Ritu Agrawal

Tragedy Action Inspirational

4.5  

Ritu Agrawal

Tragedy Action Inspirational

मेरी भाभी माँ

मेरी भाभी माँ

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कभी-कभी जिंदगी आपको बहुत बड़े धर्म संकट में डाल देती है पर आपको कोई ना कोई ना कोई निर्णय लेना ही होता है।मैंने भी अपना निर्णय ले लिया था और मेरे अनुसार वह सही था।

मैं काजल और यह है मेरी कहानी....मेरी कहानी तो नहीं कहूँगी।कहानी तो भाभी माँ की है पर इसकी समांतर किरदार मैं भी हूँ।

मेरा परिवार एक छोटे से कस्बे में रहता था।घर में माँ-बाबूजी और तीन भाई थे।

बाबूजी एक शुगर मिल ने मुनीम थे।आमदनी ठीक-ठाक थी।उनकी पहली पत्नी ,दस साल का बेटा छोड़कर स्वर्गवासी हो गई थी।उस बच्चे यानी कि मेरे सौतेले भाई श्याम के लालन-पालन के लिए परिवार के दबाव में आकर, बाबूजी ने मजबूरन दूसरा विवाह किया।(जैसा कि बाबूजी हमें बताते हैं)खैर गरीब से आई माँ पच्चीस बरस की उम्र में,एक दस साल के सौतेले बच्चे की माँ बन गई थी।श्याम भैया बहुत ही आज्ञाकारी और संस्कारी बच्चे थे पर जबसे मैंने होश संभाला तो देखा कि श्याम भैया और माँ के रिश्ते में एक ठंडापन था।

खैर समय गुजरता रहा।माँ को विवाह के एक वर्ष बाद ही पुत्र रत्न के रूप में मोहन भैया मिले।फिर तीन साल बाद राजू भैया,उनके तीन साल बाद पैदा हुई मैं......यानी कि काजल।घर की इकलौती बेटी और सबसे छोटी होने के कारण मैं घर भर की लाड़ली थी।बाबूजी और तीनों भाई मुझे बहुत चाहते थे।यूँ तो श्याम भैया हम तीनों भाई-बहनों को बहुत प्यार करते थे पर मुझ पर तो जान छिड़कते थे।जब मैं पैदा हुई वे सत्रह बरस के थे।माँ कहती,पूरे दिन मुझे गोद में उठाए घूमते थे।श्याम भैया पढ़ाई में बस ठीक-ठाक थे, तो बाबू जी ने उन्हें एक किराने की दुकान खुलवा दी।फिर उनका विवाह भी कर दिया गया और ब्याह करके आ गई मेरी भाभी माँ 'गौरी' यथा नाम तथा गुण........सुंदर- सुशील,ममता की मूरत थी गौरी भाभी।एक गरीब विधवा माँ की इकलौती संतान,पर सदा मुस्कुराती हुई।जब भैया की शादी हुई तो मैं पाँच बरस की थी।भाभी माँ मेरे लिए दूसरी माँ ही बन गई थी।भाभी ने अपने मधुर स्वभाव और कर्तव्यपरायणता से पूरे परिवार का मन मोह लिया।वे हम तीनों भाई बहनों का बहुत ध्यान रखती थीं।भैया की तरह भाभी को भी,मुझसे विशेष लगाव था।वो मुझे बिट्टू कहती थीं।समय अपनी गति से चल रहा था।भाभी को शादी के पूरे दस बरस बाद संतान हुई,नाम रखा गुड़िया।इस बीच मोहन भैया ने शहर जाकर एक छोटी सी नौकरी कर ली।बाबूजी बहुत खुश हुए कि कमाने वाले हाथ और बढ़ जाएँगे लेकिन मोहन भैया ने वहीं अपनी पसंद की एक लड़की से शादी कर ली और घर में संदेशा भिजवा दिया कि अब उन्हें हमसे कोई लेना देना नहीं है।वे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहते हैं।घर में बहुत दिन तक मातम का माहौल रहा।फिर धीरे-धीरे जिंदगी की गाड़ी अपनी पटरी पर लौट आई।राजू भैया देखने में बड़े अच्छे लगते थे।उनके दोस्तों ने उन्हें फिल्म का हीरो बनने की सलाह दी और एक दिन घर से कुछ रुपए चुराकर और एक चिठ्ठी रखकर कि वे मुंबई जा रहे हैं और हीरो बनकर ही लौटेंगे,राजू भैया चले गए।इन घटनाओं ने बाबूजी को दुखी कर दिया और हृदय-घात के कारण वे चल बसे।

राजू भैया का तो कुछ पता ठिकाना नहीं था। पर किशन भैया सूचना देने पर भी नहीं आए।माँ बिल्कुल बेसुध हो गई थीं।फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपने आपको संयत किया।मैं उस समय ग्यारहवीं कक्षा में थी और इंजीनियर बनना चाहती थी।दसवीं में भी मेरे बहुत अच्छे अंक आए थे।पिताजी की मृत्यु के एक महीने बाद ही अचानक न जाने माँ को क्या सूझा, वे भैया- भाभी से मेरी शादी कराने के लिए कहने लगीं।मेरा रो-रोकर बुरा हाल था।मैंने बहुत समझाया पर माँ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी।बस उन्होंने मेरी शादी की रट लगा रखी थी।एक दिन भाभी ने माँ से पूछा,"माँ बिट्टू इतना अच्छा पढ़ती है,अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है तो आप क्यों उसकी शादी की जिद कर रही हैं?"

पर माँ ने फिर मेरी शादी की बात दोहराई।

जब भाभी ने ज्यादा जोर दिया तो माँ बिलख-बिलख कर रोने लगी और बोली,"गौरी!तू बहुत अच्छी है पर कल को तुझे भी तो अपने बच्चों की जिम्मेदारी पूरी करनी है।अब तो बाबूजी भी नहीं हैं।मैं चाहती हूँ कि जल्द से जल्द काजल का ब्याह हो जाए तो यह जिम्मेदारी खत्म हो जाए।तुम इसे एक माँ का स्वार्थ ही समझ लो।"

यह बात सुनकर भाभी शांत स्वर में बोली,"माँ,मैं जिस दिन इस घर में आई थी मैंने बिट्टू को अपनी बेटी माना था और बिट्टू हमेशा मेरे लिए मेरी पहली संतान रहेगी।यह मेरा वादा है कि इसकी जिम्मेदारी हम दोनों पूरे मनोयोग से उठाएँगे।आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए।बिट्टू अपने पैरों पर खड़ी हो जाए फिर हम इसका ब्याह करेंगे।"

यह सुनकर मैं भाभी से लिपट गई।आज वह सचमुच मुझे अपनी भाभी माँ ही लग रही थीं।मैंने बारहवीं में बहुत अच्छे अंक हासिल किए।इसके बलबूते पर एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में भी दाखिला मिल गया और स्कॉलरशिप भी मिल गई।जब इंजीनियरिंग की दूसरे साल में थी तब माँ भी चल बसीं।जीवन चक्र चलता रहा।भाभी भी एक और बच्चे की माँ बन गईं।इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद मुझे एक अच्छी कंपनी में,दिल्ली में नौकरी मिल गई।मैंने भाभी माँ को बताया कि मैं अपने साथ काम करने वाले शशांक से शादी करना चाहती हूँ तो भैया-भाभी ने धूमधाम से मेनौकरी और नई गृहस्थी की वजह से मायके जाना काम ही होता था पर फोन पर बात जरूर होती थी।मेरी शादी के तकरीबन एक बरस बाद ही एक शाम अचानक भाभी का फोन आया।उन्होंने रोते हुए बताया कि भैया का एक्सीडेंट हो गया है।हम तुरंत भागे-भागे गए। तब तक भैया इस दुनिया को छोड़ कर जा चुके थे।भाभी का रो-रोकर बुरा हाल था। मैंने अपने आँसू पीते हुए भाभी को बहुत हिम्मत बंधाई।शशांक वापस दिल्ली चले गए।मैं कुछ दिन और भाभी के साथ रही।मैंने उनसे पूछा कि अब आगे क्या करना है?पर मैंने देखा कि भाभी अब पहले से कहीं ज्यादा धीर-गंभीर और दृढ़ निश्चयी हो गई थीं।

वे आत्मविश्वास के साथ बोलीं,"बिट्टू,मुझे अपने दोनों बच्चे अच्छे से पालने-पोसने हैं ।उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।तुम्हारे भैया दुकान छोड़कर गए हैं ;अब मैं उस दुकान पर बैठूँगी।"

मैंने पूछा,"भाभी, बच्चों के साथ में यह सब कैसे सँभाल पाओगी?"भाभी फीकी हँसी हँसकर बोली," जब अपने बच्चों की बात आती है तो माँ सबकुछ कर जाती है।सब हो जाएगा।तू चिंता मत कर।"

मैंने भी भाभी से वादा लिया कि यदि कोई भी परेशानी होगी तो वह मुझे जरूर बताएँगी।फिर भी मैं हर महीने भाभी के खाते में अपनी तनख्वाह से कुछ पैसे डाल देती। ल के लिए विदेश जाना था।मैंने भी कंपनी में बात करके अपना प्रोजेक्ट वहीं ले लिया और हम विदेश चले गए।भाभी से वीडियो कॉल पर भी बात होती रहती थी। कुछ समय से भाभी मुझे बहुत कमजोर लग रही थीं।पूछने पर बस चिरपरिचित मुस्कुराहट के साथ यही कहती कि उम्र का तकाजा है।दो साल पूरे होने पर शशांक ने कहा कि हम अभी दो साल और यहाँ रुक जाते हैं, जिससे और पैसे कमा सकेंगे।पर मेरा मन विचलित हो रहा था।

मैंने शशांक को कहा ,"नहीं!मैं भारत वापस जाना चाहती हूँ।भले एक महीने के लिए सही,मैं ब्रेक लेना चाहती हूँ।फिर यहाँ वापस आ जाएँगे।"

शशांक का थोड़ा और काम बाकी था।पर मेरे मन में अजीब सी घबराहट होने लगी थी तो शशांक से ज़िद करके मैं भारत वापस आ गई। मैंने सोचा थोड़ा घर व्यवस्थित करके तीन-चार दिन बाद भाभी से मिलने जाऊँगी और उन्हें सरप्राइज़ दूँगी।दो दिन बाद ही गुड़िया का फोन आया और वह रोते-रोते बोली,"बुआ मम्मी मर गई।"यह सुनते ही दो पल के लिए तो मेरा पूरा शरीर और दिमाग सुन्न हो गया।फिर अचानक दोनों बच्चों का ख्याल आया।मैंने हड़बड़ा कर पूछा," तुम्हारे पास में कौन है? मैं बस अभी निकल रही हूँ? मैं दिल्ली में ही हूँ।"

वह बोली,"नानी आ गई है।"

मैंने तुरंत ही दो जोड़ी कपड़े अपने बैग में डाले और जरूरी सामान लेकर,घर से निकल पड़ी।यह चार घंटे का रास्ता और यह समय मुझे सदियों जैसा लग रहा था।मेरी आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे।बचपन से लेकर अभी तक का एक- एक पल जो मैंने भाभी माँ के साथ बिताया था,मेरी आँखों के सामने घूम रहा था। जितना मेरा मन,मेरी सगी माँ से नहीं जुड़ा था,उससे कहीं अधिक मेरा दिल भाभी माँ से जुड़ा था।आज मैं पूरी बिखर गई थी।फिर मैंने फोन पर ही शशांक को सब बताया।शशांक मुझे धीरज बँधाते रहे।मैं मायके पहुँची तो दोनों बच्चे रोते हुए मुझसे लिपट गए।बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें संभाला।छोटे-छोटे बच्चे,जिन्हें मौत का अर्थ भी नहीं पता.......बस!इतना पता था कि उनकी माँ अब कभी वापस नहीं आएगी।अंतिम संस्कार की विधियाँ समाप्त हुईं।उनकी बूढ़ी माँ को संभालना भी बहुत मुश्किल था।अपने बच्चे को खोने का गम तो एक माँ बाप ही समझ सकते हैं।धीरे-धीरे शुद्धता और सभी रीति रिवाज पूरे हुए।अब मेरे सामने यक्ष प्रश्न खड़ा हुआ था कि उन दोनों बच्चों का.... अब उनका क्या होगा? जब मैंने भाभी की माँ से पूछा तो वे बोलीं,"बेटा,मैं तो खुद गरीब अकेली बुढ़िया हूँ और आज हूँ,कल नहीं।मुझे तो कोई भी कुछ खाने-पीने को जो दे जाता है तो उसके सहारे पेट पाल लेती हूँ या लोगों के घरों में काम करके थोड़ा बहुत अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम कर लेती हूँ।इन बच्चों को मैं कैसे संभाल पाऊँगी? हमारे पास तो कोई जमीन-जायदाद भी नहीं है।मैं तो खुद ही माँग कर खाती हूँ।वैसे भी उनकी दयनीय दशा देखकर सच कहूँ तो मुझे भी लगा नहीं था कि वे इस दुनिया में ज्यादा दिन की मेहमान होंगी।फिर सब चीजों को सोच- समझकर मैंने निर्णय लिया कि मैं दोनों बच्चों को अपने साथ रखूँगी।भाभी ने मुझे माँ बनकर पाला था। अब मेरी बारी है कि उनके बच्चों को,मैं एक माँ बनकर पालूँ।शशांक को मैंने इस बारे में फोन करके बता दिया।शशांक इससे बहुत नाराज थे।उनका कहना था कि अभी हमारी गृहस्थी शुरू हुई है कल को हमारे भी बच्चे होंगे।इतनी महंगाई के जमाने में हम कैसे इतने बच्चों को देखभाल कर पाएँगे?दूसरी बात; हम अपने बच्चों पर ज्यादा ध्यान देंगे या इन बच्चों पर?"

मैं बोली,"जानती हूँ व्यावहारिक रूप से तुम सही हो लेकिन मैं भैया-भाभी के बच्चों को सड़क पर भी तो नहीं छोड़ सकती थी न?मेरी भी तो उनके प्रति कोई ज़िम्मेदारी बनती है।"खैर एक अंतहीन बहस और शशांक की घोर नाराजगी के बाद भी मैं,मायके के घर और दुकान में ताला डालकर दोनों बच्चों को अपने साथ लेकर दिल्ली आ गई।

बच्चों को नहला-धुलाकर खाना खिलाया।वे अभी भी उदास थे पर समय के साथ सब चीजें ठीक हो जाएँगी। मैं उनको भी यही समझा रही थी और खुद को भी। खाना खाकर हम लोग लेट गए।सफर की थकान के कारण बच्चे तुरंत ही सो गए।पर आज मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी मैं बिस्तर पर पड़ी पड़ी करवटें बदल रही थी और जीवन की पुरानी बातें मेरी आँखों के सामने चलचित्र की तरह चल रही थीं।साथ ही कभी शशांक की बातें कानों में गूंजती ;कभी भैया - भाभी का चेहरा नज़रों के सामने आ जाता तो कभी बच्चों का चेहरा।यही सब सोचते सोचते न जाने कब नींद लगी।फिर एक बुरे सपने के कारण अचानक

सुबह पाँच बजे के करीब नींद खुली।सिर बहुत भारी हो रहा था।उठकर, फ़िल्टर कॉफ़ी माइक्रो कर जब बालकनी में आई, तो अद्भुत नज़ारा था..सामने वाले पार्क से आता कलरव आस बंधा गया।आज बहुत सालों बाद यह नजारा देखा था।सब कुछ इतना सुहावना लग रहा था।ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी जिसमें कुछ फूलों की खुशबू भी मिली हुई थी।पक्षियों की मधुर आवाज़ संगीत सी लग रही थी।इन सब सकारात्मक दृश्यों ने मेरे निराश मन को,शांत और आशावान बना दिया।मैंने अपनी कॉफी खत्म करके, एक नजर सोए हुए दोनों बच्चों पर डाली।दोनों के चेहरे से पर एक मासूमियत और असीम शांति थी।मैंने उनके सिर पर हाथ फेरा और अपने आप से और भाभी माँ से मन ही मन वादा किया कि भाभी जब तक आपके बच्चे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाएँगे मैं इनका साथ कभी नहीं छोड़ूँगी और इन बच्चों के प्रति अपना फर्ज निभाऊँगी।अब पार्क से आता कलरव कुछ और तेज हो गया था और सूरज की लालिमा बालकनी में मेरे चेहरे को छू रही थी।मन में असमंजस के बदल छट चुके थे और मुझमें दृढ़निश्चय और आत्मविश्वास का संचार हो चुका था।


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