Dharmesh Solanki

Romance


4.7  

Dharmesh Solanki

Romance


मनगढ़ंत

मनगढ़ंत

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सूरज रात को शहर की गलियों में पैदल चलता हुआ चाँद को देखता देखता अपने घर जा रहा था। चेहरे में मायूसी छाई हुई थी और थोड़ी थकान भी दिख रहीं थी। ऑफिस से लौट रहा था। किसी सोच में चलें जा रहा था और जैसे जैसे उनका घर नज़दीक आता रहा तो उनके चेहरे से मायूसी और थकान निकलती नज़र आई। बिलकुल अपने घर के दरवाज़े के सामने खड़ा रह गया और थोड़ी देर में चाँद सी चमकती मनमोहक काया लिए मानसी आ कर खड़ी हो गई।


चेहरे में बिखरी ज़ुल्फ़ें बार बार हवा की वजह से मानसी के मुलायम गालों को छुए जा रहीं थी। और नशीली आँखें सूरज को प्यार से देख रहीं थी। सूरज आँखें छोड़ के गाल, गाल छोड़ के होंठ और होंठ छोड़ के ज़ुल्फ़ें देखे जा रहा था। मानसी की मनमोहक काया देखने यूँ ही खड़ा रह गया। और कुछ देर में मानसी नटखट अंदाज से बोल उठी, "अब बाहर से देखते रहोगे या अंदर भी आओगे ?" तो सूरज हँसने लगा फिर दोनों अंदर चले गए।


सूरज हाथ मुंह धो के बैठा। मानसी ने सूरज को अपनी बाहों में भर लिया। थोड़ी देर यूँ ही रखकर कहा, "चलो खाना खा लो अब।" सूरज प्यार से बोला, "यार आज बहुत थका हुआ हूँ... काफी सारा काम था ऑफिस में, भूख भी लगी है ज्यादा।" तो मानसी ने कहा, "हाँ तो चलो!"


खाना खाने के एक घंटे बाद सूरज बालकनी में जा कर कुर्सी पर बैठ गया। कोई किताब निकाली थी अलमारी से पढ़ने के लिए मगर मानसी की नादानियाँ उन्हें कैसे पढ़ने देती। जैसे ही सूरज बैठा तो मानसी उनके ऊपर बैठ गई। तो सूरज बोला, "ये क्या यार! पढ़ने दो मुझे।" ये सुनकर मानसी कटाक्ष भरे अंदाज़ से बोली, "अच्छा! पढ़ने दूँ ? और मैं।" सूरज ने कहा, "क्या मैं ?" तो मानसी थोड़ा गुस्सा हो कर मुंह बनाकर बोली, "अरे! मुझे कहाँ वक़्त देते हो, सारा दिन ऑफिस को और रात को इन किताबों को।" सूरज ने मानसी का ख़याल जान लिया। किताब बंद कर के पास में रख दी। और मानसी की कमर में दोनों हाथ फंसाकर अपनी ओर खींचा। अब मानसी सूरज की जाँघों पर थी। और उनके कान में बोला, "अच्छा! वक़्त चाहिए मेरी जान को ?" मानसी मुस्कुरा कर बोली, "हाँ।"


फिर सूरज मानसी की गर्दन पर प्यार से चूमने लगा। अब माहोल बिलकुल शांत था। दोनों कुछ बोल नहीं रहे थे बस एक दूसरे को महसूस कर रहे थे। वो रात मानो प्यार की रात ही हो। दोनों पती पत्नी के बीच कोई तीसरे के आने का डर भी नहीं था। घर पर कोई था ही नहीं, माँ मौसी के वहाँ गई हुई थी।


मानसी ने बड़े प्यार से सूरज का हाथ छुआ जो उनकी कमर में लिपटा हुआ था। फिर एक हाथ कमर से‌ छुड़ा कर उनके सीने‌ में रख दिया। उस वक़्त दोनों के बदन में हलचल सी मच गई। मानसी खो ने लगी और ऊपर चाँद‌ को ताकने लगी। सूरज अब धीरे धीरे ‌मानसी के सोए हुए‌ बदन को जगा रहा था। फिर दोनों खड़े हो गए और एक दूसरे के होठों को चूमने लगे। क़रीबन दस मिनट चुम्मा चाटी चली। ऐसे चूमे जा रहे थे जैसे बरसों के प्यासे हो।


फिर सूरज उठा कर मानसी को अंदर रूम में ले गया। अब चुम्मा चाटी के साथ बदन के एक एक कपड़े भी उतर रहे थे। दोनों समंदर की गहराई तक पहुँच गए थे, अब जल्द वापस लौटना नामुमकिन था। मानसी अपनी मनमोहक काया लिए कामुक अंदाज़ में बेड पर लेटी हुई थी।


अब रूम की मेन लाईट भी बंद हो चुकी थी। और माहौल एक दम रोमांटिक बना हुआ था। मानसी ने अब सूरज को खींच कर अपने ऊपर लेटा दिया। और दोनों प्यार की जंग लड़ने लगे। दोनों इस जंग में अपनी अपनी लड़ाई लड़ने लगे। कभी मानसी हावी होती थी सूरज पर तो कभी सूरज। घंटो तक चलता रहा और आख़िर में दोनों एक दूसरे की बाहों में सो गए।


सुबह के नौ बजे सूरज की आँख खुली। रूम में इधर उधर देखा और उठ कर फ्रेश होने चला गया। एक घंटे में तैयार हो गया। क्योकिं कुछ देर में आफिस जाना था। माँ की आवाज़ आई नीचे से चाय पीने को बोल रहीं थी। सूरज मन में बोला, "माँ आ गई लगती है।" और नीचे गया। माँ से पूछा, "कब‌ आई आप ?" माँ ने चाय और पराठे टेबल में रख के कहा, "दो घंटे पहले आई, अब चाय पी लो और निकलो तुम ‌आफिस को।" सूरज चाय पीते पीते फ़ोन में मानसी की फ़ोटो देख रहा था और सोच रहा था कि इस वक़्त मानसी अपने पति को चाय दे रहीं होगी।



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