Dharmesh Solanki

Tragedy


4.0  

Dharmesh Solanki

Tragedy


सरकारी नौकर

सरकारी नौकर

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सब्जी मंडी का वो आखरी कोना जहाँ से सोना चांदी और कपड़ो की दुकानें शुरू हो जाती थी। वहाँ एक औरत थोड़ी बहुत सब्जियाँ लिए बेठी थी। देखने में बड़ी भोली और साधारण औरत थी जिनका पति मर चुका था और अपनी बेटियों को पालने थोड़ा बहुत कमा रही थी।

गीता जानती थी वो जहाँ पर सब्जी बेचने बैठती थी वो जगह सब्जी मंडी का हिस्सा नहीं था वहाँ से व्यापारियों की दुकानें शुरू हो जाती थी। पर किसी व्यापारी ने उसे कहा नहीं था वहाँ से उठने को। वो सवेरे सात बचे से दस बचे और शाम को चार बजे से सात बचे तक आती थी। गीता को उस बात का दुख था कि उसको किसी ने सब्जी मंडी के अंदर जगह न दी। जब जगह बिक रही थी तो उसकी जगह किसी ने न रखवाई उसके सगे देवर ने भी नहीं। उस वक़्त गीता अपनी बेटी की स्कूल एडमिशन के लिए गई हुई थी। और जब आई तब तक सारे सब्जी वालो को जगह मिल गई थी। वो सबसे भीख मांग रही थी थोड़ी जगह के लिए पर किसी ने न दी उनके देवर ने भी नहीं। वो जगह कम है का बहाना बनाता रहा। तब गीता को समझ आया कि कोई अपना नहीं होता सब नाम के होते है।

फिर वो सब्जी मंडी के आखरी कोने पर डर डर के बैठने लगी। उनके पीछे ही चंदन सेठ की सोने चांदी की दुकान थी। वो ठीक उनके सामने बैठती थी। चंदन सेठ ने कभी उनको कुछ बोला नहीं पर घूर घूर के देखता था। गीता वहाँ थोड़ी सब्जियाँ बेच लेती थी। जितनी सब्जी मंडी के अंदर बेच सके उनसे आधी। जो सब्जी लेने आते थे वो सब्जी मंडी के अंदर से ही ले लेते थे। बाजार की तरफ सब्जी लेने वाले कम लोग ही आते थे पर फिर भी गीता का घर चल सके उतना कमा लेती थी।

एक दिन हुआ यूँ की रात को इक दुकान में लूट हुई तो सुबह पुलिस आई हुई थी। गीता डर रही थी कि उन्हें खड़ा ना करवाए इक तो आई ही हुई थी और कुछ बेचा भी नहीं था। वो घबरा रही थी और थोड़ी देर में उनके पास ग्राहक भी आने लगे और चार पांच लोग एक साथ इकट्ठे हो गए तो थोड़ी भीड भाड लगने लगी और एक पुलिस वाले की नजर पड़ी। फिर वो आया और बोला कि, "ये क्या भीड लगा रखी है !" और उसने सबको जाने को बोला। थोड़ी देर में सब चले गए और उसने गीता से पूछा कि, "यहाँ क्यूँ बैठी है?" गीता ने अपने माथे से पसीना पोंछते कहा कि, "साहब, अंदर जगह न मिली।" तो शंकर गुस्से से बोला, "अंदर जगह न मिली तो क्या यहाँ बीच सड़क पर बैठ जाने का !" गीता मुंह झुकाए बैठी रही फिर शंकर ने कहा कि, "आज के बाद यहाँ मत बैठना।" यह कह कर चला गया।

वैसे शंकर इंस्पेक्टर था और उन इलाक़े में उनकी बड़ी धाक थी। सब डरते थे उनसे। फिर दूसरे दिन गीता डरती डरती आई। इधर उधर खड़े रह कर देखा कुछ वक़्त पर कोई पुलिस वाला दिखा नहीं। उसने पीछे देखा तो चंदन सेठ दुकान पर बैठा फ़ोन पर किसी से बात कर रहा था। फिर गीता ने कुछ सब्जियाँ निकाली और बैठ गई। उनकी नजर चारो ओर घूम रही थी कोई ग्राहक भी नहीं आ रहा था। और उनको डर था कि कहीं शंकर ना आ जाए। क़रीबन आधा घंटा बीता और जीप आई। शंकर उतरा और सीधा आया गीता की ओर, और एक आलू भरी बाल्टी थी उनको लात मार के फेंक दिया और चिल्लाकर बोला, "साली ! तेरे को बोला नहीं था कि यहाँ मत बैठना।" गीता कांपते हुए बोली, "तो साहब ओर कहा जाऊँ?" ये सुनकर शंकर का गुस्सा भड़का और एक तमाचा मार दिया फिर बोला, "भाड़ में जा !" फिर गीता ने बाकी की सब्जियाँ उठाई और चली गई घर।

अब गीता बड़ी सोच में पड़ी थी। फिर खाना पकाया और दोनों बेटियों को खिलाया पर उसके मुंह से निवाला उतरा ही नहीं, उसने न खाया। बाद में उनकी छोटी बेटी रश्मि ने उनके गाल पर हाथ रखकर पूछा, "माँ ये क्या हुआ?" शंकर ने जो तमाचा मारा था उनका लाल निशान हो गया था। त्वचा गोरी थी गीता की इस लिए साफ साफ निशान दिख रहा था। फिर गीता ने रश्मि को कहा, "बेटा कुछ नहीं।" बड़ी बेटी राधा वो दस साल की थी वो सब समझती थी उनको लगा कुछ हुआ है। पर उसने कुछ पूछा नहीं। फिर गीता ने रश्मि को दवाएँ खाने को बोला पर राधा ने कहा कि, "माँ उनकी दवाएँ ख़तम हो गई है।" तो गीता बोली, "क्या ! सच में।" वो कांपती हुई उठी और दवाएँ ढूंढने लगी पर न मिली सच में ख़त्म हो चुकी थी।

गीता उन दोनों को सुलाकर बाहर घर के आंगन में बैठ गई और सब याद कर के रोने लगी। इतना दर्द उनके सीने में था कि वो मरना ही चाहती थी एक तो पति के मरने का दर्द और दूसरा ये जमाने का दर्द। पर लाचार थी दो बेटियों की वजह से अगर गीता ही नहीं रहेगी तो उनकी बेटियों का क्या होगा। हमेंशा यह सोच के वो नकारात्मक विचारों को मार देती थी। फिर अंदर जा कर सो गई।

सुबह हुई और देखा कि रश्मि की तबियत बिगड़ गई थी। पैसे भी कुछ नहीं थे उनके पास। पर सब्जियाँ पड़ी थी बेचने की। कुछ देर सोचती रही फिर खड़ी हुई। रश्मि को चूमा और कहा कि, "दवाएँ लेकर आऊँगी तेरी।" फिर राधा के सर पर हाथ रखकर कहा, "बेटा ख़याल रखना।" और सब्जियाँ लेकर चली गई बाजार।

वहाँ जा कर बाल्टी रखी सब्जियों की और बिना डरे बैठ गई। पीछे मुड़ कर देखा तो चंदन सेठ फ़ोन पर बात कर रहा था। अब उनको ख़याल आ रहा था कि ये चंदन सेठ ही उस इंस्पेकटर शंकर को बता रहा है। फिर कुछ ग्राहक आए। और गीता के कान में जीप की आवाज़ सुनाई दी। वो घबरा गई सिर्फ आवाज़ सुनकर ही। जीप से शंकर उतरा और गीता के सामने आँखें फाड़कर देखने लगा। और चला आया उनके पास। सब्जियों पर लात मारने जा ही रहा था और गीता खड़ी हो कर चिल्लाई, "साले सरकारी नौकर ! कुत्ते ! मैंने क्या बिगाड़ा है तेरा? यहाँ बैठ के दो पैसे कमा रही हूँ तो तेरा क्या जाता है? क्यूँ परेशान करता है मुझे? मत कर ऐसा जुल्म !"

ये सुनकर शंकर देखता ही रहा। और थोड़ी देर बाद बोला, "क्या बोली तू? सरकारी नौकर? तू नौकर बोली मेरे को।" बाजार के सारे लोग इकट्ठे हो गए थे और देख रहे थे। फिर इतना कह कर शंकर का पारा चढ़ा और गीता के बाल खींच के आगे ले आया सड़क पे और एक साथ तीन तमाचे जड़ दिए। वो गिर पड़ी और आँखों से आँसू निकल आए। फिर जोर कर के खड़ी हुई और हाथ जोड़कर बोली, "ऐसा मत कर ! मेरी बेटी बीमार है, दवाई लेने के भी पैसे नहीं है।" शंकर फिर मारने जा रहा था पर इस बार हट गई गीता और वापस चिल्लाकर बोली, "ऐसा मत कर ! मेरी बेटी बीमार है, दो पैसे कमा रही हूँ तो तेरा क्या जाता है? साले हरामजादे ! सरकारी नौकर ! क्या बिगाड़ा है तेरा, मत कर ऐसा जुल्म !"

"तू फिर बोली सरकारी नौकर ! साली तेरी तो !" इतना कह कर शंकर पिस्तौल निकालने जा रहा था और दूसरी औरत जो ग्राहक थी सब्जी लेने आई थी गीता के पास, उसने चिपका दिए दो तमाचे शंकर को और बोली, "क्यूँ मार रहा है बेचारी को साले ! सरकारी कुत्ते ! हरामजादे ! नौकर ही है तू ! क्या राजा समझ रहा है खुद को ? सरकारी नौकर बोल रही है तो इतना भड़क क्यूँ रहा है ! नौकर ही है तू !" इतना कह कर उस औरत ने दो तमाचे फिर मार दिए।

अब गीता के लबों पे हँसी आ रही थी। लोग आ रहे थे उनके क़रीब। फिर शंकर उस औरत को मारने जा रहा था पर पीछे से लात मार कर गीता नें उसको गिरा दिया। और भीड में से एक आदमी की आवाज़ आई कि, "मारो।" और सब टूट पड़े शंकर पर। उस वक़्त वहाँ बस दो आवाज़ें सुनाई दे रही थी एक लात-घूसो की और दूसरी "सरकारी नौकर ! सरकारी नौकर ! सरकारी नौकर !"


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