नीलम की डायरी
नीलम की डायरी
बरामदे के एक कोने पर रखी कुर्सी पर नीलम बैठे बैठे कब झपकी मारने लगी, उसे एहसास ही नहीं हुआ। सर्दी की दोपहर में यूँ धूप सेंकना नीलम के दिनचर्या का हिस्सा था। ७५ वर्षीय नीलम रोज़ दोपहर अपने नियमित समय पर एक छड़ी के सहारे धीमी गति से चल कर कुर्सी के पास आ कर हौले से सांस भरती, हौले से कुर्सी पर बैठती, अपने हरे रंग की शाल, जो उसकी माँ ने शादी के वक़्त दिया था और उसने अब तक उसे काफी सहेज कर रखा था, अपने उपर ओढ़ कर अपना चश्मा ठीक करती, फिर दूसरे हाथ के कंपकंपाती जकड़ में रखी किताब खोल कर पढ़ने लगती। रोज़ की तरह आज भी वो कुर्सी पर बैठ कर पढ़ रही थी पर आज उसके हाथ में कोई किताब नहीं बल्कि एक पुरानी भूरे रंग की डायरी थी। डायरी के मटमैले रंग के पन्ने और उस पर लिखे अक्षर जिसकी स्याही काफी हल्की हो गयी थी, ये बयां कर रही थी कि ये डायरी पुराने गहरे राज़ दफ़न कर रखी है। आज नीलम पढ़ने से ज़्यादा यादों में खोयी थी और ना जाने किस ख्याल ने उसे नींद की चादर में लपेट लिया था। कुछ देर बाद घर के अंदर से आती आवाज़ ने नीलम को जगा दिया। किसी के आने की आहट से उसने डायरी अपने शाल के नीचे छुपा दी और पीछे मुड़ कर देखा तो उसकी दस वर्षीय पोती सीमा दौड़ते हुए उसकी तरफ चली आ रही थी "दादी" का रट लगाते हुए।
नीलम ने पोती को अपनी गोद पर बिठाया तो शाल के नीचे से डायरी सड़क कर नीचे गिर गई। नीचे गिरी डायरी को देख कर सीमा ने उठाते हुए नीलम से पूछा -" दादी, क्या ये आपकी डायरी है ?"
नीलम सीमा के हाथ में अपनी डायरी देख कर थोड़ा हड़बड़ा गई और उसके हाथ से धीरे से लेते हुए कहा - "हाँ बिटिया, मेरी डायरी है। पर घर में किसी को मत बताना। "
नीलम और सीमा दोनों ने अपने अपने होंठ पर उँगली रख कर चुप रहने का इशारा किया। पर जिज्ञासु सीमा कहाँ चुप होने वाली थी। उसने तुरंत पूछा - "दादी, आपको डायरी लिखना पसंद है ? मैंने आपको कभी लिखते हुए नहीं देखा। "
सीमा की बातों से नीलम को वो रात याद आ गई जिस दिन उसने जीते जी जीना छोड़ दिया था। उसकी शादी को एक ही महीना हुआ था, और उस पर घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ, घर के सारे काम सौंप दिया गया था। काम करने से उसे तकलीफ न होती थी क्यूंकि वो सारा दिन काम काज कर जब डायरी लिखने बैठती तो उसकी सारी थकन, उसका दर्द, अक्षर ब अक्षर डायरी के पन्नों पर उतर जाता और अगले दिन के लिए ताज़गी उसमें भर जाती। हर रात की तरह वो उस रात भी डायरी लिख रही थी जब उसके पति ने उसे देख लिया, उसके पति को उसका यूँ लिखना पसंद नहीं था। उसके पति के मुताबिक औरतों को पढ़ने लिखने का मौका देना यानी उन्हें आज़ादी देना। बहुत बार मना करने के बाद भी जब उसने नीलम को लिखते हुए देखा तो उसके गुस्से का ठिकाना ना रहा और रात भर उसने नीलम को सबक सिखाने की कोई कसर ना छोड़ी। अगले दिन नीलम के मुँह पर चोट के निशान थे, और दाएं हाथ की कलाई की हड्डी टूट गई थी। पति की हैवानियत को रोकने घर का कोई भी सदस्य नहीं आया। इस चोट ने नीलम के मन में डर पैदा कर दिया था, उसके बाद से उसने कभी भी लिखने की हिम्मत न की थी। नीलम के लिए उसकी डायरी ही उसका पूरा जीवन था। अपने पति के क्रोध से उसने अपनी डायरी आग में जलने से तो बचा ली थी पर उसके कुछ कागज़ जल गए थे जिसके साथ जल गए थे उसके ज़िन्दगी के सपने, उसके जीना की आशा और तमन्ना।
सीमा ने वापस पूछा -" बताओ ना दादी, आप अब क्यों नहीं लिखती ?"
नीलम ने कुछ कहना चाहा पर पति के गुज़रने के इतने साल बाद भी मन से वो डर नहीं गया। आज पुरानी पेटी खोल कर अपनी चीज़ों को देखते वक़्त जब उसे ये डायरी मिली तब वो और उससे दूर नहीं रहना चाहती थी पर डायरी पकड़ते ही उसके हाथ काँप उठे थे।
उसने हौले से जवाब दिया -"डर लगता है। "
सीमा को अपनी दादी का ये जवाब समझ नहीं आया उसने दोबारा पूछा -"डायरी लिखने में कैसा डर ? मेरी स्कूल की टीचर कहती है हमें रोज़ रात को सोने से पहले डायरी लिखना चाहिए। पर मुझे समझ ही नहीं आता कि कैसे लिखना है, क्या लिखना है। दादी, आप मुझे सीखा दोगी प्लीज ?"
नीलम ने अपनी पोती का चेहरा देखा, कितनी मासूमियत थी उसके सवाल में। इसी मासूमियत से वो भी तो लिखा करती थी अपनी डायरी, कोई बागी थोड़ी न बनना चाहती थी वो। तो क्यों रोक दिया गया उसे लिखने से ? नीलम की आँखों में आंसू छलक गए।
उसने सीमा को अपने बांहों में भींच लिया, अपनी पोती के स्पर्श से उसके अंदर एक नई हिम्मत, एक नया जोश जग उठा था। उसने मन ही मन ठान लिया था कि अब उसे किसी से डरने कि ज़रूरत नहीं। उसने सीमा से कहा -" सीमा, तू मेरा एक काम करेगी ?"
सीमा ने हामी भरते हुए सर हिलाया। नीलम ने आगे कहा -" तू मेरे लिए एक नई डायरी खरीद लाएगी मार्किट से ?"
"हाँ दादी, आज शाम को मैं आपके लिए और मेरे लिए डायरी खरीद लाऊंगी। पर अपने अभी तक नहीं बताया आप मुझे डायरी लिखना सिखाओगी या नहीं ?"
"अरे पगली, डायरी लिखना कोई सिखाता है भला, तेरे जो जी में आता है तू वो लिख सकती है। तेरी ख्वाहिशें, सपने , पसंद , नापसंद सबका ज़िक्र कर सकती है तू डायरी में। डायरी लिखना तो अपनी सोच को आवाज़ देने, अपने सपनों को जीने का एक तरीका होता है। " कहते हुए नीलम सीमा को देख कर मुस्कुरा दी।
शाम को सीमा ने नीलम के हाथ एक नई डायरी रख दी। डायरी के कवर में मोर का पंख बना था हरे नीले रंग का। डायरी देख कर नीलम का मन भी मोर की तरह नाच उठा। उसने जल्दी से कलम उठा कर डायरी का पहला पन्ना खोला और उस पर सुन्दर अक्षरों से लिखा "नीलम की डायरी"।
