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Khwabeeda Khwabeeda

Drama Romance

3  

Khwabeeda Khwabeeda

Drama Romance

अतीत

अतीत

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आज बहुत दिनों बाद मुझे और मेरे पति रचित को रोमांटिक डिनर करने का वक़्त मिला था, वरना हम दोनों रोज़ ऑफिस के काम में इतने व्यस्त होते है कि कई बार एक दूसरे से बात करने का भी मौका नहीं मिलता। मैंने अपना पसंदीदा ब्लैक ड्रेस पहना था, ये ड्रेस रचित ने मुझे हमारे पहले सालगिरह में गिफ्ट किया था, इसलिए मेरे लिए ये बहुत ख़ास था और ख़ास मौकों पर ही इसे पहनती हूँ। आज तो रचित की नज़रें मुझसे हट ही नहीं रही, मैंने उनसे मुझे इस तरह निहारने का कारन पुछा तो मुस्कुरा दिए पर कोई जवाब ना दिया। शायद ये चुप्पी ही इस पल को खास बना रही थी मैंने भी जवाब के लिए कोई ज़ोर नहीं दिया। रचित ने मुझे चलने का इशारा करते हुए मेरा हाथ थाम लिया और मेरे लिए कार का दरवाज़ा खोल दिया। 

हम कुछ ही देर में ब्लू शाइन रेस्टोरेंट पहुंच गए। रचित रिसेप्शन में टेबल बुकिंग की बात करने लगे और मैं रेस्टोरेंट के इंटीरियर को देखने लगी। रेस्टोरेंट के ख़ूबसूरत वाल पेंटिंग को देखते हुए मैं आगे बढ़ रही थी कि तभी मैं किसी अनजान शख्स से टकरा गयी। उस शख्स कि तरफ देखने से पहले ही मेरे मुँह से सॉरी निकल गया और उसे देख कर मेरी नज़रें उस पर रुक गयी। आज कई सालों बाद मेरे होंठों पर 'नितिन' नाम आया था। वो भी मुझे एक टक देखता रहा। पर इसके भाव से ऐसा लगा मानो मुझे पहली बार देख रहा हो। मैं आश्चर्य चकित उसे देखती रही। तभी एक औरत उसके पास आ कर खड़ी हो गयी, वो सॉरी बोल कर वहां से चला गया। उतनी देर में रचित मेरे करीब आ गए। हम दोनों रेस्टोरेंट के अंदर चले गए। 

हम दोनों एक कोने के टेबल पर बैठ गए। रचित ने मेनू कार्ड पढ़ना शुरू किया पर मेरी नज़रें तो नितिन को ही तलाश रही थी। मैं बहुत असहज हो रही थी, मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैंने जिसे देखा क्या वो सच में नितिन था क्यूंकि वो तो चेन्नई में रहता है तो वो बेंगलुरु में क्या कर रहा है और उसका मुझे यूँ देखते रहना, और न पहचान पाना मुझे हैरान कर रहा था। क्या वो मुझसे इतनी नफरत करता है की आज मैं उसके लिए केवल एक अनजान हूँ और वो औरत कौन थी उसके साथ। क्या उसने शादी कर ली, क्या वो उसकी पत्नी थी। इससे पहले की मेरे सवालों की लिस्ट बढ़ती रचित ने मुझे मेनू कार्ड थमाते हुए डिश चूसे करने बोला। मैं मेनू कार्ड पढ़ने का ढोंग करने लगी पर इस बार मन में अलग सवाल दौड़ने लगे। मुझे क्यों फर्क पड़ रहा है नितिन को देख कर, वो अगर मुझे नहीं पहचानना चाहता तो मुझे ये बात इतनी चुभ क्यों रही है, और अगर उसने शादी कर ली है तो क्या उसका हक़ नहीं बनता की उसकी भी एक खुशहाल ज़िन्दगी हो जैसी मेरी। 

इस विचार से मेरे अंदर की घबराहट, बेचैनी थोड़ी कम हुई। वैसे तो मैंने कई बार सोचा था की अगर कभी नितिन मेरे सामने आ जाये अचानक तो मेरी क्या प्रतिक्रिया होगी। कभी उसका उत्तर सोच नहीं पाई थी मैं। कभी लगता था की मैं उसे देख कर भाग जायूँगी, उसे ना पहचानने का नाटक करुँगी ताकि रचित कोई सवाल ना करे। फिर कभी लगता की उससे कुछ देर ही सही पर बात करुँगी, उसका हालचाल पूछूँगी, अपना हालचाल बतायूंगी, दो घडी बात कर ज़िन्दगी में उसकी कमी को भुला दूंगी। पर आज नितिन ने वही किया जो मैं सोचती थी।

मैं कब से मेनू कार्ड के स्टार्टर्स पेज को घूरे जा रही हूँ। इससे पहले रचित मुझसे पूछे, मैंने अपना आर्डर बता दिया। मैंने फिर से नितिन को ढूंढने के लिए अपनी बाई ओर देखा तो नितिन मेरे ही तरफ चले आ रहा था। मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गयी। मुझे डर लग रहा है, कहीं ये आ कर रचित को हमारे अतीत के बारे में तो नहीं बता देगा। वो अतीत जो मैंने कभी रचित से शेयर नहीं किया। वो अतीत जिसे छुपाने के लिए मेरे माँ पापा किसी से भी शादी करा के मुझे विदा करने के लिए तैयार थे। वो अतीत जहाँ मैं नितिन के साथ ज़िन्दगी बिताने के लिए दिन रात रोया करती थी। 

नितिन हमारे टेबल पर आ कर मुझे देखा और टेबल पर एक अंगूठी रखते हुए पूछा की कहीं वो अंगूठी मेरी तो नहीं। टेबल पर रखे अंगूठी को देखने से पहले मेरी नज़र मेरे हाथों पर गयी। मेरे बाये हाथ में इंगेजमेंट रिंग थी और दाएं हाथ में एक सोने की रिंग। कोई रिंग मिसिंग नहीं थी। मुझे लगा टकराने की वजह से उसे ऐसे लगा होगा की वो अंगूठी मेरी है। पर अगर मेरी अंगूठी नहीं गिरी थी तो उसे ये अंगूठी कहाँ से मिली। इस प्रश्न से मेरी नज़र टेबल पर रखी अंगूठी पर पड़ी, वो वही अंगूठी थी जो नितिन ने मुझे दे कर प्रोपोज़ किया था। रचित से शादी की बात तय हो जाने पर मैंने वो अंगूठी नितिन को वापस कर दी थी। मैं पुरानी याद के साथ नया रिश्ता शुरू नहीं करना चाहती थी। मैंने वो अंगूठी अपने हाथ में ले ली, मेरी बाई आंख से आंसू निकल आया। मैंने नितिन को देखा, उसकी आंखें भी नम थी। रचित हम दोनों को देख रहा था। शायद उसे ये सब काफी अजीब लग रहा था पर उसने कुछ नहीं बोला। मैंने वो अंगूठी नितिन को लौटा दी। 

अंगूठी तो सच में मेरी नहीं थी, अगर होती तो आज यूँ लावारिस ना होती। नितिन अंगूठी लेकर वापस चला गया। पर मुझे मेरे सवालों के जवाब दे गया। जवाब उस अंगूठी पर लिखा था। जवाब उसकी नम आँखों में कैद था। जवाब उस अंगूठी के डिब्बी में था जिसमे नितिन ने अंगूठी को वापस रख दिया कि जिस तरह वो अंगूठी डिब्बी में बंद है उस तरह हम दोनों को भी अपना अतीत मन के किसी गहराई में कैद कर भुला देना होगा। शायद ये मुलाकात अतीत भुलाने के लिए ज़रूरी था। अब मै काफी अच्छा महसूस कर रही हूँ। हमारा खाना भी आ गया है और रचित को देख कर मुझे फिर से अपना रिश्ता प्यारा लग रहा है। 



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