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Khwabeeda Khwabeeda

Abstract Tragedy Inspirational

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Khwabeeda Khwabeeda

Abstract Tragedy Inspirational

बेरोज़गार

बेरोज़गार

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कमरे की घड़ी की टिक-टिक कानों में गूंज रही थी, पर मैं बस अपने सामने रखे लैपटॉप की चमकती स्क्रीन को घूर रही थी। गाने बज रहे थे, लेकिन उनकी धुन अब मुझ तक नहीं पहुँच रही थी। मेरी चेतना में बस एक ही आवाज़ गूंज रही थी—मेरे मैनेजर की। कुछ देर पहले उन्होंने फोन पर बताया था कि मुझे नौकरी से निकाल दिया गया है।

आज मुझे अपने मैनेजर के कॉल का बेसब्री से इंतज़ार था क्यूंकि आज मुझे मेरे हक़ का प्रमोशन मिलने वाला था पर ये क्या मेरे मेहनत की, मेरे काम की परवाह ना करते हुए मुझे ऑफिस से निकालने का फरमान सुनाया जा रहा था। मैं हैरान और परेशान, आँसू को संभाले बस अपने मैनेजर को सुनती रही और वो कंपनी के बुरे हालातों का हवाला देते रहे, मुझे निकालने के निर्णय को जायज़ बनाने की हर नाकाम कोशिश करते रहे।

छह साल, छह लंबे साल दिए थे मैंने इस कंपनी को। दिन-रात मेहनत की, अपने सपनों को इस नौकरी से जोड़ लिया था। लेकिन आज, बदले में मिला तो सिर्फ एक 'समाप्ति पत्र'। मैं अपनी आँखों में उमड़ते आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही थी पर नाकाम रही। सबसे बड़ा डर था—माँ को कैसे बताऊँ? जिस बेटी पर उन्हें गर्व था, आज वही बेटी बेरोज़गार हो गई थी। मन भारी हो गया। कंपनी का दिया हुआ यह लैपटॉप भी अब पराया लगने लगा था।मैं यूं ही काफी देर तक आँखों में आंसू लिए लेटी रही, ना जाने कब कमरे में अँधेरा छा गया मेरे भविष्य जैसा काला अँधेरा। आँसू अब सूख चुके थे, लेकिन दिल में बेचैनी बनी हुई थी। मेरे दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था—क्या मेरे मैनेजर ने मेरी ओर से कोई कोशिश की होगी? पर शायद नहीं, उन्होंने खुद को बचाने के लिए मेरी बलि दे दी होगी। मेरे हाथ पर समाप्ति पत्र रखने वाले ने अपनी कुर्सी को कस के पकड़ा होगा। 

मैंने गहरी सांस लेते हुए अपना फ़ोन उठाया और माँ को कॉल लगा दिया। आवाज़ लड़खड़ा रही थी, माँ की आवाज़ सुनते ही आँखें फिर नम हो गईं। दूसरी ओर से माँ की आवाज़ आ रही थी, लगातार पूछ रही थी कि मैं कुछ क्यों नहीं बोल रही। माँ को मेरी चुप्पी में छुपा दर्द महसूस हो गया। आखिरकार मैंने सब बता दिया। बताते हुए, मेरे आंसू फिर से निकल गए और आवाज़ कांपने लगी। माँ ने धैर्य रखते हुए बोला। 

"निक्की बेटा, सबसे पहले तो रोना बंद करो।" माँ को गले लगाने का मन कर रहा था, माँ की गोद में सर रख कर सोने का मन कर रहा था। 

माँ ने आगे कहा - "तुम्हारी नौकरी जाने का ये मतलब नहीं है कि तुम में श्रमता कि कमी है। ये तो केवल एक परीक्षा है बेटा। ज़िन्दगी कि परीक्षा।  पता है भगवान हमारे जीवन काल में बहुत सारी परीक्षाएं लेता है, जानती हो क्यों ?"

माँ के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था मेरे पास।  

माँ ने उत्तर देते हुए कहा - "मनुष्य का काम है कर्म करते रहना फल की चिंता ना करना। आज अगर तुम्हारी नौकरी गयी है तो इसका ये मतलब है कि भगवान ये देखना चाहते है कि तुम अगला इम्तेहान कैसे पास करती हो।"

"कैसा इम्तेहान माँ, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।"

"तुम इस कठिन परिस्थिति को कैसे संभालती हो, तुम हार मान कर बैठ जाओगी या इस मुश्किल दौर से निकलने का प्रयत्न करोगी। कभी भी हार मान लेना किसी भी परिस्थिति का हल नहीं होता और मुझे तुम्हारी काबिलियत पर पूरा यकीन है।"

माँ की बात सुन कर मुझे काफी अच्छा महसूस होने लगा था । खोया हुआ आत्मविश्वास अचानक से लौट आया था ।इतनी देर से दिमाग में चल रहे नकारात्मक ख्यालों को दूर कर मैंने लैपटॉप खोला, गहरी सांस ली और जॉब ढूँढने में लग गई। माँ का मेरे ऊपर ये विश्वास मेरा आत्मबल बढ़ा दिया। शायद किसी ने सही कहा है "जो होता है अच्छे के लिए होता है" और मेरा भी अच्छा समय जल्द आएगा।   


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