Ritu Agrawal

Drama Inspirational Thriller

4.5  

Ritu Agrawal

Drama Inspirational Thriller

कर्मफल

कर्मफल

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608



सुबह से धानी का मन बहुत घबरा रहा था। भैया माँ से हर रविवार बात कराते हैं पर पिछले दो रविवारों से भैया ने यह कहकर बात नहीं कराई कि माँ आजकल सत्संग में जाने लगी हैं तो उस समय घर पर नहीं होतीं।

आज सोमवार है पर धानी का मन ऑफिस में भी नहीं लग रहा। बार-बार माँ का उदास चेहरा उसकी आँखों के आगे घूम जाता है। जब वह पिछली बार भारत गई थी तो नई नवेली भाभी के तेज तर्रार तेवर और उसके आगे घिघियाती माँ की निरीह आँखें उसे आज भी याद हैं।

धानी एक मध्यम वर्गीय परिवार में पली बढ़ी। माँ और पिताजी मिडिल स्कूल पास थे ।पिताजी किराने की दुकान चलाते थे पर अपने बच्चों को खूब पढ़ाना चाहते थे।

धानी पढ़ने लिखने में होशियार बच्ची थी। बड़े भाई राजीव का मन पढ़ाई में ज्यादा न था तो वह पिता की छोटी सी किराने की दुकान संभाला करता था। अचानक एक दिन हृदयाघात से पिता चल बसे। धानी और राजीव ने बहुत मुश्किल से माँ सुधा जी को संभाला। धानी की भी अच्छी नौकरी लग गई। साथ काम करने वाले प्रणव के साथ धीरे-धीरे दोस्ती बढ़ी और फिर दोनों को लगा कि एक दूजे के लिए ही बने हैं और उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया। प्रणव को अमेरिका में जॉब मिल गई। शादी के बाद धानी भी वहीं चली गई और दो महीने बाद उसे भी अमेरिका में जॉब मिल गई दोनों अपनी गृहस्थी में खुश थे।


एक दिन माँ ने खुशखबरी दी कि भैया की शादी पक्की हो गई है।लड़की का नाम रीमा है।भाभी उनके किसी दोस्त की बहन थी , जिन्हें भैया पसंद करने लगे थे इसलिए मां ने भी खुशी-खुशी रजामंदी दे दी। शादी के

समय रीमा गर्भवती थी इसलिए भारत नहीं आ सकी। शादी के अगले दिन माँ ने उसे फोन पर अच्छे से संपन्न हुए सारे वैवाहिक कार्यक्रमों के बारे में गदगद होकर बताया।

माँ चाँद सी सुंदर बहू पाकर बहुत खुश थी। वो धानी से कहती," अब बहू के आने पर ऐसा लगता है जैसे तू वापस आ गई।घर में रौनक हो गई है।"

अपनी डिलीवरी के बाद जब धानी अपनी नन्ही बिटिया के साथ भारत आई और भाभी से पहली बार मिली तो मन के किसी कोने में बसी माँ समान भाभी की तस्वीर कुछ दरक गई। यूँ तो भाभी धानी से बहुत मीठा व्यवहार करती थी पर सब दिखावटी सा लगता था और खासकर माँ के प्रति रीमा भाभी का व्यवहार देखकर धानी को अच्छा नहीं लग रहा था।भाभी, धानी के सामने तो माँ से अच्छे से पेश आती थी पर धानी के पीठ पीछे माँ से बात करते वक्त भाभी की आवाज बड़ी कर्कश हो जाती थी जो जाने अंजाने धानी के कानों में पड़ गई थी और माँ भी भाभी से डरी-डरी सी रहती थी।

एक बार धानी ने माँ से पूछा भी," माँ, क्या आप यहाँ खुश हो? भाभी का व्यवहार आपके साथ कैसा है?" तब माँ ने कहा,"बेटा, वह अभी नई नई आई है। हमें भी तो उसे थोड़ा समय देना चाहिए और मैंने उसे अपनी बेटी ही माना है। वह भी कभी न कभी मुझे अपनी माँ के समान ही मान लेगी।"

धानी ने माँ से वादा लिया यदि कोई भी परेशानी होगी तो बेझिझक धानी को बताएँगी। माँ ने मुस्कुराकर धानी के गाल थपथपाए और कहा," बेटा तू तो अपनी गृहस्थी पर ध्यान दे। बेटियाँ ससुराल में खुश रहें तो माँ-बाप तो वैसे ही गंगा नहा जाते हैं। मेरी देखभाल के लिए तेरा भाई -भाभी तो है ही न बिटिया।"

धानी वापस अमेरिका आ गई।

कुछ दिन बाद भैया के मोबाइल से माँ का फोन आया, बोली कि उनका फोन खराब हो गया है तो अब वो भैया के फोन से ही बात किया करेंगी। भैया के फोन से हर रविवार धानी की, माँ से बात हो जाती थी।सब ठीक चल रहा था। दो साल का समय ऐसे ही पंख लगाकर उड़ गया।

अब जब पिछले दो रविवार से माँ से बात नहीं हुई तो धानी का दिल घबरा उठा। भाभी का नंबर भी स्विच ऑफ़ आ रहा था। उसे लगा बुढ़ापा है,हो सकता है माँ की तबीयत ज्यादा खराब हो और भैया-भाभी उसे परेशान न करना चाहते हों। ये सोचकर उसकी आँखें नम हो गईं।

उसने तुरंत माँ की इकलौती और सबसे पुरानी सहेली गीता मौसी को फ़ोन लगाया।

गीता मौसी के हालचाल पूछकर धानी ने माँ के बारे में अपनी चिंता ज़ाहिर की।

गीता मौसी ठंडी सांस लेकर बोली," सुधा ने किसी को भी बताने से मना किया था पर तू परेशान है इसलिए बता रही हूँ ।तेरे भाई भाभी ने, सुधा को वृद्धाश्रम भेज दिया है। राजीव कह रहा था कि माँ अपने हमउम्र लोगों के साथ वहाँ खुश रहेंगी और घर में भी कलह नहीं होगा। सच धानी सुधा को वृद्धाश्रम जाता देखकर मैं रो पड़ी थी। मैं तो खुद भी अपने बच्चों पर आश्रित हूँ इसलिए सुधा के लिए कुछ ना कर सकी अब तू ही कुछ कर। पता नहीं हम बूढ़े लोग , किसी को क्यों पसंद नहीं आते?"

ये कहकर रोती हुई गीता मौसी ने फ़ोन रख दिया।"

यह सुनकर धानी फफक-फफक कर रो पड़ी।

जब कुछ देर रोकर, अपने आप को संभाला तो तुरंत भैया को फोन लगाकर खूब खरी-खोटी सुनाई और बोली मैं अगले हफ़्ते आकार माँ को अपने साथ ले जाऊँगी। अब आप माँ की जिम्मेदारी से मुक्त हो।

धानी ने अगले हफ़्ते की भारत आने की टिकट बुक कराई। पति को सारी बात बताकर ,वो पैकिंग में लग गई। धानी ने गीता मौसी को भी अपने आने की खबर कर दी और माँ को अमेरिका लाने की सरकारी कागज़ी कार्यवाही भी शुरु कर दी।

अगले हफ़्ते जब वो भारत आई तो एयरपोर्ट से बाहर निकल कर देखा राजीव भैया और माँ उसे लेने आए थे।धानी चकित रह गई और माँ से लिपट कर रोने लगी।

तभी भैया ने झिझकते हुए कहा," मैं कार लेकर आता हूं, थोड़ी ज्यादा ही दूर पार्क की है, पार्किंग के लिए जगह नहीं मिल रही थी।"

धानी की आँखों में सैकड़ों प्रश्न थे। माँ ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा,"तू यही सोच रही है ना कि मुझे तेरे आने का पता कैसे चला? तेरे भाई-भाभी का हृदय परिवर्तन कैसे हो गया और मैं एक हफ्ते में वृद्धाश्रम से घर कैसे आ गई?"

धानी ने हाँ में सिर हिलाया।

माँ बोली," तो सुन, गीता मुझसे मिलने आई थी उसने ही तेरे आने के बारे में बताया। सच कहूँ तो मैं उस दिन बहुत रोई कि अब मुझे ज़िंदगी की शाम में अपना देश छोड़ना पड़ेगा और अपनी बेटी के घर रहना पड़ेगा। जबकि हमारे समाज में तो बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते।

फिर शायद भगवान ने मेरी सुन ली और अगले ही दिन राजीव और रीमा मुझे वृद्धाश्रम से वापस घर ले जाने के लिए आए। दोनों ने मुझसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी। रीमा तो मेरे पैरों में गिर कर रो पड़ी।"

बाद में राजीव ने बताया," रीमा की भाभी ने भी उसकी माँ को वृद्ध आश्रम भेज दिया है और इस बात को सुनकर रीमा को लगा कि शायद ईश्वर ने उसे उसके कर्मों की सजा दी है। तब से उसने खाना-पीना छोड़ दिया और आपको वापस लाने की रट लगा रखी थी।"

धानी के चेहरे पर अभी असमंजस के भाव थे। सुधा ने उसके सिर पर हाथ फेर कर कहा,"अब सब ठीक है बिटिया। घर वापस आने के बाद मैंने रीमा से कहकर उसकी माँ को भी आश्रम से, अपने ही घर बुला लिया है। जिसके लिए रीमा मुझे बहुत धन्यवाद देती रहती है। पर बेटा मैने रीमा को माँ पर कोई अहसान नहीं किया बल्कि भुक्तभोगी होने के कारण उनके दर्द को समझा है।"

इतने में राजीव भैया भी कार लेकर आ गए और मैं अपने आँसू पोंछते हुए कार में जा बैठी। एक हफ़्ते से भावनाओं का जो ज्वार-भाटा मेरे मन में चल रहा था वो अब शांत हो गया। मेरे चेहरे पर भी उगते सूरज की लाली मुस्कुराहट के रूप में फैल गई थी।


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