अतीत की परछाई
अतीत की परछाई
आज बहुत दिनों बाद मुझे और मेरे पति रचित को एक रोमांटिक डिनर के लिए वक़्त मिला था। वरना, हम दोनों रोज़ ऑफिस के काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि कई बार एक-दूसरे से ढंग से बात तक नहीं हो पाती। मैंने अपनी पसंदीदा ब्लैक ड्रेस पहनी थी—वही ड्रेस जो रचित ने मुझे हमारी पहली सालगिरह पर गिफ्ट की थी। यह ड्रेस मेरे लिए बेहद खास थी, इसलिए इसे सिर्फ ख़ास मौकों पर ही पहनती थी।
रचित की नज़रें मुझसे हट ही नहीं रही थीं। मैंने मुस्कुराकर पूछा, "ऐसे क्या देख रहे हो?"
वो हल्का सा मुस्कुराए, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया। शायद उनकी ये चुप्पी ही इस पल को और ख़ास बना रही थी। मैंने भी जवाब के लिए ज़ोर नहीं दिया। रचित ने मेरा हाथ थामा और कार का दरवाज़ा मेरे लिए खोल दिया।
कुछ ही देर में हम "ब्लू शाइन" रेस्टोरेंट पहुँच गए। रचित टेबल बुकिंग की बात करने लगे और मैं रेस्टोरेंट के इंटीरियर को देखने लगी। वहाँ की दीवारों पर लगी पेंटिंग्स को निहारते हुए मैं आगे बढ़ रही थी कि अचानक किसी से टकरा गई। मुँह से स्वतः ही "सॉरी" निकला, लेकिन जैसे ही नज़र उठाई, कदम ठिठक गए।
सामने नितिन खड़ा था। सालों बाद उसके नाम की गूंज मेरे ज़हन में उठी थी। वो भी मुझे टकटकी लगाए देखने लगा, लेकिन उसकी आँखों में अजनबीपन था। ऐसा लगा जैसे उसने मुझे पहचाना ही नहीं। कुछ पल के लिए वक़्त जैसे थम गया था। लेकिन तभी, एक औरत उसके पास आई और नितिन नज़रें चुराकर सॉरी बोलते हुए आगे बढ़ गया। रचित ने अंदर चलने का इशारा किया, मैं अभी भी असहज महसूस कर रही थी।
हम दोनों एक कोने की टेबल पर बैठ गए। रचित मेनू कार्ड देखने लगे, लेकिन मेरी नज़रें अब भी भटकी हुई थीं।
"क्या वो सच में नितिन था?"
"अगर हाँ, तो बेंगलुरु में क्या कर रहा है?"
"क्या उसने मुझे जानबूझकर अनदेखा किया?"
"और वो महिला कौन थी? क्या उसने शादी कर ली?"
मैंने खुद को समझाने की कोशिश की—"मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए।" लेकिन भीतर कहीं कुछ अस्थिर हो गया था। रचित ने अचानक मेरी ओर मेनू बढ़ाते हुए कहा, "तुम क्या ऑर्डर करोगी?" मैंने जल्दबाज़ी में एक डिश का नाम लिया, लेकिन मेरा ध्यान अब भी बँटा हुआ था।
इतने दिनों बाद अपने अतीत को सामने देख कर, कुछ पुरानी यादें जैसे किसी बंद किताब के पन्नो की तरह खुलने लगे थे।
"नितिन, तुम मेरे पापा से हमारी शादी की बात कब करोगे। पापा ने मेरे लिए रिश्ते देखना शुरू कर दिया है।"
मेरी बातों को मज़ाक में लेते हुए नितिन ने कहा था - "अरे, इतनी जल्दी क्या है ? अभी तो कॉलेज ख़त्म ही हुआ है। इतनी जल्दी कौन शादी करता है।"
मैंने रुआंसी आवाज़ में कहा था -"देखो कही देर ना हो जाए और पापा कहीं और रिश्ता न तय कर दे।"
उस दिन जब मैं घर गयी, पापा मेरे लिए लड़का पसंद कर चुके थे और मेरे हाथ में एक फोटो थमते हुए कहा था -"घर में जल्द ही शहनाई बजने वाली है क्यूंकि मेरी बेटी पराये घर जाने वाली है।"मैंने जब नितिन को बताया था, तो उसके चेहरे पर चिंता, मुझे खो देने का भय, या मुझे शादी से रोकने का आग्रह कुछ भी नहीं था। बल्कि उसने मुझे शादी के लिए राज़ी हो जाने पर ज़ोर किया था। आखिर कार मैंने भी शादी के लिए हामी भर दी थी।
रचित ने अचानक मेरा नाम लिया तो मैं ख्यालों से बहार आई। मैंने रचित की आँखों में देखा, आज भी उनकी आँखों में उतना ही प्यार, सम्मान और सुकून था जैसे हमारी शादी के दिन जब मैंने उनको अपने अतीत के बारे में बताया था। मैं ये शादी कोई भी राज़ के साथ शुरू नहीं करना चाहती थी।
उन्होंने सिर्फ एक बात कही थी -"मुझे तुम्हारे अतीत से कोई दिक्कत नहीं है। अब तुम्हें ये तय करना है कि तुम इस अग्नि में अपना अतीत जला कर नई शुरुवात करना चाहती हो या अपने अतीत में रह कर हमारे भविष्य की आहुति देना चाहती हो।"
कभी-कभी, अधूरे रिश्ते भी ज़िन्दगी में पूरापन लेकर आते हैं। आज नितिन को देखकर अहसास हुआ कि कुछ लोगों का हमारे जीवन में आना सिर्फ हमें सही राह दिखाने के लिए होता है, साथ निभाने के लिए नहीं। मैंने रचित का हाथ और भी कसकर पकड़ लिया और अतीत की परछाइयों को पीछे छोड़ दी।

