नदी
नदी
मै नदिया हूं प्यारी प्यारी, देखी है मैंने दुनिया सारी
पर्वत मेरे जनक है और धरती मेरी माता
उफनती मचलती अविरल हूं बहती
उमंग और मस्ती में सागर से जा मिलती
नर नारी और पशु पक्षी मुझमें डुबकी लगाते
अपना मैला मुझमें धोकर खुद को हल्का पाते
साधु और सन्यासी जप से पहले मुझमें नहाते
पापी और अधर्मी मुझमें गोते खाकर निर्मल होते
कुछ भक्त छोड़ जाते मुझमें अपने पुराने कपड़े
फूल माला और पूजन सामग्री से विकृत कर जाते
माता कहकर बुलाते पर बालक धर्म ना निभाते
पाप अपने धोकर खुद को निर्मल पाते
विषैले अवांछित द्रव्यों ने मार्ग मेरा अवरुद्घ किया
घुटता दम और रुकती सांसों ने जीना मेरा दूभर किया
गुहार लगाती इस माता पर कुछ उपकार करो
बहती नदिया साफ कहलाए उक्ति को चरितार्थ करो।
