अधूरे सपनों की नई धुन
अधूरे सपनों की नई धुन
सविता चाय का कप लेकर घर की बालकनी में आयी और दीवार से झूलते झूले पर बैठ गयी। सामने वाली बिल्डिंग से आती गाने की मधुर धुन ने उसे अनायास ही अपने साए में ले लिया। गाने का शौक सविता को बचपन से था, पर पिताजी की रोक-टोक ने उसके सपनों की कली को कभी खिलने ही नहीं दिया। जीवन की आपाधापी और जिम्मेदारियों ने धीरे-धीरे उसके शौक को धुंधला दिया था। लेकिन हाल ही में सामने की बिल्डिंग में शुरू हुई ‘फन विद म्यूज़िक’ क्लास ने उसकी सुप्त इच्छाओं को फिर से जगा दिया।
अब रोज़ाना शाम को जब म्यूज़िक क्लास शुरू होती, सविता भी चाय की प्याली के साथ धीमे-धीमे गुनगुनाने लगती।
पति के गुज़र जाने और नौकरी से रिटायर होने के बाद उसका अकेलापन और गहराता जा रहा था। परंतु इन म्यूज़िक क्लासेज़ की आवाज़ें उसके जीवन में एक नई ताज़गी और खुशबू लेकर आई थीं। बच्चों की चहक और रियाज़ की लय सुनते ही सविता जैसे अपने बचपन में लौट जाती—वही दिन जब वह छुप-छुपकर रेडियो से गाना सीखने की कोशिश करती थी। उसे याद आया, एक दिन अचानक पिताजी दफ़्तर से जल्दी लौटे और उसे रेडियो सुनते देख गुस्से में आकर रेडियो बाहर फेंक दिया। उस दिन सिर्फ़ रेडियो ही नहीं टूटा था, बल्कि सविता के नन्हें सपनों के भी टुकड़े बिखर गए थे। उस घटना के बाद वह बहुत रोयी थी, लेकिन अब उसने ठान लिया कि इस बार अपने शौक को अधूरा नहीं छोड़ेगी। उसने मन ही मन ठान लिया कि क्लास ज्वाइन करेगी।
पर जैसे ही विचार मन में आया, सवालों का तूफ़ान भी उठ खड़ा हुआ—“क्या इस उम्र में गाना सीखना ठीक होगा? लोग क्या कहेंगे? अगर मुझे सिखाने से मना कर दिया तो? लेकिन… अगर उन्होंने हाँ कर दी तो?”
ख़ुद से ही सवाल-जवाब करती सविता ने आखिरकार डर और संकोच को किनारे कर घर से निकलने का साहस किया और सामने वाली बिल्डिंग के नीचे आ खड़ी हुई।
नीचे तो आ गयी, लेकिन भीतर जाने की हिम्मत जुट ही नहीं पा रही थी। तभी पीछे से लगभग बारह-तेरह साल की एक लड़की आई और उसे देख मुस्कुराकर बोली—
“आंटी, क्या आप म्यूज़िक क्लास जाना चाहती हैं?”
सविता सकपका गई, शब्द गले में अटक गए। लड़की ने फिर कहा—
“मैं भी उसी क्लास में जा रही हूँ, आइए, मैं आपको ले चलती हूँ।” इतना कहकर उसने सविता का हाथ थाम लिया और भीतर ले गई।
अंदर जाकर लड़की ने अपने गुरु को प्रणाम किया और उत्साह से बोली—
“सुमन दीदी, देखो, मैं किसे ले आई हूँ। आंटी बाहर खड़ी थीं, शायद म्यूज़िक क्लास ज्वाइन करना चाहती हैं।”
हारमोनियम पर धुन साधती सुमन ने नजरें उठाकर सविता को देखा और सौम्य स्वर में पूछा—
“आंटी, क्या आप गाना सीखना चाहती हैं?”
सविता ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया।
“कब से ज्वाइन करना चाहती हैं?”
सवाल सुनकर सविता के चेहरे पर प्रसन्नता झलकी, मगर अगले ही पल मन के संशय ने उसे जकड़ लिया। सुमन ने उसके भाव पढ़ लिए और स्नेहपूर्वक पूछा—
“क्या सोच रही हैं, आंटी?”
सविता धीमे स्वर में बोली—
“मन तो बहुत है गाने का, बचपन से। लेकिन डर लगता है… क्या इस उम्र में मैं सीख पाऊँगी? क्या यह सही रहेगा?”
सुमन मुस्कुराई—
“गाना एक कला है, और कला सीखने की कोई उम्र नहीं होती। बस चाह होनी चाहिए—और वह आपमें है।”
सविता के चेहरे पर संकोच की परतें धीरे-धीरे हटने लगीं। पास बैठी वही छोटी लड़की, जो अब तक चुपचाप सब सुन रही थी, उत्साह से ताली बजाने लगी—
“अब से आंटी भी हमारे साथ गाना सीखेंगी!”
सुमन ने हारमोनियम की कुंजियाँ छेड़ीं और मधुर स्वर में बोली—
“तो आंटी, आप आज से ही क्लास शुरू कीजिए।”
उस पल सविता के जीवन की नई धुन ने पहला सुर पा लिया। लंबे अरसे से अधूरा पड़ा उसका सपना, आज सच होने की दिशा में बढ़ चला था।
