नीलामी और एक आखिरी फरियाद
नीलामी और एक आखिरी फरियाद
बाहर बज रही शहनाई की हर गूँज रिया के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिर रही थी। शीशे के सामने लाल जोड़े में सजी वो कोई दुल्हन नहीं, बल्कि मौत का इंतज़ार करती एक ज़िंदा लाश लग रही थी। सोने के वो भारी गहने उसे जंजीरों की तरह जकड़े हुए थे और कमरे की वो घुटन उसका दम घोंट रही थी। रिया ने अपनी सूखी और लाल हो चुकी आँखों से उस लाल रंग को देखा... यह रंग सुहाग का नहीं था, यह उस सीधे-सादे मिडिल क्लास लड़के की उम्मीदों का खून था, जिसे उसके अमीर पिता ने अपने घमंड के जूतों तले रौंद दिया था। उसे याद आया आर्यन का वो उतरा हुआ चेहरा, जब वह आखिरी बार उसके पिता के पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोया था। "बाबूजी, मुझे अपनी रिया दे दो, मैं मज़दूरी करके उसे रानी बनाकर रखूँगा..." आर्यन के वो शब्द रिया के कानों में गूँज रहे थे। लेकिन दौलत के नशे में चूर पिता ने उसे कॉलर से पकड़कर ज़लील किया और धक्के मारकर घर से निकाल दिया था। उस दिन आर्यन की आँखों में जो बेबसी और लाचारी थी, उसने रिया की रूह को छलनी कर दिया था। "पापा... आपने अपनी झूठी शान के लिए मेरी साँसों का सौदा कर दिया," रिया के होठों से एक खामोश सिसकी निकली। उसने अपने कांपते हाथों से अपनी मुट्ठी खोली। उसमें वो ज़हर की शीशी थी। "आर्यन... ये दुनिया, ये लोग हमारी मोहब्बत के लायक नहीं हैं। मैं आ रही हूँ तुम्हारे पास," रिया के होठों पर एक दर्द भरी मुस्कान तैर गई। उसने बिना कोई आँसू बहाए शीशी को होंठों से लगा लिया। ज़हर गले से नीचे उतरते ही उसके अंदर जैसे आग का दरिया बहने लगा। उसकी नसें फटने लगीं। वो तड़प कर फर्श पर गिर पड़ी। उसका लाल जोड़ा ज़मीन पर फैल गया। साँस लेने के लिए वह तड़प रही थी, पर बाहर से वो बिल्कुल शांत थी। उसकी धुंधली होती आँखों में अब सिर्फ और सिर्फ आर्यन का मुस्कुराता हुआ चेहरा था। "हमेशा के लिए तुम्हारी..." उसने आखिरी साँस ली और उसकी तड़पती हुई रूह हमेशा के लिए आज़ाद हो गई। और ठीक उसी पल... आसमान का सीना चीरते हुए एक खौफनाक बिजली कड़की। ऐसा लगा जैसे खुदा की अदालत में भी मातम छा गया हो। मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। अपने कच्चे घर की टूटी हुई छत पर आर्यन खड़ा था। उसके कपड़े कीचड़ से सने थे और आँखें लाल सुर्ख थीं। अचानक उसके सीने में बाईं तरफ एक ऐसा भयानक दर्द उठा, जैसे किसी ने उसके दिल को मुट्ठी में भींच कर बेरहमी से कुचल दिया हो। उसकी साँसें गले में अटकने लगीं। उसे हवाओं में उसी सफेद सूट की खुशबू महसूस हुई। आर्यन समझ गया... उसकी रूह का वो आधा हिस्सा, उसकी रिया, अब इस दुनिया में नहीं रही। उसका दिमाग सुन्न पड़ गया। बारिश की ठंडी बूंदें उसके गरम आँसुओं को धो रही थीं। वह घुटनों के बल उस कीचड़ में गिर पड़ा। उसने अपनी उँगलियों को ज़मीन में गड़ा दिया, अपने दोनों हाथ आसमान की तरफ फैलाए और अपने रटे हुए, खून से सने गले से इतनी ज़ोर से चीखा कि उस भयानक तूफ़ान की आवाज़ भी दब गई: "ए रब्बा...!! तारे मेथो गिण नहीं जाणे, तेनु भूल के आराम नाल सौ जावां...! ओ सुन ले मेरी फरियाद रब्बा... मेथो तारे गिण नहीं जाणे, तेनु भूल के आराम नाल सौ जावां...!!" उस एक चीख में उसकी सारी बेबसी, उसकी गरीबी और रिया को हमेशा के लिए खो देने का वो दर्द था, जो किसी भी इंसान के बर्दाश्त के बाहर था। "क्यों दी ये मोहब्बत रब्बा, जब मेरी औकात नहीं थी उसे पाने की? क्यों छीन ली मेरी जान?" आर्यन ज़मीन पर मुँह के बल गिर पड़ा। रिया की जुदाई का वो सदमा और वो दर्द उसका कमज़ोर दिल बर्दाश्त नहीं कर सका। उसकी धड़कनों ने एक आखिरी बार धक से आवाज़ की और फिर हमेशा के लिए खामोश हो गईं। उस तूफानी रात में, बारिश ने उसके सारे आँसुओं और उसकी सारी शिकायतों को अपने अंदर समेट लिया। अगली सुबह का नज़ारा बहुत खौफनाक था। रईस की कोठी से डोली की जगह एक सजी हुई अर्थी उठी, और उधर गरीब की बस्ती से एक अनाथ जनाज़ा। समाज ने जीते जी उनके बीच अमीरी-गरीबी की जो ऊँची दीवार खड़ी की थी, मौत ने उस दीवार को गिरा दिया और दोनों को हमेशा के लिए एक कर दिया। सुखविंदर की कलम से: "दौलत के तराज़ू में आज फिर एक वफ़ा तौल दी गई, झूठी शान की खातिर दो मासूम साँसें रोक दी गईं। कोई जाकर कह दे इन दौलतमंदों से, कि इश्क ज़मीन की कोई जागीर नहीं... ये तो रूह का वो मुकम्मल रिश्ता है, जो खुदा के घर जाकर ही पूरा होता है।"

