बच्चों के जोश से गाए जा रहे राष्ट्रगान के शब्दों में करसन को अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दी —
“बेटा, जहाँ सब कुछ टूट जाए, वहाँ शिक्षा इंसान को नवजीवन देती है।”
राष्ट्रगान के बाद, करसन ने आँसू पोंछे, खुद को सँभाला और माइक के पास आया।
उसने कहा —
“प्यारे बच्चों, आज का दिन सिर्फ गणतंत्र दिवस नहीं है।
यह दिन हमें सिखाता है कि किसी भी आपदा के बाद भी हम अडिग रह सकते हैं।
यह दिन न्याय, समानता और मानवता के साथ जीने की प्रतिज्ञा लेने का दिन है।
मैंने अपनी माँ को खोया, लेकिन इस देश ने मुझे और मुझ जैसे सैकड़ों को सँभाला।
आज मैं वह ऋण आपको शिक्षा के माध्यम से चुका रहा हूँ।”
पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा।
उस दिन मनफारा गाँव ने समझा — 77वाँ गणतंत्र दिवस सिर्फ अतीत की पीड़ा नहीं,
बल्कि उज्ज्वल भविष्य की आशा और उमंग के साथ मनाने का दिन है।
बच्चों के साथ मुख्यमंत्री साहब भी उत्साह से बोल उठे —
“हैप्पी 77वाँ गणतंत्र दिवस 🇮🇳”
आसमान में कोई बादल नहीं था,
लेकिन करसन के दिल में माँ की ममता का बादल नवजीवन देखकर प्रेम की वर्षा कर रहा था।
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पंचलाइन
“भूकंप ने ज़मीन तोड़ी थी, लेकिन शिक्षा ने आत्मा को फिर से खड़ा किया — यही है नवजीवन।”
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